पहचान

होना था तेरा, पर तेरा होना ही सिर्फ मेरा पहचान नहीं |
तू था जरूरी, पर एक जरुरी ख्वाब नहीं |
सिर्फ तेरा होना ही, मेरा समान नहीं |
ख्वाब मेरे ख्याल कई,
मकसद और मेरे मुकाम कई |
अगर अस्तित्ब का पहचान नहीं,
तो जीवन जीने का मान नहीं |
“न साथ दिया, न समान किया |
ये भी कोई, वफ़ा का नाम नहीं |
हम बेवफा कैसे हुए ?
अस्तित्ब और ईमान से बढ़ कर कोई शान नहीं |
जब तक खुद का “पहचान ” नहीं,
जीवन जीने का कोई मान नहीं |

Comments

10 responses to “पहचान”

  1. Divya Jain Avatar
    Divya Jain

    जहॉं तक इस कविता के भावों की बात है, बहुत ही अच्छी कोशिश है, हॉं, वर्तनी पर ध्यान देने की जरूरत है

    1. Priya

      जी में प्रयास करुँगी आगे से गलती न हो

  2. अतिसुंदर रचना 

    1. Priya

      जी शुक्रिया

  3. शानदार

    1. Priya

      आपसे कही थी अगला कबिता… डर का नहीं बल का होगा…. बस वही प्रयास है

  4. बहुत सुंदर रचना

    1. Priya

      बहुत बहुत शुक्रिया

  5. वाह लिखने की शैली बहुत ही सुन्दर है। 

    1. Priya

      जी कुछ प्रयास किए हैं

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