5 Comments

  1. रंग नही हैं अब क्या जमाने में
    कि लोग बेरंग हो गये जहां में
    _______ समसामयिक चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवि विकास जी की सुंदर रचना, उत्तम अभिव्यक्ति

  2. सही है
    कुछ बे रंग हो गये
    कुछ रंगीले हो गये
    उड़ा है रंग चेहरों का
    झूठ कपट की दुनियां का

  3. रंग तो खेल ही लेंगे हम रंगों के मौषम में
    लेकिन मैं हर पल खेलता रंग खूद के संग में
    ——- लाजवाब प्रस्तुति

  4. आप की कविता पाठक को विचार करने पर मजबूर कर देती हैं
    उच्च स्तरीय लेखन, कला पक्ष तथा भाव पक्ष दोनों मजबूत है।।

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