“वो अब कहते हैं मत बोलो” (छंद बद्ध)

तबाही मेरे मन की तुम
हंसी में लेके मत डोलो
मेरे गीतों को अपने
प्रेम के भेंट मत बोलो
जो कभी मरते-मिटते थे
मेरे अल्फाजों के दम पर,
कि अब देकर हमें कसमें
वो अब कहते हैं मत बोलो।।

Comments

8 responses to ““वो अब कहते हैं मत बोलो” (छंद बद्ध)”

  1. Amita

    बहुत सुंदर पंक्तियां

  2. Ekta

    बहुत सुंदर प्रस्तुति

    1. Pragya

      Thanks a lot

  3. राकेश पाठक

    Very nice

    1. Pragya

      Thank uuuu…

  4. अतिसुंदर रचना 

    1. धन्यवाद सर

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