महफ़िल का माहौल
इस कदर न बिगाडिए
किसी पर यूॅं कीच न उछालिए
खुद के गिरेबां में
ग़र झाॅंक सको तो ठीक
वरना किसी और पर यूॅं,
तोहमत तो ना लगाइए l
ताप हमारे अंदर भी हैं
आपके भीतर भी होगा l
सरे आम हमें,
यूॅं ना आजमाइए l
जाइए पहले देख कर आइए आईना,
फिर किसी और पर तोहमत लगाइए॥
______✍ गीता
महफ़िल का माहौल
Comments
13 responses to “महफ़िल का माहौल”
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Reality is zero and your poem is universal truth. JAY RAM JEE KI
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Thanks
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बहुत सटीक कथन व सुन्दर रचना, सभी को केवल साहित्य सृजन की ओर बढ़ना चाहिए।
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कविता की इतनी सुंदर और सटीक समीक्षा करने के लिए और कविता का मर्म समझने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कमला जी हार्दिक आभार
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कवि गीता जी की बहुत सुन्दर, और सटीक रचना है यह। लेखनी का अभिवादन। भाव, भाषा व शिल्प का बेहतरीन तालमेल
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कविता की सुंदर और सटीक समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी, बहुत-बहुत आभार, अभिवादन सर
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वाह, बहुत ही सच्ची बात लिखी है आपने
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बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी
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बहुत खूब
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हार्दिक आभार चंद्रा जी
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Thanks for your nice compliment
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महफ़िल का माहौल
इस कदर न बिगाडिए
किसी पर यूॅं कीच न उछालिए
खुद के गिरेबां में
ग़र झाॅंक सको तो ठीक
वरना किसी और पर यूॅं,
तोहमत तो ना लगाइए lउत्तम लेखन सही बात कही
खुद के गिरेबान में झांकने की आवश्यकता होती है दूसरे पर उंगली उठाने से पहले…
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