तुम्हे पाने की खातिर.

वो मंज़र याद है तुमको ,जुदा हम तुम हुए थे जब,
समंदर याद है तुमको जहाँ पत्थर चलाया था..
कभी जब याद आ जाये ,ज़रा हमको भी करना याद ,
किसी के साथ जो तुमने वहां कुछ पल बिताया था.
नहीं दिल से अभी वो शाम जाती है , नहीं होता सवेरा,
की जब से तुम गए हो मीर, मेरा जीवन अँधेरा.
ख़ुदा कैसी तमन्ना है,की मैं अब भी तरसता हूँ,
पता मुझको , यकीं मुझको, मगर फिर भी मचलता हूँ…

   तुम्हे पाने की खातिर,तुम्हे पाने की खातिर..

…atr

Comments

6 responses to “तुम्हे पाने की खातिर.”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

  2. राम नरेशपुरवाला

    सुन्दर

  3. Abhishek

    हाँ

  4. nitu kandera

    हूँ

  5. Satish Pandey

    बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ

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