हो अदब बड़ों का

नींद तू रात को
सताना मत,
ऐसे सपनों को तू
दिखाना मत,
टूट कर गम मुझे
बहा जाये,
दर्द ऐसा हो जो
सहा जाये,
बोल ऐसा हो
जो मैं कह पाऊं,
रोल ऐसा हो
जो मैं कर पाऊं,
हो अदब बड़ों का
ऐसा कुछ,
उनकी नजरों से थोड़ा
भय खाऊँ,
ताकि गलती से पहले
थोड़ा सा,
बात समझूँ, जरा संभल जाऊँ।

Comments

8 responses to “हो अदब बड़ों का”

  1. वाह वाह बहुत ही उत्तम

  2. अति सुंदर

  3. vikash kumar

    JAY ram JEE ki

  4. Geeta kumari

    अपने बड़ों का सम्मान करना सिखाती हुई बहुत ही श्रेष्ठ रचना। उम्दा लेखन

  5. अति उत्तम प्रस्तुति

  6. नींद तू रात को
    सताना मत,
    ऐसे सपनों को तू
    दिखाना मत,
    टूट कर गम मुझे
    बहा जाये,
    दर्द ऐसा हो जो
    सहा जाये,
    बोल ऐसा हो
    जो मैं कह पाऊं,

    बड़ों का सम्मान करना सिखलाती हुई रचना

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