आकाश की बाहों में
चुप जाने को जी चाहता है
सूरज की गर्मी में तप जाने को
जी चाहता है
रात की दहलीज़ पर
नंगे पांव रखकर
चांद की चांदनी में नहाने को
जी चाहता है
शराब की बोतल में
बन्द कर दूं सारे जख्म
आज खुशगवार हो जाने को जी चाहता है।
रात की दहलीज पर…

Comments
4 responses to “रात की दहलीज पर…”
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वाह प्रज्ञा जी 😊मेरे चेहरे की मुस्कुराहट लौटा दो,
कुछ और संयोग वियोग से सजी कविता सुना दो❤💕🌹😊😊😊बहुत सुन्दर❤ रचना
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आपके इतनी सुंदर समीक्षा के आगे मेरी कविता तो कुछ भी नहीं है सी पूरी कोशिश करूंगी कि मैं कुछ ऐसा लिखूँ जो आपको अच्छा लगे
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बहुत खूब
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धन्यवाद
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