क्या बताएँ आपको दास्ताँ-ए-दिल 1 अब हम,
क़त्ल कर के ख़ुद का, हुए क़ातिल अब हम।
तमीज़दार ख़ल्क़ 2 में तमाशबीन 3 हम बन गए,
मुहज़्ज़ब 4 बज़्म में, इकलौते जाहिल अब हम।
समंदर-ए-इश्क़ में लहर बनकर हम चल पड़े,
रेत से सूखे रह गए, बनकर साहिल5 अब हम।
जमाना जब जा पहुँचा, चाँद-ओ-फ़लक6 तक,
कूचे7 से ही जो न निकले, वो राहिल8 अब हम।
देखने वाले सब देखते ही रह जाएँगे अब हमें,
दिखेंगे नहीं कभी, चश्म 9 से ग़ाफ़िल10 अब हम।
1. दिल की कहानी; 2. दुनिया; 3. तमाशा देखने वाले; 4. सभ्य; 5. किनारा; 6. चाँद और आसमान; 7. गली; 8. पथ प्रदर्शक; 9. आँख; 10. बेख़बर।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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