‘मेरे इज़हार पर कुछ यूँ लगा तू हाँ की मुहर, दुनियाँ देखे कि इकरार किसे कहते हैं.. तेरे सिवा मुझे उस पर भी यकीं है ऐ खुदा, हूँ मुतमईन के ऐतबार किसे कहते हैं.. किसी […]

‘देर न लगी मेरी हकीकत के मायने बदलने में, मैं दरिया था कभी मोहब्बत का, आज दिल्लगी का ज़रिया हूँ..’ – प्रयाग मायने : ज़रिया – साधन

‘ऐ मेरी याद-ए-उल्फत सुन, तू इतना काम कर देना, जो उसको भूलना चाहूँ, मुझे नाकाम कर देना.. सुबह का वास्ता किससे, सहर की राह किसको है, तू उसकी ज़ुल्फ़ के साये मे मेरी शाम कर […]

‘तू करले जितना अपने दिल पे इख़्तियार मगर, निगाह जानती है उसकी, अपना वार मगर.. ये भी मुमकिन है आज पहली दफा बच जाए, मगर बचेगा कहाँ और कितनी बार मगर..’ – प्रयाग मायने : […]

चल आ मैदान में पुलकित हो, ना रख चिंता ना विचलित हो.. तेरे मार्ग की हर इक-इक व्याधि, तेरी आत्म शक्ति से परिचित हो.. भय बंधन काट के बाहर आ, नित क्रंदन काट के बाहर […]

‘तेरे एहसास में रहूँगा मैं असर बनकर, या कभी दिल में ही साँसों की रवानी बनकर.. संभालकर मुझे रखना है इम्तेहान तेरा, अब मैं रहूँगा तेरी आँखों में पानी बनकर..’ – प्रयाग मायने : रवानी […]

“साँस लेता हूँ फकत ये भी कोई कम तो नही, ज़िंंदगी तू ही बता मुझपे तू सितम तो नही.. कभी पूछा न ज़माने के शरीफ लोगों ने, ‘दीवाने ये बता कि तुझको कोई गम तो […]

‘सोचता हूँ तो हर वजह ही बेवजह सी लगे, मेरी साँसों से मेरे दिल का वास्ता न होता तो क्या होता…? मुझ पर से गुज़र कर न जाने कितने चले गए, मैं औरो के मक़ाम […]

‘ये चाहता मैं भी हूँ के ठोकरें लगती रहें तेरी, तुझे मैं याद रख सकूँ, ये आग जलती रहे मेरी.. मेरे सब्र को मेरी बेबसी की इन्तेहाँ मत समझना, ये तूफाँ का इशारा है जो […]

‘ये मेरी मोहब्बत की, शिद्दत का सिलसिला था, दरिया था कभी मुझमे, अब उससे जा मिला था.. ज़िद थी गज़ब की मुझमे, तुझको जीताने की, हर बार हारकर भी, जीता जो हौसला था.. मुझमे रवाँ […]

‘इतना कुछ लिखा गया फितरत किताबी आ गई, ज़िंदगी के मंच पर जुर्रत खिताबी आ गई.. उंगलियाँ उठी तो अल्फाजों को ताकत मिल गई, सवाल इतने उठ गए हाज़िरजवाबी आ गई..’ – प्रयाग मायने : […]

‘लड़ा था खुद से ज़मीं पर तेरी खुशी के लिए, फलक में रहके खुदा से भी जंग वही होगी..’ – प्रयाग मायने : फलक – आसमान

‘तेरी खुशी है किसमे, तय कर ये रज़ा अपनी परेशान हो गया हूँ, दुआ बदल-बदल के.. शायद के कोशिशों से, घुट जाए दम भी मेरा, जलती है आग भी अब, धुँआ बदल-बदल के.. होगी तेरी […]

“गौर से देख तू इस दिल के उजड़े मंज़र को, है जो खंडहर कभी आबाद हुआ करता था.. वो जिसे ‘अदना सा शागिर्द’ लोग कहते हैं, वो कभी इश्क में उस्ताद हुआ करता था..” – […]

‘दिखा दिया ये तज़ुर्बा भी ज़िन्दगी ने हमें, हैं कितने शख्स ज़हर, और दवा है कितने.. न रोशनी को इल्म, न ही चिरागों को पता, है कितने बुझने और मंज़ूर-ए-हवा हैं कितने..’ – प्रयाग मायने […]

‘उथल-पुथल सी मुसलसल है ज़ेहन में मेरे, सुकून-ए-इश्क मगर बेशुमार है मुझमे..’ – प्रयाग मायने : मुसलसल – सिलसिलेवार/लगातार ज़ेहन – दिमाग सुकून ए इश्क – इश्क का सुकून

‘वो शख्स, खुद ही जो खाली हो अपने अंदर से, वो दूसरों को खालीपन के सिवा क्या देगा.. झूठ की परतों को परतों पे चढ़ाने वाले, तेरे किए का सिला अब वो आसमाँ देगा..: – […]

‘वो एक पल भी किसी तौर ना हुआ मेरा, जो मैंने बाँधा था मन्नत का धागा, लौटा दे.. के तुझसे एक कदम साथ भी चला न गया, मैं तुझे पाने को हूँ कितना भागा, लौटा […]

‘किनारे रखके ज़माने की नेमतें ए खुदा, मैं तुझसे माँगता फिरता था बस उसे लेकिन.. मेरी मासूम हसरतों को अधूरा करके, दर्द के काम आ गए वो हादसे लेकिन..’ – प्रयाग मायने : नेमतें – […]

‘कुछ इस तरह ज़िन्दगी का फसाना बदल गया, वो क्या बदला कि सारा ज़माना बदल गया.. रिश्तों पर बेरूखी का असर कुछ यूँ हुआ, उसका रूठना बदला तो मेरा मनाना बदल गया..’ – प्रयाग

‘न दुआ लगती है, न मुझको दवा मिलती है ज़ख्म दुखता है अगर उसको हवा मिलती है.. किसी तरह से उसे दिल से निकाला था मगर, वो अगले पल ही मुझे मुझमे रवाँ मिलती है.’ […]

‘गाँव में हाथ, कई हाथ थामे रखते हैं, शहर में खींचने को सिर्फ पांँव होता है.. तरक्की कहने को कितनी ही की हो शहरों ने, यूँ कुछ भी कह लो मगर गाँव, गाँव होता है..’ […]

‘तुझे तो रोक न पाया, किसी तरह लेकिन शायद मैं तेरी याद को नाकाम कर सकूँ.. तू खुद नही मौजूद तो तेरा खयाल है, इतना तो दे दे वक्त के कुछ काम कर सकूँ..’ – […]

‘तेरे खयाल से बस ये सवाल पूछा है, किसी तरह से यूँ खुद को संभाल, पूछा है नही मिला है जब, कोई हमें अयादत को, तेरी ही बेरुखी से अपना हाल पूछा है..’ – प्रयाग […]

‘कुछ दुआ का असर है, कुछ दवा का असर है या फिर ये तेरे शहर की हवा का असर है.. दस्तकें देने लगी मोहब्बत ज़िन्दगी में अब, ये तेरे और मेरे दरमियां का असर है..’ […]

न उसे छोड़कर गया, न कभी जाऊँँगा इसी उम्मीद पर शायद वो ऐतबार करे.. मैं किये जा रहा हूँ अब भी मोहब्बत उससे, होके मजबूर वो कभी तो मुझसे प्यार करे.. – प्रयाग

‘गुज़री कुछ यूँ कि अब तन्हाई से डर लगता है, हमें तो अपनी ही परछाई से डर लगता है.. गहराई अब तो समंदर की बेअसर हैं यहाँ, हमें तो इश्क की गहराई से डर लगता […]

‘आज कहता है दिल कि एक फैसला कर दूँ तुझे दुनियाँँ के सारे सुख कहीं से लाकर दूँ.. तूने उस उम्र में सीने से लगाया हर पल, तुझे इस उम्र में कैसे मैं अकेला कर […]

उठा अपनी आँधियों को, बढ़ा हवाओं का असर, साथ मेरे चल पड़ा है कितनी दुआओं का असर.. अब कभी गिरते नही टूटकर पत्ते शाखों से, मेरे गुलशन पे छाया हुआ है उसकी फ़िज़ाओं का असर.. […]

बड़ी मुश्किल से बना हूँ टूट जाने के बाद, मैं आज भी रो देता हूँ मुस्कुराने के बाद.. तुझसे मोहब्बत थी मुझे बेइंतहां लेकिन, अक्सर ये महसूस हुआ, तेरे जाने के बाद.. ढूंढ रहा हूँ […]