छुपा है चाँद बदली में ,अमावस आ गयी है क्या?
नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
मिलन की रात में ये घुप्प अँधेरा क्यों सताता है ?
वो मेरा और उसका छुप छुपाना याद आता है..
अभी तो थी फ़िज़ा महकी , क़यामत आ गयी है क्या?
कभी वो थी कभी मैं था, कभी चंचल चमकती रात,
न वो कहती ,न मैं कहता मगर आँखे थी करती बात..
जिन आँखों में हया भी थी,कज़ा अब आ गयी है क्या?
वो नदियों के किनारो पर जहाँ जाता था मिलने को,
वो नदियां है क्यों प्यासी सी, बुलाती है बुलाने को,
उन्ही नदियों की रहो में रुकावट आ गयी है क्या?
नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
…atr
छुपा है चाँद बदली में…
Comments
8 responses to “छुपा है चाँद बदली में…”
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Nice poem atr..
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thank u 🙂
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nice!
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thanks 🙂
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Good
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सुन्दर
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Wah
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बहुत खूब
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