मत कहना सूरज डूब रहा है
नहीं डूबता है सूरज
जलकर निरंतर रात औऱ दिन
ज्योति उगलता है सूरज।
धरती गतिशील घूमती है
स्थिर नहीं रहती है
इसलिए हर कोने में
क्रम क्रम से
उजाला बांटती रहती है।
अंधेरे और उजाले का
आना जाना चलता रहता है
न अंधेरे से डर
न उजाले से इतरा,
सब समदृष्टि रखने वाला ही
आगे बढ़ता रहता है।
समदृष्टि
Comments
2 responses to “समदृष्टि”
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न अंधेरे से डर
न उजाले से इतरा,
सब समदृष्टि रखने वाला ही
आगे बढ़ता रहता है।
_______ यह सत्य है कि सूर्य नहीं डूबता है, पृथ्वी घूम घूम कर क्रम से ही इस दुनिया को सूर्य की रोशनी बांटती है, इसलिए हे मानव मुसीबत में नहीं घबराना और सफलता पर नहीं इतराना चाहिए यही सुंदर संदेश दिया है कवि सतीश जी ने अपनी इस कविता में, उच्च स्तरीय लेखन -

अति उत्तम कविता, सच्ची बात
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