Author: Pragya Shukla

  • उम्मीदों का दिया

    उम्मीदों का दीया जलाकर
    इस आशा में बैठे हैं
    कल सूरज खुशियाँ लाएगा
    चाँद सजाकर बैठे हैं

  • इस दुनिया में

    इस दुनिया में किसी को वफ़ा नहीं मिलती
    सजा तो मिलती है लेकिन दुआ नहीं मिलती

  • हर सदी इश्क की

    हर सदी इश्क की होती है
    एहसास का कोई मौसम नहीं होता

  • धीरे-धीरे

    पहले तन्हाई बहुत रुलाती है
    धीरे-धीरे आदत सी हो जाती है

  • नौ मिनट के लिए

    नौ मिनट के लिए भूल जा तू हिंदू-मुसलमाँ
    आज इंसानियत के लिये दीप जला दे

  • अगर मैं भूल भी जाऊँ

    अगर मैं भूल भी जाऊँ तो वो याद दिला देती है
    ज़िन्दगी मौत से बद्तर है हर रोज़ सज़ा देती है

  • दिलचस्प है

    दिलचस्प है ये ज़िन्दगी का सफ़र
    एक भी थक जाये तो मंज़िल नहीं मिलती

  • वो एक लम्हा

    वो एक लम्हा चुरा लाया है मेरा दिल
    जिस पल में तू मेरे साथ रहा करता था

  • शनासा

    नहीं रहा अब इस जहान में मेरा शनासा
    कर्ब किसको रो- रोकर सुनाऊँ अपना
    शनासा- परिचित, कर्ब-दुख

  • हे कान्हा! मैं तेरी जोगन

    हे कान्हा ! मैं तेरी जोगन
    जोग ना छूटत मेरो
    ………………..
    रोम-रोम में बसत है तेरो
    प्रेम अनमोल रतन
    ………………….
    हे कान्हा ! मैं तेरी जोगन
    जोग ना छूटत मेरो
    ………………….
    माखनचोर चोर तू है चीतचोर
    बंसी मधुर बजायो
    ………………….
    प्रीत में तेरी राधा नाचत
    ये कैसो रोग लगायो
    …………………..
    मोहे रिझा कर गोपिन के संग
    काहे रास रचायो
    ……………………….
    कित मेरी गई चूनर धानी
    कित नथुनी हेरायो
    ………………………
    सुध-बुध खोकर नाचत
    ब्रजवासी कैसो जोग लगायो?????

  • जीवन का मुन्तज़िर

    मेरी ज़िन्दगी की अधूरी कहानी है तू
    मेरी आँखों में मौजूद पानी है तू
    मेरे जीवन का मुन्तजिर है
    मेरी ख्वाइशों की पैमाइश है तू

  • मुझमें अभी तक तू ज़िंदा है

    मुझमें अभी तक तू ज़िंदा है
    मेरी तन्हाई में,मेरे एहसास में

    मेरी हर सांस में अभी तक ज़िंदा है तू
    ——————-‐—
    दिल की ज़मी में आज भी
    उगते हैं तेरी तमन्ना के दरख्ते
    ———————–
    रोशन हैं उम्मीदें और
    ख्व़ाब सजाए हैं पलकों पर
    ————————
    बेशक तुझसे प्यार बहुत है
    तू है नहीं नसीबों में
    ———‐————–
    फिर भी तुझको देख के
    मेरे रुखसार की रौनक बढ़ जाती है
    ————————-
    मुझमें अभी तक तू ज़िंदा है
    ये मेरी बेकरारी और आईना बताता है।

  • उनकी तलाश में

    जो मिला जीवन के सफ़र में
    उसे मेरी जरूरत ना थी
    जिन्हें जरुरत है मेरी
    उनकी तलाश में है दिल

  • बिना धागे की सुई

    बिना धागे की सुई है ज़िन्दगी
    कोई कहता है अच्छी है ज़िन्दगी
    किसी को सिखाती है
    किसी को बस चुभती जाती है ।

  • आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा

    पेश है आपकी खिदमत में:-
    गज़ल
    आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा
    तुझे भूलूँ या कैद दिल में करूँ
    ————————
    दिल लगा लूँ या जान छुड़ा लूँ तुमसे
    आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा
    ————————–
    गज़ल सुना के सुलाये हैं मैनें जो एहसास
    उन्हें जगा लूँ या सुला दूँ है बड़ी उलझन
    —————————-
    भूल जाना भी तूझे है ना आसान इतना
    दिल में बसता है तू अर्से से तुझे नहीं है खबर
    ——————————
    तुझे भी इल्म है इस बात का नहीं मालूम
    कितनी बेबस हूँ तेरे बिन तुझे नहीं है फ़िकर
    ———————————
    तुझे छुपा लूँ आँखों में,लिपट जाऊँ मैं
    आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा।

  • चलो सब मिलकर जीत दिलाएं

    चलो सब मिलकर जीत दिलाएं
    कोरोना को हरायें
    पाँच अप्रैल को सब देशवासी घर में दीप जलाएं
    दीप की ज्योति से अपना घर सँसार सजाएं
    चलो सब मिलकर जीत दिलाएँ
    थू है उनपर जो जमाती
    अश्लीलता के खंजर भोकें
    थूँकते हैं जो मानवता पर
    प्रभु उनपर कोप की अग्नि परोसें
    देश बड़ा है सब धर्मों से प्रज्ञा शुक्ला है कहती
    जो कोरोना से पीड़ित लोगों की
    सेवा में तत्पर हैं उनको देशभक्त है कहती
    ना मरता हिंदू ना मुस्लिम
    मरता है सिर्फ़ इन्सान
    जो नहीं समझते इस बात को
    वो हैं मानवता के शत्रु
    है आप से विनती घर में रहकर
    करो आप देश की भक्ति
    जय हिंद जय भारत कहिये
    अपनी मानवता को मत शर्मशार करिये।

  • पुत्र मोह

    पुत्र मोह में लिपटे प्राण-पखेरू भी उड़ चले आज
    बलि वेदी पर राजा दशरथ भी चढ़ गए आज

    कैसी विपदा आन पड़ी अवध नगरी पर
    जो फली- फूली थी उपवन सी अकस्मात ही उजड़ गई
    प्रेम की फूली डाल अचानक ही लद कर टूट गई

    हाय कैकेई! तेरी कैसी मति गई थी मारी
    कोमल हृदय वाले राम की जो तूने
    ऐसी स्थिति कर डाली

    क्यूँ ना फटा ह्रदय तेरा जब तूने ऐसे वरदान लिये
    राम चले वनवास और राजा दशरथ के प्राण गए

    आँख खुली जब भरत ने कैकेई को त्याग दिया
    राम की चरण पादुका लेकर खुद भी वनवास किया

    जय हो भरत लाल की ऐसा भाई सबको मिले सदा
    राज्य से परम भ्रात भक्ति संसार में जीवित रहे सदा

  • दिल के छाले

    अल्फ़ाज यूँ ही गज़ल नहीं बना करते,
    दिल के छाले भी लफ्जों में बयां करने पड़ते हैं।

  • थोड़ा ठहर

    थोड़ा ठहर जा ज़िन्दगी थक गई हूँ बहुत
    ज़्यादा रफ़्तार अच्छी नहीं होती

  • सुबह मेरी

    बेहया रात से गले मिल कर
    आई है सुबह मेरी
    कि धूप छांव का आलम
    लाई है सुबह मेरी
    मेरी गज़ल भी थी जो लिखी थी एक दिन मैने
    उसकी इबादत में
    उस गज़ल के कुछ पन्ने समेट लाई है सुबह मेरी
    किसे पुकार रहा है ये मेरा जिगर
    बस एक फ़िक्र और भी लाई है सुबह मेरी
    अदावतें निभा कर था जो खो ही गया
    उसे ढूँढ कर लाई है सुबह मेरी
    राहे सुखन में मिट गया तगाफुल उसका
    हमनवाई का बहाना लाई है सुबह मेरी

  • कुछ तो खेल है

    कुछ तो खेल है
    हाथ की लकीरों का
    हाथ ना आया
    लगाया हाथ जिसमें

    न पाने की तमन्ना थी
    मिला हरदम वही मुझको
    जुस्तजू जिसकी थी हमने
    उसी से हाथ धो बैठे

    जिंदगी बन गई वीरान
    और पथरा गई आंखें
    अरमां पड़ गए ठंडे
    सपने हो गए सपने

    किसी ने था कहा हमसे
    सब है खेल किस्मत का
    हमें भी आ गया ऐतबार
    लड़े जब हम मुक़द्दर से

    मंजिल है नहीं आसान
    बहुत मशरूफ है राहें
    कोसते कुछ है किस्मत को
    कुछ बनाते हैं खुद राहें

    ना हारेंगे कभी हिम्मत
    मुश्किलें कैसी भी आएं
    जीत जाएंगे हम दुनिया
    दो कदम रोज चल करके

    दिखा देंगे सभी को हम
    आख़िर क्या थे क्या हैं हम
    बुलंद है हौसले अपने
    मुकद्दर भी बदल देंगे

    लोग जो हंसते हैं हम पे
    नजर झुक जाएगी उनकी
    कुछ तो बात है हममें
    वो भी मान जाएंगे

  • केवट

    समुंदर पार कर दो ए केवट प्रिय मेरे
    पार कर दो गंगा
    प्रिय लक्ष्मण भ्रात है साथ
    और है जनक दुलारी साथ
    जाना है चित्रकूट मुझको
    करा दो गंगा पार
    हे केवट करा दो गंगा पार
    ना पार कराऊँ मैं गंगा
    हे प्रभु! जी मुझको छमा करो
    आपके चरणों की कथा सुनी है
    मैनें कई-कई बार
    इन चरणों की रज से
    पाषण बनी सुन्दर नारी
    यदि मेरी यह नैय्या भी
    बन गई सुन्दर नारी
    तो मैं कित जाऊंगा क्या खाऊँगा
    हे रघुनाथ!
    इस कारण से हे रघुनंदन
    आपके चरण पखार
    उस चरणामृत को पीकर मैं
    कराऊँगा गंगा पार
    सुन रघुनंदन केवट के वचन
    मन्द मन्द मुस्काये
    केवट कितना बड़ भागी
    सबको तारन वाले को नदिया पार कराये
    अपनी मुद्रिका उतार के सीता केवट को देंतीं हैं
    केवट कहता है श्री राम से:-
    क्या कोई नाई किसी नाई से कुछ है लेता
    तुम भी केवट मैं भी केवट
    भला कैसे लूँ खेवाई
    जब आऊँ मैं तेरे घाट तो भव सागर पार करा देना मुझको
    जैसे मैनें गंगा पार करायी मैं ना लूँगा खेवाई।

  • उर्मिला

    सब था मर्यादित रामचरित मानस में
    पर उपेक्षित उर्मिला की वेदना पर
    ध्यान किसी ने नहीं दिया
    जिस सम्मान की वो भागीदार थी
    वह सम्मान किसी ने नहीं दिया

  • हर फ़ैसला

    हर फ़ैसला खुद करने की आदत थी उन्हें,
    बिछड़ने का फैसला भी अकेले कर लिया।

  • इश्क की गोद

    इश्क की गोद में जा बैठी
    जो कातिल था उसी को मीत बना बैठी।

    बुझ गई थी बहुत पहले ही क्यूँ आज
    दिल की आग जला बैठी।

    वो ख्व़ाब था किसी की नींदों का
    क्यूँ उसे अपनी रात बना बैठी।

    जो झूठ के दायरे में रहता था
    क्यूँ उसी के आगे सदाकत की नुमाईश लगा बैठी।

    जख्मों पे नमक चिढ़कना पेशा था जिसका
    दिल के छाले उसी को दिखा बैठी।

    प्यार सुन्दरियों का व्यापार था जिसके लिए
    उसी को मोहब्बत का खुदा बना बैठी।

    ख्व़ाब देखे थे जो हमनें नींदों में
    उन्हीं को छत पर मैं सुला बैठी।

    कितनी पागल है तू ‘प्रज्ञा’
    जो प्रेम का खिलाड़ी था
    उसे ही जज्बातों से खिला बैठी।

  • कुछ दिनों से

    कुछ दिनों से बदल सी गई हूँ
    पहले जीवन में कविता ढूंढ़ती थी
    अब कविता में जीवन ढूंढ़ती हूँ।

  • हर कदम

    इस तरह सतर्क पहले कभी ना थे
    लगी जब से ठोकर
    हर कदम सम्भाल कर रखती हूँ

  • उठ बेटा

    एक पन्ना और जुड़ गया
    जीवन के अध्याय में
    चिरंजीव चिरस्थायी का जो
    आशीर्वाद दिया था माँ ने
    आज धुंधला प्रतीत हो रहा है
    अकस्मात एक प्रारब्ध बेला पर

  • वो बूढ़ी माँ

    एक पन्ना और जुड़ गया
    जीवन के अध्याय में
    चिरंजीव चिरस्थायी का जो
    आशीर्वाद दिया था माँ ने
    आज धुंधला प्रतीत हो रहा है
    अकस्मात एक प्रारब्ध बेला पर
    विचलित कर देने वाली घटना
    स्मरण हुई
    जो अन्तर्मन को दुखा रही थी
    मेरी वेदना के शूल चुभ रहे थे
    नयनों से अश्रुधारा बह चली
    एक माँ के बुढापे का सहारा
    जो मृत्यु की गोद में सो गया था
    अकारण ही दुर्घटना का
    शिकार हो गया था …..
    वो बूढ़ी माँ अपने मृत पुत्र को
    गोद में लेकर कह रही थी:-
    उठ बेटा उठ तुझे भूख लगी होगी कुछ खाले××××
    कुछ बोलता क्यूँ नहीं…
    मैं ऐसा करुण दृश्य देखकर अवाक सी रह गयी××××

  • एक दौर वो भी गुजरा है

    एक दौर वो भी गुजरा है!
    जब हम कागज और कलम
    लेकर सोते थे।

    यादों में पल-पल भीगा
    करती थीं पलकें ,
    अभिव्यक्ति के शब्द
    सुनहरे होते थे।

    ना दूर कभी जाने की
    कसमें खाई थीं
    मिलने के अक्सर वादे
    होते रहते थे।

    कोई यूं ही कवि
    नहीं बनता है यह सच है
    हम भी तो पहले
    कितना हंसते रहते थे।

  • मैं रहूँगा कहाँ ???

    बहुत कोशिशें कर ली उसे मनाने की,
    राहें भी ढूंढी दिल में उतर जाने की ।

    पर नाकाम ही रहे हर कोशिश में हम,
    दिल उदास हो गया गम में डूबे हम…

    फैसला कर लिया उसे
    भूल जाऊँगी,

    चाहे कितना भी बुलाए ना
    पास जाऊँगी…

    सारे कसमें वादे भी हमनें तोड़ दिए,
    यादों के गुप्तचर भी मैनें कब के
    छोड़ दिए …

    पूरा इन्तजाम कर लिया उसे भुलाने का,
    ख्व़ाब भी छोड़ दिया मैनें उसको पाने का…

    निकालने जब उसको मैं चली दिल से,
    बेबस सी लगी खुद को मैं फिर से…

    फिर सोचा उसे दिल से ना मैं निकाल पाऊँगी,
    जो निकाल भी दिया तो ना जी पाऊँगी…

    मेरे अंतर्मन से एक आवाज आई:-
    दिल से निकालना उसे मुनासिब है नहीं,
    मगर दिल निकालने में तो कोई हर्ज़ नहीं…

    दिल चीरने चली जब मैं तो किसी कहा…
    दिल निकाल तो दोगी पर मैं रहूँगा कहाँ….

  • रास्ता कहीं से तो जाता होगा

    वो आते तो हैं
    मेरे आशियाने में..
    मुझी से मिलने मगर जताते नहीं हैं
    बस हम समझ जाते हैं..
    नज़रे झुकाए रहते हैं और
    दिल लगाने की बात करते हैं..
    कितने नादान हैं
    चुपके से देख लेते हैं
    रुख पर मुस्कान लिये…
    मैं जानती हूँ वो तगाफुल
    करने में माहिर हैं
    पर हम भी दिल में
    बस जायेंगे आहिस्ता- आहिस्ता…
    रास्ता कहीं से तो जाता होगा
    उनके दिल तक!
    पहुँच ही जाऊँगी उन तक
    फिर देखूँगी कहाँ जाते हैं
    हमसे बचकर…

  • नींद

    हैरत में हूँ कुछ भी समझ आता नहीं,
    नींद तो मेरी है पर ख्व़ाब आपके।

  • 🙈🙈नींद 🙉🙈

    🤔🤔हैरत में हूँ कुछ समझ आता नहीं
    नींद तो मेरी है पर ख्व़ाब आपके 🙈🙈

  • चिट्टियां

    आरज़ू थी कि मेरे हाथ में तेरा हाथ होगा….
    क्या खबर थी कि
    हाथ सिर्फ़ चिट्ठियां ही आएंगी ।

  • क्यूँ देखूँ

    तुमने कह तो दिया मगर
    दिल को तसल्ली ना हुई
    शब तो हो गई पर
    मैं ना सोई
    गुजार दी ज़िन्दगी तेरी
    आरज़ू करने के बाद
    किसी और को क्यूँ देखूँ तुम्हें देखने के बाद
    रूबरू तुम आये भी नहीं मगर
    महसूस तो किया मैनें हर लम्हा तुमको
    दिल लगा लिया तुमसे मिलने के बाद
    किसी और को क्यूँ देखू तुम्हें देखने के बाद

  • तेरी मोहब्बत में

    तेरी मोहब्बत में आधी उम्र काट दी
    पर क्या करूँ आज भी बेबस हूँ मैं

  • वह लौट कर आया है

    वह लौट कर आया है
    अरसे के बाद के
    मैं हैरान हूं क्योंकि
    उसने कहा था
    मैं जा तो रहा हूं पर
    कभी लौट कर नहीं आऊंगा

  • शायद

    मैनें लाज़ की चादर ओढ़ रखी है
    शायद मेरी ज़मी पे
    तेरे इश्क की बूंदाबांदी हो कभी

  • कुछ सर्द हवा ओं ने

    कुछ सर्द हवाओं ने
    मन महका दिया
    उन हवाओं में जैसे नर्मी सी हो
    छू कर मेरे बदन को रूह तक
    ठण्डा कर रही हैं
    और अपनी खुशबुओं से फ़िजा महका रही हैं

  • बिछड़े थे

    आज कुछ पुरानी यादों के पन्ने पलटकर
    हम वहीं पहुँच गए जहां से बिछड़े थे तुमसे

  • पुरानी यादें

    कुछ खुशबुएँ महकती हैं
    कायनात में
    लिपटे हैं हम
    पुरानी यादों के दामन में ।

  • मेरी स्मृति

    मेरी स्मृति में अब भी कुछ अवशेष शेष हैं
    तुम्हारी यादों के कुछ पल
    मेरे मस्तिष्क में उपस्थित हैं

  • तेरा दर

    लेकर दर्द घूमती हूँ
    हर दर पर
    पर तेरा दर नहीं मिलता
    जाऊँ मैं किधर!!!!!

  • लोग कहते हैं

    लोग कहते हैं कि मैं
    बड़ा कमाल लिखती हूँ
    मैं उसका ही दिया
    हर दर्द उसके नाम लिखती हूँ

  • कोरोना वायरस खाए जाति है

    🇮🇳सीतापुरिया अवधी भाषा:-🇮🇳

    घर ते निकरई मा जियरा डेराति हई
    कोरोना वायरस खाए जाति है।😩😩

    हरि घंटा हम हाँथ धोइति हन
    खाना- पीना हम संतुलितई खाईति हन
    खाँसी आवई मा जियरा डेराति है
    कोरोना वायरस खाए जाति है।

    संतरा-निम्बू हम खातई रहिति हन
    गिलोय घिसि कई हम कात्ता पीति हन
    तुलसी कि पाती सब दिनु भरि चबाति हई
    कोरोना वायरस खाए जाति है।

    दूरई ते सब ते नमस्ते करिति हन
    हाथ हम कोई ते नाई मिलाइति हन
    मुँह का अपने हम ढाकि के रहति हैं
    कोरोना वायरस खाए जाति है।

    स्वस्थ रहें मस्त रहें और व्यस्त रहें

  • क्या है कोरोना वायरस

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    सर्दी खाँसी हो जाती है
    बहुत तेज ज्वर आता
    हांथो पैरों का दर्द
    बढ़ता ही जाता है
    पहले सूखी खाँसी आती है
    फिर ज्वर ज्वलंत हो जाता है

    बचाव:-
    बचाव ही निदान है
    कोई सफल दवा अब
    तक सम्भव ना हो पाई है
    हांथो पैरों और मुँह को
    साबुन से हरदम स्वच्छ रखो
    लोगों के सम्पर्क से दूर रहो
    और आसपास को स्वच्छ रखो
    भीड़-भाड़ में मत जाओ
    मुँह पर मास्क लगा के रखो
    खांसने छींकने से पहले
    मुँह पर कपड़ा या हाँथ रखो

    उपचार:-
    सफल इलाज़ अभी तक
    सम्भव ना हो पाया है
    इसी लिये कोरोना से
    सारा विश्व घबराया है
    गिलोय पीयो और
    खुद को सर्दी खाँसी
    होने से बचाओ
    तुलसी का काड़ा पीते रहो
    बुखार होने पर जाँच करवाओ
    और विटामिन-सी वाली चीजें खाकर
    इम्यूनिटी सिस्टम मजबूत बनाओ।
    god bless you

  • निर्दोष मानोगे???

    मैं जानती हूँ कि तुम भी
    मुझे ही गलत ठहराओगे
    कुछ कहने से कोई फायदा नहीं—-

    मैं कह भी दूँ मैं सही थी
    पर तुम कहाँ मानोगे—

    तुमने जो जिम्मेदारी दी थी
    उसी को पूरा कर रही हूँ —-

    तुम्हीं ने कहा था:-
    ‘ना किसी की तुम सहना’—
    वही कर रही हूँ
    पर तुम कहाँ मानोगे

    क्यूँ बुरा लग रहा है जब
    बात अपनों पर आई—
    मै जानती हूँ
    तुम मुझे निर्दोष मानोगे नहीं

    तुम्हारी संगत में थोड़ी
    निर्भीक हो गयी हूँ

    मै जो कर चुकी हूँ
    वो सही था पर तुम कहाँ
    मानोगे

    तुम्हारी ही तरह सनकी सी
    हो चुकी हूँ जब बात अपनों पर
    आयी तुम मानोगे नहीं

  • जरूरी तो नहीं

    मै जानती हूँ मुझमें
    गुस्सा थोड़ा ज्यादा है
    पर मै दिल की बुरी हूँ
    जरूरी तो नहीं…..

    बड़ो के आगे झुकना चाहिए
    पर हमेशा मैं ही झुकूं
    ये जरूरी तो नहीं….

    आग दिल में लिये कोई आये
    मै शीतल मस्तक ही रखूँ
    जरूरी तो नहीं….

    बड़े सही होते हैं मानती हूँ
    पर हमेशा मैं ही गलत हूँ
    ये जरूरी तो नहीं…

    रिश्तों में सहजता जरूरी है
    पर मैं ही हमेशा अपना
    स्वाभिमान गिराऊँ
    ये जरूरी तो नहीं….

  • अपनो के दिए ज़ख्म

    हर दर्द का इलाज है जहान में
    पर अपनो के दिए ज़ख्म कहाँ भरते हैं
    टूट जाते हैं जो रिश्ते तो फिर कहाँ
    जुड़ते हैं
    कैसी कश्मकश है जिंदगी में
    जो प्रिय होते
    वही बिछड़ते हैं
    कितनी भी कोशिश करो
    खुश रहने की
    जब आंख में आँसू हो तो
    लब कहाँ हँसते हैं
    खुद को बदलने की हर कोशिश
    करती हूँ पर दिल के
    अंगार कहाँ बुझते हैं
    हमेशा मै ही झुकूं
    ये तो मुनासिब नहीं
    स्वाभिमान के अल्फ़ाज
    कहाँ चुप रहते हैं
    हर दर्द का इलाज है मगर
    अपनों के दिए ज़ख्म नहीं
    भरते हैं ।

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