इन सत्ता के गलियारों में, कितने ही धृतराष्ट्र पड़े हैं
हमनें ही सर पर बैठाया, ये शकुनी के साथ खड़े हैं ।
इनको नहीं पड़ी हे अर्जुन! अभिमन्यु के हत्यारों की
द्रुपद सुता की लाज लूटते, करतूतें इनके प्यारों की ।
अब तो कोई विदुर नहीं है, जो पाण्डव की जान बचाए
ले मशाल सब खड़े हुए हैं, लाक्षागृह को आग लगाए ।
धूं धूं कर जलता जाता है, ज्यों भारत का सिंहासन हैं
संजय की भी आँखें फूटीं, अब शकुनी का अनुशासन है ।
भीष्म पितामह नहीं दिखे जो, लाक्षागृह का शोक मनाए
दुर्योधन का स्वागत करते, दिखे सभी बाहें फैलाए ।
जब सत्ता हो पाण्डु रोग से, ग्रसित किसी राजाधिराज की
पीली पीली सड़कें भी फिर, हो जाएगी जन स्वराज की ।
जब कुबेर की सत्ता छीने, रावण राजा बन बैठा हो
साधु को फाँसी दी जाएगी, ये प्रस्ताव भी ला बैठा हो ।
तो कितने ही साधू खुद को, निर्दोषी बतला पायेंगे
एक-आध शायद बच जाए, बाकी सूली चढ़ जायेंगे ।
तो राजा जी बात सुनो अब, ये काला कानून हटाओ
हम अनुशासित मौन सही हैं, हमको वापस नहीं जगाओ।
हम भी पढ़े लिखे बैठे हैं, हमको भी अधिकार पता हैं
हम अच्छे कुल में जन्में हैं, क्या उसकी ही मिली सजा है?
दुगने नंबर लाकर के हम, सभी विषय उत्तीर्ण हुए हैं
हमको सुविधा देने में क्यों, सब के सब संकीर्ण हुए हैं ।
फिर भी हर मंत्रालय में हम, अपनी क्षमता से बैठे हैं
राजनीति में रखो परीक्षा, देखो फिर हम आ बैठेंगे ।
अपने बल बुद्धि विवेक का मान भी है और आश्वासन है
हमको नहीं फर्क़ पड़ता है, कब किसका कैसा शासन है।
देश की रक्षा आन बान में, रक्त का कण कण भी अर्पण है
ब्राह्मण कुल में जन्म लिया है, नाम हमारा काव्यार्पण” है।
प्रज्ञा शुक्ला, सीतापुर
