मैं फिर भी तुमको चाहूंगी (साहित्य को समर्पित)

मिथ्याओं पर आधारित
है साहब ! सोंच तुम्हारी
अब तो सारी बातें हैं
लगती झूँठ तुम्हारी
मेरी अभिलाषा का
है तुमने जो उपहास किया
मेरी करुण व्यथा का
है तुमने जो अपमान किया
ना कभी माफ कर पाऊँगी
ना हिय से उसे भुलाऊंगी
ऐ साहित्य ! तुझे मेरा प्रणाम
मैं फिर भी तुमको चाहूंगी।।

Comments

14 responses to “मैं फिर भी तुमको चाहूंगी (साहित्य को समर्पित)”

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  2. Geeta kumari

    मेरी करुण व्यथा का
    है तुमने जो अपमान किया
    ना कभी माफ कर पाऊँगी
    ना हिय से उसे भुलाऊंगी
    __________ कभी प्रज्ञा जी की भावुक रचना, उत्तम अभिव्यक्ति

  3. अतिसुंदर रचना

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  5. बहुत सुंदर भाव

  6. सगीतमय तथा लयबद्ध प्रस्तुति

  7. अति सुन्दर रचना

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