कोई तकलीफ नहीं है हमको उजालों से बस ज़िन्दगी के अँधेरे से डर लगता है रोज़ ही रूठना रहता था तुम्हारा भी बिछड़ने में गम ना होगा चलो अच्छा है तुम भी कहां रहे हो […]

वो बैठते हैं आजकल मेरे रकीबों के साथ जिनके हाथों में रहता था मेरा हाँथ बुरा नहीं लगता है मुझे पर अच्छा भी नहीं प्रतीत होता है क्या करूँ दिल दिल ही दिल में रोता […]

ना वास्ता किसी से रखते हैं लोग…… फिर जाने क्यूँ जिन्दगीं से खेलते हैं लोग….. हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं क्यूँ तैश में ही अक्सर रहते हैं लोग….. किसी की ज़िंदगी से […]

गलतफहमियों के बीज अविश्वास से पनपते हैं अधसुनी बातों को लोग पूरा सच समझते हैं बड़े तो हो चले हैं हम अपनी नजरों में प्रज्ञा ! ना जाने लोग क्यों मुझे अभी छोटा ही समझते […]

चौसर खेलने वाले भी जग में पूजे जाते हैं राज़-काज,अनुज,पत्नी और प्रजा सर्वस्व दांव पर रखकर भी एक भी बाजी ना जीते सर्वस्व हार ही जाते हैं समय की विडम्बना देखो ऐसे लोग भी धर्मराज […]

उनकी बगिया की बहार देखती ही रह गई कली जो खिली थी धूप की तपन में मुरझा गई …… अंजुमन में कितने मशरूफ थे तेरी स्मृतियों के अवशेष बातें बहुत-सी हुईं रह गए बस वचन […]

वो भी दिन थे _________ क्या पल छिन थे जब तुम मेरे हुआ _____________करते थे गीत गुनगुनाते थे प्रेम के लफ्ज़ हुआ करते थे ——‐————- रिमझिम बारिश की फुहार में भीगते थे बदन ——————— होंठो […]

कभी मायूस होती हूँ कभी बेचैन होती हूँ मगर तेरी मोहब्बत में डूबी दिन-रैन होती हूँ, कभी बातें कभी यादें कभी तन्हाई में तुझको भुलाकर सब ओ मेरी जान सिर्फ तुझमें ही खोती हूँ । […]

आज पिघली-पिघली है देखो पथ्थर की दीवार बन्धु,सखा,माँ-बाप सभी छूट रहे हैं विडम्बना देखो समय की कुछ बिछड़ रहे तो कुछ रिश्ते जुड़ रहे हैं जिस आँगन में खेली- कूदी वही छोड़ कर जाती है […]

आज कुछ बदला- बदला मिज़ाज है दिल भी बेताब है ——————– सिसकियाँ भी खामोश हैं लफ्जों में मिठास है ———————- गूंजती जा रही है गलियों में शहनाई ——‐‐‐————– बींद के इन्तज़ार में बीती जा रही […]

जब शोर मचा होता है दिल में खामोशी अच्छी लगती है ————— रात होती है ख्वाबों में तो मायूसी अच्छी लगती है ————— गूंजती है जब बेचैनी तो खामोशी अच्छी लगती है —————-

दर्द के रिश्ते यूँ ही नहीं निभाये जाते मुस्कुराना पड़ता है ——— गहरे जख्म खाने के बाद दिल में लिपटे रहते हैं गम झूँठी हँसी दिखानी पड़ती है —————— चलना पड़ता है राह पर ठोकर […]

एहसास की पावन चौकी पर भाव की मूरत बैठी है ———————- शब्द अलंकार से सुसज्जित हैं और कल्पना की आराधना होती है ———————— इसी को कहते हैं काव्य सौन्दर्य जो हर कवि की आत्मा कहलाती […]

आँचल में अपने छुपाकर वो, दुनियाँ की बुराइयों से बचाती है सारे जहान की खुशियाँ अपने दामन में लिपटाकर हमपर लुटाती है वही आँचल लाज़ बचाता है, और उसी से पसीना सुखाती है स्त्री की […]

स्त्री ऐसी वाणी है हर भाग में पायी जाती है ये तो ऐसा गीत है जो हर राग में गाई जाती है पिता और भाई के संरक्षण में रहती है संरक्षण में वह रहती है,शासन […]

करुँ कितना भी श्रिंगार पर जानती हूँ तेरे आगे कुछ भी नहीं हूँ मैं दीद जिस दिन नहीं होती तेरी चांद छत पर नहीं आता आईना जितनी दफ़ा देखूँ तेरा ही चेहरा नज़र आता

गुलशन फिज़ाओ में यूं ही नहीं महकते हैं इश्क की बूंदाबांदी से खिल उठते हैं एहसास की रोशनी से महक उठते हैं गीत यूंही नहीं बना करते दिल के जख्मों को हरा करते हैं

आसमान धुंधला नज़र आता है आईना तो वही है लेकिन चेहरा गमगीन नज़र आता है आसमान मिटती बनती रहती हैं रेखायें फिर भी नसीब बदलता ना नज़र आता है