शिवरात्रि का भोर
भोर जीवन में लाया
भाँग- धतूरा चढ़ा के
मैंने शिव को मनाया
शिव-शंभू हे नाथ !
अरज मेरी सुन लीजे
मेरे श्याम की राधा
केवल मुझको कीजे
मुझको कीजे नाथ
बड़ा उपकार रहेगा
प्रज्ञा’ का सर्वस्व
तुम्हारा सदा रहेगा
जो ना पाई श्याम !
नाम ना लूंगी तेरा
मेरे तन-मन में श्याम
कि यह मन जोगन मेरा
भूल के भोलेनाथ ना
मुझको रुसवा करना
चरणों में तेरे, मन में है
श्याम के रहना
पूरी कर दी जो अभिलाषा
तेरे गुण गाऊंगी
वरना विष को पीकर
श्याम में मिल जाऊंगी…
“शिवरात्रि का भोर”
Comments
5 responses to ““शिवरात्रि का भोर””
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आप सभी को प्रज्ञा की ओर से शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं
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शिव रात्रि के पावन पर्व पर बहुत सुंदर रचना
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धन्यवाद आपका
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Very nice
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Tq
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