हिरण सा मन बना लूँ

जुबान से मेरी
किसी का दिल न दुखे
न कभी लेखनी यह,
ठेस के भाव लिखे।
न निशाना हो मेरा
कहीं पर व्यक्तिगत सा
न कोई बात बोलूं
दिखूँ जो व्यक्तिगत सा।
चाह इतनी रखूं कि
दिखे जो अनगिनत सी,
भूल जाऊँ वो टूटन
जो उपज थी विगत की।
हिरण सा मन बना लूँ
दिखे चंचल सा बाहर
मगर भीतर कलेजा
शेर का अब लगा लूँ।
धीर-गंभीर बैठूँ
नहीं विचलित कहीं पर,
कदम रौखड़ जमीं
आँख होंगी नमी पर।
भटक जाऊँ अगर तो
वहां पहुँचूं भटकर
जहाँ मन ईश मन्दिर
खड़ा बिंदास डटकर।
लिखूं वो सब मुझे जो
ले चले प्रेम पथ पर,
मिटा दूँ सब गलत वह
उगे जो द्वेष पथ पर।

Comments

4 responses to “हिरण सा मन बना लूँ”

  1. Geeta kumari

    ….हिरण सा मन बना लूँ
    दिखे चंचल सा बाहर
    मगर भीतर कलेजा
    शेर का अब लगा लूँ।
    ……..लिखूं वो सब मुझे जो
    ले चले प्रेम पथ पर,
    मिटा दूँ सब गलत वह
    उगे जो द्वेष पथ पर।
    ………….. कवि सतीश जी की अत्यंत सुंदर रचना । शिल्प और भाव का सौंदर्य अनुपम है । समाज को बहुत सुंदर साहित्य परोसते हुए एक अद्भुत काव्य रचना

  2. अतिसुंदर भाव

  3. कवि सतीश पाण्डेय जी की अत्यंत सुंदर कविता

  4. जुबान से मेरी
    किसी का दिल न दुखे
    न कभी लेखनी यह,
    ठेस के भाव लिखे।
    न निशाना हो मेरा
    कहीं पर व्यक्तिगत सा
    न कोई बात बोलूं
    दिखूँ जो व्यक्तिगत सा।

    Nice line

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