“किंचित ही तू मूढ़ है”

किंचित ही तू मूढ़ है
कहता मेरा मन !
क्यों फोड़ा सिर तूने
निरमोही के आंगन
निरमोही के आंगन में
फलता प्रेम कहाँ है !!
जिसको तू प्रियतम समझे
वह मोहब्बत का खुदा कहाँ है ??

Comments

6 responses to ““किंचित ही तू मूढ़ है””

    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपके प्रेम हेतु

  1. Geeta kumari

    बहुत ख़ूब

Leave a Reply

New Report

Close