हाय! फिर लुट गई…!!

मैं हूँ असहाय
कोई मुझको सम्भाल !
कट रही हूँ मूल से
सब देखें घूर के
गिर रही हूँ धरा पर
कट गये हैं सभी पर
डोर से मैं बँधी थी
सिर उठाये खड़ी थी
एक निगोड़े ने मुझसे
आकर पंजा लड़ाया
मुझमें लिपटा रहा
बाँहों में ले झुलाया
उसके नैनों ने छलकर
मेरे मन को भी हरकर
ढील जैसे मिली
थोड़ा-सा मैं हँसी
हाय! फिर कट गई
हाय! फिर लुट गई….

Comments

3 responses to “हाय! फिर लुट गई…!!”

  1. mishra pradeep

    सुंदर शब्द , रहस्यवाद की झलक…..

    1. Pragya Shukla

      बिल्कुल सही कहा आपने पतंग की कहानी है और उसकी वेदना को रहस्यात्मक विधा में व्यक्त किया है मैंने…
      आपको अच्छी लगी आपका धन्यवाद…

  2. mishra pradeep

    👍

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