बोली लेखनी आज
मिटा तू घनघोर अंधेरा
विगत माह से तूने
मुझसे नाता तोड़ा
नाता तोड़ा तूने
मुझसे जोड़ जरा-सा
मैं (कलम) तेरे भावों और हूँ स्याही की प्यासा
लिखकर कविता और नज्म
तू मेरी प्यास बुझा दे
ओ पगली प्रज्ञा !
तू मेरा रोग लगा ले…
कवि की लेखनी:- मानवीय अलंकार
Comments
2 responses to “कवि की लेखनी:- मानवीय अलंकार”
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बहुत ख़ूब
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धन्यवाद
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