आपकी बेरहम यादें और मैं,
बहुत सारी फरियादें और मैं।
चुप रहेंगी खींचकर आज साँसें,
मेरी बेबस निनादें 1 और मैं।
इंतज़ार कर रही हैं बरखा 2 का,
सूखी पड़ी ये आँखें और मैं।
लगा रहे हैं सब इंक़लाबी नारे,
ख़ामोश हैं मेरी बातें और मैं।
बंद है वज़ीर शतरंजी चाल में,
लावारिस हो गए प्यादे और मैं।
चलेंगे सच पर अदालती मुक़दमे,
झूठे हैं सारे हलफ़नामे3 और मैं।
जागती रहेंगी रात भर फिर से,
आपकी बज़्म4 में शामें और मैं।
1. ज़ोर की आवाज़; 2. बारिश; 3. शपथपत्र; 4. सभा।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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