Author: Anirudh sethi

  • सिर्फ़ बोझ न समझ मुझे

    सिर्फ़ बोझ न समझ मुझे

    जीना चाहती हूं मैं भी
    इस दुनिया को देखना चाहती हूं
    मां तेरे आंचल में सर रखकर सोना चाहती हूं
    बापू तेरी डाट फ़टकार प्यार पाना चाहती हूं

    मां मैं तेरा ही हिस्सा हूं
    तेरा अनकहा किस्सा हूं
    तू मुझे अलग कर क्या जी पायेगी
    इस दुनिया की भीड़ में तू भी अकेली पड़ जायेगी

    इक मौका तो दे मुझे
    बापू को अपने हाथ से रोटी बनाकर खिलाऊंगी
    कक्षा में प्रथम आकर मैं सबको दिखलाऊंगी
    बड़ी होकर जब अधिकारी बन घर आऊंगी
    बापू के सर को मैं ऊंचा कर दिखलाऊंगी

    जीना चाहती हूं मैं भी
    इक मौका तो दे मुझे
    सिर्फ़ बोझ न समझ मुझे|

  • कोई अपना सा

    मन के दर्पण पर कुछ प्रतिबिम्ब सा छा गया
    कुछ कहा नही उसने पर फिर भी कुछ कह गया

    जैसे भोर में कोई नया पुष्प खिल गया
    हलचल सी हुई फिर हृदय के कोने में
    अपनी मधुर सी मुस्कान में जैसे वो मुझे छल गया

    उसके आने की आहट का बेसब्री से इंतज़ार किया
    और जब वो आया तो अंग अंग खिल गया
    मन मे बहुत कुछ था बताने को परंतु
    होंठ न खुल सके और वो बिना बोले ही बहुत कुछ कह गया

    सुध बुध खो बैठी उसकी झलक देखने को
    और बातो ही बातों में वक़्त बेवफा हो गया
    ख़्वाह्माखवाह मुस्कुराने लगी मैं
    पता चला तो नाम बदनाम हो गया
    इश्क़ में जिये तो डूबकर जिये हम
    और जमाना हमे आशिक़ कह गया

  • जिंदगी का खेल

    जिंदगी का खेल अब तक समझ न आया
    वो दाव खेलते रहे, मैं हारता रहा

  • इक जिंदगी थी मेरे पास

    इक जिंदगी थी मेरे पास
    जो खो गयी है
    रखता था जिसको बड़े सहेजकर
    मेरी फटी जेब से
    इक दिन अचानक सरक गयी
    बिना आवाज किये
    आज तलक उसको ढूढ रहा हूं
    इक जिंदगी थी मेरे पास

  • सूखी है जमीन

    सूखी है जमीन, सूखा आसमान है
    मगर उम्मीद है कायम, जब तक जान है

  • पीर दिल की

    पीर दिल की संभाले बैठे थे अरसे से
    आज पता नहीं कहां से बांध टूट गया|

  • लम्हे

    अगर लम्हों की क़ीमत जान जाएँ
    हर इक लम्हे में पोशीदा सदी है

  • Ab khyaal bhi log loot ke le gaye

    Mere jajbaato ko koi nahi samjata yahan

    Ghayal haalato ki koi kadr nahi kisi ko

    Ek khyaal tha jo sirf apna tha

    Ab khyaal bhi log loot ke le gaye

  • शब्दों का खेल

    सब शब्दों का खेल है भैया
    वरना लड़ाई मे तो दोनो ही हारते है

  • क्या रे! क्यों शोर मचाता है

    क्या रे! क्यों शोर मचाता है
    जीवन क़ी आपाधापी में
    क्यों आपा खो जाता है
    बनियान तेरी फ़टी हुई
    जैबों में एक कोढी तक नहीं
    ब्लैक मनी ब्लैक मनी चिल्लाता है
    क्या रे! क्यों शोर मचाता है

    जिनका काम है लुटना
    वो दुनिया को लुटेगें ही
    फिर इस बात पर इतना
    क्यों हैरान हो जाता है
    क्या रे! क्यों शोर मचाता है

  • दास्ता

    ये दास्ता कहे नहीं कही जाती
    कोशिशे क़ी कई दफ़ा
    मगर भूली भी नहीं जाती
    गुफ़्तगु ए इश्क कभी लफ़्जों से होती नहीं
    ये वो बात है जो दिल से है समझी जाती

  • क्या कहे, क्या लिखे

    क्या कहे, क्या लिखे
    लफ़्ज है ही नही,
    जो समेट सके जज्बातों को|
    नहीं कोई जो समझ सके
    हमारे अजीब से हालातों को |

  • इक अरसे बाद

    इक अरसे बाद कुछ लिखने को जी किया
    थमे थे जो अश्क आंखों में वो आज बह गये
    न जाने क्या दबा था इस दिल में
    दरिया बनकर बह गया आज सारा दर्द मेरा

  • दिलो के गम छुपाये नहीं छुपते

    दिलो के गम छुपाये नहीं छुपते
    कभी अश्कों में, कभी लफ़्जों में
    निकल आते है वक्त बे वक्त
    और छोड़ जाते है निशानी
    खारी खारी सी, काली नीली सी

  • और अब नेशनलिज्म

    पहले घर वापसी, फिर बीफ़ और अब नेशनलिज्म
    और क्या क्या होगा, जो होना बाकी है

  • बंजर दिल को क्या खोदते हो

    बंजर दिल को क्या खोदते हो
    बस दर्द मिलेगा,
    और थोड़ा बहुत मिट्टी
    जो खारी हो चुकी है
    अश्कों के भाप हो जाने से

  • मोहब्बत कहां लफ़्जों में बयां होती है

    मोहब्बत कहां लफ़्जों में बयां होती है
    नज़रों का निशाने कहां अल्फ़ाज खिंच पाते है

  • अपनी सारी जिंदगी बदल गयी

    अपनी सारी जिंदगी बदल गयी

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    खेल खेलते थे तब भी हम
    आज भी खेलते है
    बस नियम बदल गये
    कुछ नीयत भी बदल गयी

    भागते रहते थे तब भी हम
    हर तरफ़, चारो तरफ़
    आज भी भागते है
    मगर बस साथ बदल गया
    जगह बदल गयी
    वजह बदल गयी

    इक बचपन क्या बदला
    अपनी सारी जिंदगी बदल गयी!

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  • वाह! क्या बात है

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    उतार दी है जिंदगी सारी कि सारी
    चंद लफ़्जों में
    काश कोई समझ ले कभी
    इसी इंतजार में है इक मुद्दत से
    कि कभी कोई मेरे लफ़्जों को गढ़ ले कभी|
    सीधे सपाट शब्दों में कह देता हूं
    अपनी आपबीती, दास्ता अपनी
    थोडी सी भीगी भीगी,थोडी सी सूखी
    लोग कहते है “वाह! क्या बात है”

    – Anirudh

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