एक थी नारी

एक थी नारी
सबको थी प्यारी
सब चाहते थे हो जाए हमारी
ममता की मूर्ति और दुनिया पुजारी
तभी एक दिन दवे पांव आया नरवाद
ममता के मंदिर में मचाया हाहाकार
स्वार्थ और अहं से जो था लाचार
तब तक शांति प्रिय नारी ने कर लिया था उसकी अधीनता स्वीकार
उस पर होने लगे जुल्म अत्याचार
सहनशीलता की सीमा पार
ना राम को बुलाया ना कृष्ण की पुकार
तरस खा कर नर वाद ने उसे दिया शिक्षा का अधिकार
्‍यही बना उसका अचूक हथियार
अपने अधीन किया फिर संसार
एक है नारी ढोती जो जग का भार
देती है प्यार करती उपकार
तब ‘वाद, ‘मर गया

Comments

3 responses to “एक थी नारी”

  1. Geeta kumari

    वाह, बहुत ख़ूब

  2. अति उत्तम

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