Author: Prayag Dharmani

  • सिला दिया उसने

    मेरी वफाओं का खुलकर सिला दिया उसने,
    न रखा एक भी, हर खत जला दिया उसने..

    ‘दूर होने का फैसला क्या खुद तुम्हारा है ?’
    मैंने पूछा तो कैसे सर हिला दिया उसने..

    हमें भी खूब मिली आंसू पोंंछने की सज़ा,
    हँसाया जिसको था अब तक, रुला दिया उसने..

    गैर हाजिर है मेरे दिल से अब उम्मीद मेरी,
    मुझे यकीं है कि मुझको भुला दिया उसने..

    मेरी वफाओं का खुलकर सिला दिया उसने,
    न रखा एक भी, हर खत जला दिया उसने..

  • दुआ कहती है

    “जंग ये खत्म हो लाखों की दुआ कहती है..
    ज़िन्दगी खुद इसे साँसों की जुआ कहती है ।

    सब तो देखा है सिसकती हुई इन आहों ने..
    फिर भी ये बेबसी ‘सब कैसे हुआ’ कहती है ।

    इसी दुनिया ने सिखाया है ज़हर रखना भी..
    आओ देखो ज़रा पूछो क्या हवा कहती है ।

    उन लड़ने वालों का हरगिज़ ना शुक्रिया करना,
    दिल नही कहता अगर सिर्फ ज़ुबां कहती है ।”

    #कोरोनामहामारी

  • माँ तेरी बहुत याद आती है

    जब भी कोई उम्मीद कभी, मेरे सर पर हाथ फिराती है ..
    माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..
    कोई सतरंगी चादर गर, तेरी चूनर सी लहराती है..
    माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..

    जब तक तू थी माँ, थाली में, चटनी अचार न खत्म हुई..
    हर दिन कुछ अच्छा खाने की, इच्छा दिल में ना दफ्न हुई..
    पहले थी फरमाइश पर अब, सूखी सब्जी चल जाती है..
    कितनी भी कोशिश कर लूं पर, अक्सर रोटी जल जाती है..
    अब हर चिराग हर सूरज और, हर शमा तेरे बाद आती है..
    माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..

    बचपन में तूने माँ मेरे, जूतों के फीते बांधे थे..
    कितनी ही दुआओं के धागे, तूने वक्त के बीते बांधे थे..
    कैसे तेरी हर माँग ऐ माँ, अक्सर पूरी हो जाती है..
    मुझको बस इतना बतला दे, तू दुआ कहाँ से लाती है ?
    हर बार बनी तावीज़ मेरा, मुझपे जो कोई बात आती है..
    माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..

  • वतन के वास्ते

    “इसी तरह से हे महासत्य मेरा साथ तुम देना,
    इसी मिट्टी का हो जाने का वर हे नाथ तुम देना ।

    जगत के दृश्य में कर्ता भले कोई भी हो लेकिन,
    मेरे काँधे, मेरे सर पर सदा ही हाथ तुम देना ।

    तुम ही दृष्टा, तुम ही श्रोता तुम ही तो भक्तवत्सल हो,
    अगर आ जाऊँ मैं चलके कभी शरणार्थ, तुम देना ।

    मेरी हर साँस लिख दी है वतन के वास्ते मैंने,
    मेेरे इस देश की खातिर ही मेरा साथ तुम देना ।”

    #15अगस्त

  • पालघर

    ये बेबस सी दिखती है जो, ये उस निर्दोष की पत्नी है,
    जिसे संतों के संग कत्ल किया, ये उस खामोश की पत्नी है ।

    क्या मिला है ऐसा कर तुमको, क्या हासिल कर ले जाओगे,
    इन मज़लूमों की आहों पर कितनी आगे तक जाओगे ?

    जिसने सारथी होकर उस पल, संतों के रथ को खींचा था,
    जिसने परिवार की भूमि को अपनी मेहनत से सींचा था ।

    जिसका निश्चय बस इतना था, कि संतों को ले जाना है,
    जिसने इक पल ना ये सोचा, कि रुकना है या जाना है ।

    इस तरह रचकर चक्रव्यूह, जिसने संतों को मारा हो,
    ना इस जग, ना ही उस जग में, उसका कोई करुण किनारा हो ।

    उसको भी वहशत मार गई, जिसने भगवा का साथ दिया,
    उसको भी धकेला लोगों ने, जिसने उठने को हाथ दिया ।

    ये कैसी रंजिश है आखिर, ये कौन सा क्रोध उतारा है?
    इन मरे हुओं को देखो सब, इन्हें बिके हुओं ने मारा है ।

    इन मरे हुओं को देखो सब, इन्हें बिके हुओं ने मारा है ।

    #पालघरड्राइवर

  • किधर जाऊँगा

    मत निकाल अपने दिल से मुझे,
    मैं तो वक्त हूँ, गुज़र जाऊँगा
    इस भरे शहर में कोई आशना नही,
    ये जगह भी गई तो किधर जाऊँगा ?

    मायने :
    आशना – परिचित

  • मीलों का सफर

    ‘तुमसे तो चंद कदम तय भी हो सके ना कभी,
    मैंने मीलों का सफर चलके ही गुज़ारा है..
    कम से कम तुम पर किसी कत्ल का इल्ज़ाम नही,
    मैंने तो उम्र भर ही ख्वाहिशों को मारा है..’

  • शुरुआत की खातिर

    गम-ए-हयात की खातिर या किसी बात की खातिर,
    हम तो खामोश रहे इक नई शुरुआत की खातिर..
    कुछ रहे पास, खुदा से ये भी बर्दाश्त ना हुआ,
    उसने आंँसू भी ले लिए मेरे, बरसात की खातिर..

    मायने :
    गम-ए-हयात – ज़िन्दगी के गम

  • बेटी

    मैं भी तो नन्ही कली हूँ, तेरे अंदर ही पली हूँ
    तू ही तो ज़रिया है माँ, मैं तेरे कदमों से चली हूँ
    बस मुझे इतना बता माँ,
    क्या मैं बेटे सी नही ? माँ क्या मैं बेटे सी नही ?

    मैंने तेरे पेट में दुनियांं समझकर जी लिया,
    जो मिला तुझसे वही खाया वही था पी लिया..
    क्या हुई मुझसे खता माँ,
    क्या मैं बेटे सी नही ? माँ क्या मैं बेटे सी नही ?

    मैं बड़ी होकर भी तुझ पर बोझ न बनती कभी,
    साज़ बन जाती तेरा मैं, सोज़ न बनती कभी..
    क्यूँ मिली मुझको सज़ा माँ,
    क्या मैं बेटे सी नही ? माँ क्या मैं बेटे सी नही ?

    मायने:
    साज़ – संगीत वाद्य
    सोज़ – जलन

  • ऐतबार

    वो कफन था जो दामन-ए-यार बना फिरता था,
    मेरा वहम मेरे अंदर ऐतबार बना फिरता था..
    कुछ दिखा नही ज़माने में सिवाए मतलब के,
    एक मैं ही था जो दिलों में प्यार बना फिरता था..

  • मजदूर

    वो आसां ज़िंदगी से जाके इतनी दूर बनता है,
    कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है ।
    वो जब हालात के पाटों में पिसकर चूर बनता है,
    कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..

    कसक ये बेबसी की ज़ख्मी पैरों में दिखाई दी,
    कभी लथपथ लहू से बिखरे कपड़ों में सुनाई दी..
    जहाँ पर वेदना-संवेदना के तार बेसुध थे,
    वहाँ पटरी पे बिखरी रोटियों ने भी गवाही दी ।
    कहीं जब बेबसी का ज़ख्म भी नासूर बनता है
    कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..

    वो जिसकी ज़िन्दगी हर रोज़ मिलती कामगारी हो,
    वो तपती धूप से जिसके सफर की साझेदारी हो..
    सफर भर पोछकर बच्चों के आँसू भी चला हरदम,
    वो भूखे पेट होकर जिसने हिम्मत भी न हारी हो
    पसीना जिस्म पर जब मेहनतों का नूर बनता है,
    कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..

    #लॉकडाउन और मजदूर

  • बेगुनाह

    बेगुनाही में अपने पास रख असर इतना,
    आसमाँ खुद कहे कि हाँ ये सही है बंदा..

  • चूड़ी की खनक

    मैं जब कभी कहीं मायूसियों में घिरता हूँ,
    तेरी उम्मीद मेरा हाथ थाम लेती है..
    तेरी मौजूदगी का इल्म इसलिए है मुझे,
    तेरी चूड़ी की खनक मेरा नाम लेती है..

  • कुछ मुझमे सीरत है तेरी

    ‘कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
    कुछ तुझमे अब है असर मेरा..
    तू रह गुज़र सी है मुझमे,
    सब तुझसे ही है बसर मेरा..
    कभी सफर हुआ है मंज़िल सा,
    कभी हमसफर ही सफर मेरा..
    कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
    कुछ तुझमे अब है असर मेरा..’

    ‘मीलों तक सन्नाटा सा कुछ,
    चादर जैसा था बिछा देखा..
    तू एक हलचल का मंज़र थी,
    जिसे न देखा तो क्या देखा..
    कुछ मैं भी मुअत्तर हूँ तुझसे,
    कुछ तुझमे भी है अत्तर मेरा..
    कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
    कुछ तुझमे अब है असर मेरा.. ‘

    ‘शुरुआत नई थी कुछ पहले,
    कुछ चलते चलते वक्त गया..
    तेरे साथ गुज़ारा जो लम्हां,
    वो थमा नही बावक्त गया..
    कुछ तेरा सीधा सादापन,
    कुछ आसां नेक जिगर मेरा..
    कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
    कुछ तुझमे अब है असर मेरा..’

    – ‘प्रयाग’

    अर्थ :-
    मुअत्तर : सुगंधित
    अत्तर : इत्र
    आसां : सरल
    बावक्त : वक्त पर

  • हिंदुत्व

    झुकने नही देंगे देश का सर, बस धुन ये रमाकर बैठे हैं
    माथे पर सादा तिलक नही, हिंदुत्व लगाकर बैठे हैं..

  • हिंदुत्व

    साधु नही आधार स्तंभ थे जो हिंसा की बलि चढ़े,
    हिन्दू धर्म की लाज ये कैसी निर्ममता स्थली चढ़े ।

    है कैसा इंसाफ कि जिसने संस्कृतियों को पाला हो,
    वही भीड़ के हाथों ऐसी बर्बरता का निवाला हो ।

    जुड़े हुए थे हाथ संत के दिया वास्ता भिक्षा का,
    जाने कितनी उम्मीदों से थामा हाथ सुरक्षा का ।

    कैसे एक निरीह साधु का हाथ यूँ तुमने झटक दिया,
    कैसे दिव्य सनातन को यूँ भीड़ के आगे पटक दिया ।

    वो साधु जिसकी रक्षा पर मर जाते मिट जाते तुम,
    रक्षक के माथे कलंक का टीका नही लगाते तुम ।

    आज ये करलो प्रश्न स्वयं से, निद्रा से कब जागोगे,
    दुनिया से छिप लोगे लेकिन खुद से कब तक भागोगे ?

    दे जाओ इतिहास के अब है समय अखंड हो जाने का,
    ऐसा ना हो मौका माँगो कल को तुम पछताने का ।

    अभी देख लो आज वक्त है, ऊपर जाती सीढ़ी को,
    वरना कहना कायर थे हम,आने वाली पीढ़ी को ।

    कई ज्वलंत प्रश्नों की मन में,फांसें देकर चले गए,
    लोग तो जीवन देते हैं वो साँसें देकर चले गए ।

    लोग तो जीवन देते हैं वो साँसें देकर चले गए…#पालघर

  • तस्वीर

    लगाकर सीने से फिरता हूँ मैं तस्वीर तेरी,
    ये वो वजह है जिससे दिल मेरा धड़कता है..

    ‘प्रयाग धर्मानी’

  • रक्षाबंधन

    कुछ इस तरह रिश्ते का मान रह जाए,
    तेरी राखी में बंधके मेरी आन रह जाए..

    तेरे बाँधे हुए धागे की गाँठ जो छूटे,
    मुद्दत्तों बाद भी उसका निशान रह जाए..

    रेत के टीले पर बचपन में घर बनाया था,
    आज इस उम्र में भी वो मकान रह जाए..

    बड़े गिलास में शर्बत के लिए लड़ते थे,
    काश वैसा ही आज भी गुमान रह जाए..

    दौड़ते दौड़ते साईकिल सिखाई थी तुझको,
    गुजरते वक्त को शायद ये ध्यान रह जाए..

    तूने बचपन में ली है मुझसे कई दफा रिश्वत,
    उन्हीं यादों में बसके मेरी जान रह जाए..

    ये सिलसिला कि तू कॉलेज में टॉप कर ले और,
    खिंचे बिना जो कभी मेरा कान रह जाए..

    मुझे पहले की तरह बात हर बताना तुम,
    भावनाओं का ना दिल में उफान रह जाए..

    कुछ इस तरह रिश्ते का मान रह जाए,
    तेरी राखी में बंधके मेरी आन रह जाए..

    – ‘प्रयाग धर्मानी’

  • दिल में सिर्फ राम है

    राम हैं दयाल जग मैं, राम ही कृपाल हैं
    राम ही कवच हैं मेरे, राम मेरी ढाल हैं..

    जिसका एक बाण सागरों को भी सुखा सके,
    कोई कण नही कि जिसमे राम ना समा सकें ।

    माथे पर तिलक का वो निशान लौट आया है,
    हिंदुओं का फिर से स्वाभिमान लौट आया है।

    राम श्रेष्ठ न्यायकर्ता,राम न्याय कर चले,
    सदियों युद्ध में थे, आज राम अपने घर चले ।

    पत्थरों को तार दे, सामर्थ्य मेरे राम में,
    राम मुझमे हैं सदा ही, मैं सदा हूँ राम में ।

    दिल में रख कपट जो मुख पे रखते राम नाम है,
    राम उसके ही हैं कि जिसके दिल में सिर्फ राम हैं..

    राम उसके ही हैं जिसके दिल में सिर्फ राम हैं..

    – ‘प्रयाग धर्मानी’

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