Anil Mishra Prahari, Author at Saavan's Posts

माखनचोर ।

तू है माखनचोर। कान्हा तुम आ जाते छुपके खा जाते हो माखन चुपके, तड़के आँगन सखियाँ करतीं शोर तू है माखनचोर। दही मगन खा मटकी तोड़ी करते नहीं शरारत थोड़ी, गाँव में अब चर्चा है हर ओर तू है माखनचोर। माखन नहीं अकेले खाते बाल सखा सब लेकर आते, शाम कभी तो आ जाते हो भोर तू है माखनचोर। माँ, माखन से मैं अनजाना व्यर्थ गोपियाँ मारें ताना, उनका तो बस मुझपर चलता जोर मैं नहीं माखनचोर। अनिल मिश्र प्रहरी। »

करोना का कहर।

रोग कोरोना से हुई मानवता बेचैन जीवन लगता रुष्ट है, बैरी दिखता चैन, बैरी दिखता चैन, मौत का नग्न – नृत्य है मौन-विधाता बता,किया क्यों क्रूर कृत्य है? रोग शमित होगा तभी, रहें भीड़ से दूर तभी बचेंगी चूड़ियाँ, माथे का सिन्दूर। अनिल मिश्र प्रहरी। »

मन।

मन। क्यों घुट – घुट के जीता है रे मन? तुझे काया मिली इतनी माया मिली, तेरी राहों में बिखरा है मधुवन। क्यों घुट – घुट के जीता है रे मन। इतना सुन्दर- सा घर यानों का सफर, तू भिखारी से राजा गया बन। क्यों घुट – घुट के जीता है रे मन। तुझे सपने मिले संग अपने मिले, तेरी आभा से चमके हैं कण-कण। क्यों घुट – घुट के जीता है रे मन। पदोन्नति मिली लाल बत्ती मिली, आज लाखों करें पुष्प अर्पण। ... »

वीरों का दिल से अभिनन्दन।

वीरों का दिल से अभिनन्दन। सीमा  पर  डटकर  खड़े हुए, दो-नयन  शत्रु  पर  गड़े  हुए, हाथों  में अस्त्र  सुशोभित  है, उर से भय आज तिरोहित है। जन-गण-मन करते  हैं वन्दन, वीरों का दिल से अभिनन्दन। उत्साह  हृदय  में  भरा  हुआ, पग  अंगारों  पर   धरा  हुआ, अरि के हिम्मत को तोड़ चले, तूफा की गति को मोड़  चले। झुकता धरती पर आज गगन, वीरों का दिल से अभिनन्दन। करते   भारत   की   रखवाली, हत, जिसने बुरी नजर  डाली,... »

दर्द।

दर्द। टूटकर सपने नहीं कम हो सके पास रहकर भी न उनमें खो सके, अश्क से दामन मेरा है तरबतर फूटकर हम आजतक न रो सके। दूर भी हैं वो हमारे पास भी मौत भी व जिन्दगी की आस भी, ठोकरें जिनसे मिलीं इस राह पर उन पत्थरों की आजतक तलाश भी। दर्द से रिश्ता बहुत मेरा पुराना धूप में तपता हुआ यह आशियाना, खाक न हो जाए दिल का ये चमन है पड़ा ही आँख को दरिया बनाना। रात क्या, दिन भी अँधेरों में घिरा आ सवेरा द्वार से मेरे फिर... »

पूस की रात।

पूस की रात। थरथरा रहा बदन जमा हुआ लगे सदन, नींद भी उचट गयी रात बैठ कट गयी। ठंड का आघात पूस की रात। हवा भी सर्द है बही लगे कि बर्फ की मही, धुंध भी दिशा – दिशा कि काँपने लगी निशा। पीत हुए पात पूस की रात। वृद्ध सब जकड़ गये पोर-पोर अड़ गये, जिन्दगी उदास है बची न उम्र पास है। सुने भी कौन बात पूस की रात। रात अब कटे नहीं ठंड भी घटे नहीं, है सिकुड़ गयी शकल कुंद हो गयी अकल। न ठंड से निजात पूस की रात।... »

सावन बीता जाये।

सावन बीता जाये प्रियतम तुम न आये। मस्त पवन संग डोले किसलय ताल – तलैया, सागर में लय, बादल नभ पर छाये प्रियतम तुम न आये। कलियों पर है छायी लाली झूमे बेसुध कोमल डाली, मधुकर तान सुनाये प्रियतम तुम न आये। चूमें धरती चंचल – किरणें महकी हवा लगी मन हरने, रुत आये रुत जाये प्रिमतम तुम न आये। सावन की ये काली रातें गरजे घटा घोर बरसातें, विरह बहुत तड़पाये प्रियतम तुम न आये। सूना आँगन , सूने झूले जा... »