मिट गया हर संताप….

मिट गया हर संताप
दूर अब हुआ अँधेरा
घिर कर मेघ ने
मेरे घर-आंगन को घेरा
घर-आंगन को घेर
मेघ मारे किलकारी
नीर बहाए प्रज्ञा’
हाय ! रोये बेचारी
सुनकर आया मोर
मोर ने शोर मचाया
घनघन करता मेघ
मोर ने नृत्य दिखाया
नृत्य देखकर प्रज्ञा’
हर्षित हुई अपार
यह था सपना एक
सच लगे बारम्बार!!

Comments

3 responses to “मिट गया हर संताप….”

  1. mishra pradeep

    सरलता और सौम्यता आपकी कविता का मूल है। 👍

    1. आपकी इस उत्साहवर्धक टिप्पणी हेतु बहुत बहुत धन्यवाद

  2. बहुत सुंदर रचना

Leave a Reply

New Report

Close