Author: rajesh arman

  • अजैविक गम

    अजैविक गम की खाद से
    ख़ुशी हो गई बोन्साई
    राजेश’अरमान’

  • होठों पे

    होठों पे ख़ामोशी की लहरें
    ढूंढ़ती है लफ़्ज़ों के समुन्दर
    राजेश’अरमान’

  • कुछ तो बात है तेरे शहर की

    कुछ तो बात है तेरे शहर की
    ये ज़ख्मों को भी तन्हा नहीं रखते
    राजेश’अरमान’

  • सलीका

    वो खफा है अब इस बात पर
    आता नहीं सलीका गम उठाने का
    राजेश ‘अरमान’

  • जो अब न रहा

    ज़िक्र तिरी वफ़ा का मसला था , जो अब न रहा
    मैं कब तिरी आँखों में बसा था, जो अब न रहा

    इक बुतखाने की तिश्नगी से बढ़कर कुछ नहीं
    कभी बुलंद जमाना मैं था ,जो अब न रह

    मेरी आवाज़ह भला क्यों करता ये तेरा शहर
    मैं इक मिसाल हुआ करता था ,जो अब न रहा

    हवाओं के रहमोकरम पर जलता मैं कोई चराग हूँ
    खौफ बुझने का अक्सर होता था, जो अब न रहा

    नब्ज़ भी कुछ तेज थी ,फ़िज़ां भी थी कुछ बीमार
    वो तेरे मौसम का इक ज़ख्म था ,जो अब न रहा

    अपनी दीवानगी के अज़ाब कुछ कम करों ‘अरमान’
    वो पहले का जमाना था दौर ,जो अब न रहा

    राजेश’अरमान’

    आवाज़ह= चर्चा, प्रसिद्धि
    अज़ाब= पीड़ा, सन्ताप, दंड

  • गुज़ारिश गुज़ारिश

    गुज़ारिश गुज़ारिश

    गुम हुआ अपने शहर की गलिओं मेँ अपना साया है
    मैंने भी कब अपने शहर का कोई क़र्ज़ चुकाया है

    अब तो हो गए वो रास्ते भी किसी अजनबी से
    जिन रास्तों ने कभी तुमको चलना सिखाया है

    उम्र गुजरी है गैर लोगों को अपना बनाते हुए
    अपने लहू को मगर मैंने ही ठुकराया है

    ताउम्र ढूंढ़ता रहा अक्स अपना अजनबी शहर में
    मैंने खुद अपने हाथों से शहर अपना दफनाया है

    माना ख्वाइशों का जुनूँ हर एहसास पे भारी है
    तेरी खवाइश ने तेरे अपनों को बहुत रुलाया है

    सोच के देख तू ज़िंदगी में , इतना तनहा हुआ कैसे
    न पास अपने माँ का आँचल, न अपनों का साया है

    इक दिन वो भी आएगा होगा तुझे भी महसूस
    इस ज़माने ने कब किसी गैर को अपनाया है

    अपनी मिटटी ,अपनी फ़िज़ाओं पे ऐतबार तो कर
    अपने वास्ते भी ख़ुदा ने सब कुछ वहां बनाया है

    एक दिन कभी . बैठ के करना हिसाब लम्हों का
    तूने ज़िंदगी में कितना खोया ,कितना पाया है

    तालीम लेता है इंसा तरक्की की खातिर लेकिन
    खुद को खोना मगर किताबों ने नहीं सिखाया है

    गुम हुआ अपने शहर की गलिओं मेँ अपना साया है
    मैंने भी कब अपने शहर का कोई क़र्ज़ चुकाया है

    राजेश ‘अरमान’

  • फेहरिस्त में भुलाने के नाम

    फेहरिस्त में भुलाने के नाम, मैं रोज़ सजा लेता हूँ
    इसी बहाने मैं सबको , याद करने का मज़ा लेता हूँ

    चाक किस्मत के रहने दो ताउम्र मेरी जागीर की तरह
    अपने हिस्से के गुनाहों की मैं हर रोज़ क़ज़ा लेता हूँ

    आये मौसम कोई भी मगर, टिकते कहाँ बदलते रहते है
    मैं वो मौसम हूँ जो सदा ,खुद में छुपा ख़ज़ां लेता हूँ

    तेरे खत आज भी रखता हूँ ,किसी वसीयत की तरह
    रोज़ लिख के तुझे खत ,तन्हाइयों में खुद जला लेता हूँ

    क्या कोई किसी को भूलने की , कोई दवा होती है
    तमाम कोशिश कर के देखा मगर ,खुद ही को भुला लेता हूँ

    क्या परस्तिश तेरी पशेमाँ होके बस रह गई ‘अरमान’
    चल एक बार फिर तेरी बंदगी के , इलज़ाम उठा लेता हूँ

    राजेश’अरमान’

  • जो यादों में बसा है

    जो यादों में बसा है ,उसे वहीँ रहने दो
    मेरी दी हुई हिचकिओं में, उसे रहने दो

    आज साकी तू रुख से पर्दा नहीं नक़ाब उठा
    मैखाने के बातें बस मयखानों तक रहने दो

    किसने देखे है कितने ज़माने हिसाब न कर
    मेरे ज़ख्मों के जमाने बस साथ रहने दो

    कोई पूछे सबब फिर तन्हाई का तो कह देना
    मेरी तन्हाई मेरी दवा है जिसे बस रहने दो

    मुद्दत हुई कोई नया गम न पा सके ‘अरमान’
    अपने ज़ख्मों के खजाने , यूँ न पड़ा रहने दो

    राजेश’अरमान ‘

  • nazm

    कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई
    रात भर वो शाम दरवाज़े पे देती रही दस्तक
    कुछ धुँधले से साये करीब आकर छूते तो है
    अपना पता पूछते है मुझ अजनबी से
    कोई लफ्ज फिर गुमसुम है होठों पर
    फिर कोई सदा टकराई है कानों में
    चौंकते दिन की शक्ल में रात फिरती है
    कई रातें बिखर जाती है छोटी छोटी रातों में
    कहीं कुछ सहमे हुए मैं बिखरे है भीड़ में
    और तलाश है अपने ही किसी टुकड़े की
    हाथ की रेखाओं सा बना कुछ जाल
    अंदर से झाकता हुआ कोई और मुझसा
    लेता हिसाब शामों का, करता कई सवाल
    सिहर के निकलती बस यही आवाज़ दबी
    कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई
    राजेश ‘अरमान’

  • soch

    अपनी उलझनों के हम यूँ आदी हो गए है
    कभी मुजरिम तो कभी फरियादी हो गए है
    न होता कुछ तो कुछ और जरूर होता
    बस इसी सोच में कोई बर्बादी हो गए है
    राजेश’अरमान’

  • तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं

    तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं
    प्यार तो दूर बहुत मैं तेरी नफरत भी नहीं

    क्या दबा रखा है अंदर किसी खंजर की तरह
    अब मरासिम न सही मगर ऐसी अदावत भी नहीं

    ज़ख्म गीले है अपने कहीं तो निशां रहेंगे लेकिन
    दिल में इक शोर है मगर ऐसी बगावत भी नहीं

    अपने अंदर हूँ खुद किसी अजनबी की तरह
    जान पहचान की मगर कोई फुर्सत भी नहीं

    यूँ तो मिलते है सभी अपने ही सायों की तरह
    हाथ तो बढ़ते है मगर ऐसी कुर्बत भी नहीं

    राजेश ‘अरमान’
    २०-०२-२०१६

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