नेह, प्रेम, सम्मान

जहां नहीं संतोष मन
छोड़ दीजिए राह,
उलझन की हर वस्तु की
छोड़ दीजिये चाह।
छोड़ दीजिये चाह
साथ में साथ मित्र का
जिसको केवल याद
रहता सौरभ इत्र का।
कहे सतीश जाना,
तुम दिल खोल वहां
नेह प्रेम सम्मान
का खूब स्थान हो जहां।

Comments

4 responses to “नेह, प्रेम, सम्मान”

  1. जहां नहीं संतोष मन
    छोड़ दीजिए राह,
    उलझन की हर वस्तु की
    छोड़ दीजिये चाह।
    छोड़ दीजिये चाह
    साथ में साथ मित्र का
    जिसको केवल याद
    रहता सौरभ इत्र का।।

    ———
    क्या बात है अति उत्तम लेखन प्रेम स्नेह और सम्मान को अपने जीवन में स्थान देने की बात कही है सच ही तो है जहां प्रेम हो सम्मान हो वही व्यक्ति को जाना चाहिए।।

  2. Geeta kumari

    साथ में साथ मित्र का
    जिसको केवल याद
    रहता सौरभ इत्र का।
    कहे सतीश जाना,
    तुम दिल खोल वहां
    नेह प्रेम सम्मान
    का खूब स्थान हो जहां।
    __________ बहुत सुंदर और सच्ची बात कहती हुई कवि सतीश जी की एक उम्दा रचना… जहां प्रेम और सम्मान मिले व्यक्ति को तो वही जाना चाहिए यह सुंदर कथन कहती हुई अति शानदार रचना, साहित्य की सुंदर धारा प्रवाहित हो रही है सर आपकी लेखनी से

  3. Deepa Sharma

    बहुत सुंदर रचना

  4. बहुत सुंदर लिखा है पाण्डेय जी

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