Author: Priya Choudhary

  • जटायु अंत में आंखें खोले

    जटायु अंत में आंखें खोल
    हाथ जोड़ के करे वंदना रोता रोता बोली
    जटायु अपनी आंखें खोली
    जली जो पीले तो वह नहीं पीता राम बचा लो दुखी है सीता
    भक्ति रस में डुबके देखो देखो अशू नयन बोले
    जटायु अंत में आंखें खोली
    खेल रहा जो मौत से क्रीड़ा देखी ना जाती उसकी पीड़ा हरि की गोद में पड़ा हुआ वो माटी का तन डोले
    जटायु अंत में आंखें खोलो
    चलते समय हरी पास मेरे

  • आफताब

    बड़ा इतराता है जुगनू चांद की धूल को मल कर
    तेरी तारीफ तो बस इस रात ने की है
    बेपर्दा कर सके जो अख्ज की भीड़ को इतनी हिम्मत तो
    बस अफताब ने की है

  • गुरु रूप भगवान

    मेरे जीवन की पहली कविता मेरे गुरु को समर्पित
    Teachers Day
    स्कूल का वह दिन मेरे जीवन का एक सबसे खास दिन बन गया जिसे मैं कभी भुला नहीं सकती उस दिन मुझे पहली बार मेरी टीचरों ने बताया कि यह भी एक काबिलियत है आज उन्हीं टीचरों की वजह से मैं आप सबके बीच अरे अपने विचार लिख रही हूं

    गुरु रूप भगवान मेरी
    जा छुपे हैं कहां
    ढूंढ ली है जमी
    मैंने ढूंढ लिया ये आसमा

    पलके झुका के मैंने फिर
    आंखों से यह फरियाद की
    ज्योति रूप में दिखाना मुझे
    छवि मेरे गुरु रूप भगवान की

    कठोरता होती है भले
    जिनकी मार और ललकार में
    तीन लोग का ज्ञान गुरु
    हमें देते हैं उपहार में

    दूर अंधेरा कर देते हैं
    जो गुरु अपने ज्ञान से
    खुद बनकर ज्योति जो
    दूसरों को सदा प्रकाश दें

    जिसने ज्ञान का दान देकर
    जीवन मेरा धन्य किया
    तीन लोक के ज्ञान से
    मेरे जीवन को संपन्न किया

    इतना कहकर जब मैंने
    आंखों को अपनी खोल दिया
    ऐसा लगे गुरु ज्ञान के कारण
    आत्मा से सच बोल दिया

    काश स्कूल लाइफ कैसे जी पाते भले 1 दिन के लिए ही सही

  • देश की मिट्टी

    मैं नहीं रहा अफसोस नहीं
    उस त्याग की भट्टी में जलकर
    मैं देश की धमनी बहता हूं
    इस देश की मिट्टी में मिल कर

  • वीरांगना शक्ति

    त्यागा श्रृंगार ले नयन अंगार
    क्या खूब वीरांगना शक्ति है
    अब पूत खड़ा किया सरहद पर
    क्या प्रबल राष्ट्र की भक्ति है

  • महफिल

    जाने के बाद तुम्हारे
    हम दोस्त तो बनाते हैं
    वो महफिलों में खो जाते हैं
    हम फिर अकेले हो जाते हैं

  • शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

    शक्ति संपन्न की जनक दुलारी
    जब तुमने लांछन लगाया था
    चाहती प्रलय वो ला सकती थी
    धरती की गोद में सो जाती है
    शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

    धरती पर एक कण बचता
    जो काली शांत ना होती तो
    अर्धांग की छाती पैर धारा
    फिर दुख संताप में खो जाती है
    शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

    जब क्रोध में नारी रोए तो
    घर में महाभारत हो जाती है
    अपने परिवार में शांति रहे
    आंसू से क्रोध को धो जाती है
    शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

    जाने कितनी वीरांगना भारत में
    रण जाने को खड़ी हो जाती है
    खंजर की धार देखे उंगली पर
    फिर लहू देख खुश हो जाती हैं
    पर शुक्र मनाओ कि रो जाती हैं

  • सीरत

    कोई दिल दरबारे खास बने
    तो जान निछावर करते हैं
    हमें सूरत की प्रवाह नहीं
    सीरत से मोहब्बत करते हैं

  • क्रांति की धारा

    मेरे देश मुझे तेरे आंचल में
    अब रहने को दिल करता है
    जो जख्म दिए अंगारों ने
    उसे सहने को दिल करता है

    कांटो पर जब तू चलता था
    हम चैन से घर में सोते थे
    हम देश पराए जाते थे
    तेरी आंख में आंसू होते थे

    क्रांति की आग में अर्थी थी
    यह खून से रंग दी धरती थी
    हर मां की आंख में आंसू थे
    चौराहे लाश गुजरती थी

    सीने पर जख्म हजारों थे
    सुनसान यह गलियां रहती थी
    यह वेद कुरान भी ठहर गए
    आंसू की नदियां बहती थी

    मैंने हिमालय की धरती पर
    सिंहासन लगाकर देखा था
    हथियार की महफिल सजतिथी
    हर गली में बैठा पहरा था

    यह धरती फिर आजाद हुई
    इसे थाम लिया रणधीरओं ने
    विजय आजादी का आकर
    आगाज किया था वीरों ने

    आज विदेशी छोड़ दिया
    स्वदेशी का आगाज हुआ
    है मेरा नमन उन वीरों को
    जिसने भारत आजाद किया

    🇹🇯 जय हिंद 🇹🇯

  • आखिर क्या बदला

    🥀आखिर क्या बदला बेटी के लिए 🥀

    जब पिता की तरफ से दहेज आता था तो पति कहता था तो कितना लाई तेरे आने पर
    पति की तरफ से दहेज आता है तो पति कहता है मैंने कितना दिया तुझे लाने पर

  • ज्ञान की वैशाखी

    💐 शायरी 💐

    पंछियों के बगीचे आसमान में होते हैं
    बुद्धिमानी के चर्चे जहान में होते हैं
    उठाकर जो चलते हैं ज्ञान की वैशाखी
    हजारों सितारे उसकी शान में होते हैं

  • सकरात की रंग

    आज मैं खुश हूं सभी बुराई
    पोंगल पर्व में झोंक
    जलधर फाटक आज ना बंद कर
    पतंग ना मेरी रोक

    सजि पतंग वैकुंठे चली थी
    अप्सरा संग करे होड़
    रंभा मेनका झांक के देखे
    किसके हाथ में डोर

    बारहअप्सरा सोच में पड़ गई
    कैसी यह रितु मतवाली
    कल्पवृक्ष से धरा द्रम तक
    सबकी पीली डाली

    सब वृक्षों की डाल से उलझे
    पवन के खुल रहे केश
    केशु रंग फैलाते फिर रहे
    कहां है कला नरेश

    नदी नहान को तांता लग रहा
    मिट रहे सबके रोग
    मूंगफली ,खिचड़ी ,तिल कुटी का
    देव भी कर रहे भोग

  • सकरात के रंग

    आज मैं खुश हूं सभी बुराई
    पोंगल पर्व में झोंक
    जलधर फाटक आज ना बंद कर
    पतंग ना मेरी रोक

    सजि पतंग वैकुंठ चली थी
    अप्सरा संघ करे होड़
    रंभा मेनका झांक के देखे
    किसके हाथ में डोर

    बारह अप्सरा सोच में पड़ गई
    कैसी रितु मतवाली
    कल्पवृक्ष से धरा द्रम तक
    सबकी की पीली डाली

    नदी नहान को ताता लग रहा
    मिट रहे सबके रोग
    मूंगफली ,खिचड़ी ,तिल कुटी का
    देव भी कर रहे भोग

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