पिंजरे तो खोल दिए लेकिन
पंछी उड़ गया पिंजरे लेकर
राजेश’अरमान’
Author: rajesh arman
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पिंजरे तो खोल
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बरपने लगा
बरपने लगा शोर कुछ अपने पाले सन्नाटों में
कुछ उधर भी है खलबली उनके दिए काँटों में
माना की कोई मरासिम नहीं उनके सायों से ,
अब भी मौजूं है मगर हर किसी की आहटों में
राजेश’अरमान’ -
दरके आइनों को
दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है
गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत हैफासले वस्ल के यू सायें से बढ़े जाते है
ये कोई मिलना या तुम्हारी रुखसत हैहरसूँ बिखर गए तेरे पन्नें नसीब के
अब तो खाली जिल्द की हसरत हैवक़्त रूठा किसी बच्चे की माफिक
जिसकी जिद है या कोई शरारत हैअब किस और जहान जाएँ’अरमान’
जिस तरफ देखिये बस नफरत हैदरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है
गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत हैराजेश’अरमान’
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कहाँ तो आरजुएं थी
वक़्त की चाल के अंदाज़ निराले तो न थे
ख्वाब ही सो गए लेके कोई करवट शायदकहाँ तो आरजुएं थी तेरे मिलने की
यां तो खुद ही हिस्सों में बट गए शायदजुबान पे क्यों कोई इल्ज़ाम रहें
खता मेरी जो चुप रह गए शायदमैं ही चल न सका साथ कारवां के
फ़ासले काफिलों से यू बढ़ गए शायदहर सीने में मंज़िलें धड़कती है
यही रिश्ता बस रह गया शायदनिस्बत कुछ इस तरह निभाई गई
पास रहकर भी दूर रह गए शायदचंद कतरे भीगे साथ रख ‘अरमान’
अब आँखों में नमी आ जाये शायद -
धुंधले आईने में
धुंधले आईने में कोई अक्स नज़र नहीं आता
वक़्त की सुईया पकड़ने से वक़्त ठेहर नहीं जातावो चिरागों सा रोशन कभी एक नूर सा था
क्या हुआ शख्स अब वो नज़र नहीं आताकहता रहा रहने दो रिश्तों को पर्दों में
कुरेदने से सच रिश्तों का बदल नहीं जाताउसकी हसरत थी महफूज उसके हाथों में
हाथों की जिन लकीरों को कोई बदल नहीं पाताकौन देखेगा इन हवाओं में मुड़ के ‘अरमान’
साथ दुनिया के आखिर वो क्यों चल नहीं पाताधुंधले आईने में कोई अक्स नज़र नहीं आता
वक़्त की सुईया पकड़ने से वक़्त ठेहर नहीं जाता
राजेश ‘अरमान’ -
रिश्तों की बानगियाँ
रिश्तों की बानगियाँ अब तेजी से बदलने लगी है
वास्ता लाश से कम कफ़न से ज्यादा हो गया है
राजेश’अरमान’ -
ऊंची दीवारें भी पल
ऊंची दीवारें भी पल में मिट जाती है
बस नज़रें दीवार के पार जानी चाहिए
राजेश’अरमान’ -
हर सांस है मुजरिम न
हर सांस है मुजरिम न जाने किस गुनाह में
हर ख्वाईश है क़ैद न जाने किस गुनाह मेंन कुछ बस में तेरे न कोई डोर हाथ में
जाएँ तो ज़िंदगी किन क़दमों की पनाह मेंथमा वक़्त कभी तेज भागता वक़्त बेपैबंद
हर लम्हा दुबका बैठा ज़िंदगी की राह मेंख्वाब के बाद ऑंखें सदा खुली रखना
न जाने कब आ जाएँ कोई निगाह मेंकब तलक खुद को बहलाएगा ‘अरमान’
फिर किसी अजनबी से मरासिम की चाह मेंहर सांस मुजरिम है न जाने किस गुनाह में
हर ख्वाईश क़ैद है न जाने किस गुनाह मेंराजेश ‘अरमान
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ज़िंदगी कभी गूंथे हुए
ज़िंदगी कभी गूंथे हुए आटे की तरह लगती
कभी फायदे की कभी घाटे की तरह लगतीआस के फूल हर शाख पे खिलने दो
टूटी आस चुभते हुए काटें की तरह लगतीवक़्त की मार से कब कौन बचा यारों
कभी मुक्के तो कभी लातों की तरह लगतीख्वाइश से उगती खवाइश का खेल ज़िंदगी’अरमान’
कभी चुप तो कभी चीखते सनाटे की तरह लगतीज़िंदगी कभी गूंथे हुए आटे की तरह लगती
कभी फायदे की कभी घाटे की तरह लगती
राजेश ‘अरमान’ -
कोई दिल का मेरे चारागर होता
कोई दिल का मेरे चारागर होता
यूँ न तन्हा मेरा सफ़र होता
आज फिर दिल ने आरजू की है
घर के अंदर मेरा घर होता /
वो जो रहते थे हमसाये की तरह
मेरी परछाई में फिर क्यों न बसर होता
अब गिला क्या करें किन बातों का
गर जो होना था कुछ असर होता
आज मैं दूर बहुत दूर चला आया हूँ
काश के पास मेरा शहर होता/…
जुस्तजू की भी कोई होती अगर जुस्तजू
फसले-गुल न होती, न कोई शजर होता
कोई दिल का मेरे चारागर होता———–
RAJESH ‘ARMAN’ -
हर लम्हा गुजर गुजर
हर लम्हा गुजर गुजर कर कुछ कह गया
अपनी आँखों में हल्का सा कुछ तैरता गया
ज़िद जिनकी थी वो ज़िद में रह गए
हाथ से उनके कोई फैसला सा गया
ज़िंदगी कुनकुनी धुप तो कभी चुभती तपन
वो कहते क्यों वो कुम्हलाया सा गया
असर किसी का किसी पे होने में
वक़्त लगता मगर किसी से लगाया न गया
फासले कैसे भी हो मिट सकते है
सरहद की तरह कभी हमसे बनाया न गया
जिसको हासिल बुत सी ख़ामोशी ‘अरमान’
क्यों कहते उससे हाथ मिलाया न गया
राजेश ‘अरमान’ -
रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
तंगदिल है मेरा या तेरा सिलसिला क़ाफ़िर
न तुम समझे न कुछ हम समझ नहीं पाएं
वक़्त के वलवले कुछ कम नज़र आते
ज़ख्म अपने ही मगर भर नहीं पाएं
तेरी रुखसत से जुड़ा कोई किस्सा हूँ
पढ़ना चाहा भी मगर पढ़ नहीं पाएं
अपनी मर्ज़ी भी कोई मर्ज़ी है ‘अरमान’
जो हुआ हम कुछ कर नहीं पाएं
रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
राजेश ‘अरमान’ की बरसात
कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
तंगदिल है मेरा या तेरा सिलसिला क़ाफ़िर
न तुम समझे न कुछ हम समझ नहीं पाएं
वक़्त के वलवले कुछ कम नज़र आते
ज़ख्म अपने ही मगर भर नहीं पाएं
तेरी रुखसत से जुड़ा कोई किस्सा हूँ
पढ़ना चाहा भी मगर पढ़ नहीं पाएं
अपनी मर्ज़ी भी कोई मर्ज़ी है ‘अरमान’
जो हुआ हम कुछ कर नहीं पाएं
रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
राजेश ‘अरमान’ -
एक जरूरी दस्तावेज
एक जरूरी दस्तावेज ही तो है जीवन
न कागज़ अपना न स्याही अपनी
फिर भी भ्रम अपना कहने काअपनी सासें अपनी धड़कन से विवाद करती
कभी तालमेल नहीं मन से मन का
फिर भी भ्रम अपना कहने कामन से मन मिलता नहीं फिर भी
हर संयम अपना ही उपहास करता
फिर भी भ्रम अपना कहने कायथार्थ हो गए पुराने अख़बार से
हम लिपट गए किसी शै की तरह
फिर भी भ्रम अपना कहने काराजेश ‘अरमान’
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मुड़े कागज़ की तरह
मुड़े कागज़ की तरह माथे की लकीरें बन गई है
मेरी किस्मत की हाथों की लकीरों से ठन गई है
अपने हिस्से की गिरवी रखी उदासी को
देख अब उस पे कितनी सूद चढ़ गई है
माना हस्ती अपनी खुद की न कतरे से जुदा
खुद ये कतरा मेरा आईना बन गई है
मेरी कलम से निकली हुई स्याही यूँ हुई खफा
ज़ीस्त अपनी कोई बिगड़ी कहानी बन गई है
क्या है अर्ज़ तेरी कौन सुनेगा ‘अरमान’
ख्वाइशें खुद बखुद खौफ बन गई है
मुड़े कागज़ की तरह माथे की लकीरें बन गई है
मेरी किस्मत की हाथों की लकीरों से ठन गई हैराजेश ‘अरमान’
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कभी तो मेरे माजी
कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ
जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ
माना की शब की जीस्त दुआओं से है भरी
हो असर ऐसा ख़्वाबों को सहर कर दिया जाएँ
फूल भी चुभते रहे ताउम्र किसी खंजर की तरह
चलो किसी खंजर को फूलों से भर दिया जाएँ
लाजिमी हो के कुछ वक़्त यू भी मिल जाएँ
किसी पिंजरे से रिहा खुद को कर दिया जाएँ
तिश्नगी सेहरा की न थी इस दिल को ‘अरमान’
कभी ऐसा हो तस्सवुर में समुन्दर भर लिया जाएँ
कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ
जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ
राजेश ‘अरमान ‘ -
पत्थर ही पत्थर है दिल
पत्थर ही पत्थर है दिल की जेब मेँ
है बड़ी सच्ची मगर गर्दिशों की बात है
अब के गर्मिओं मेँ ठंडक है तो हैरत किसलिए
किस कदर गर्मियां थी पिछली सर्दियों की बात है
किस कदर ओढ ली थी तुमने ख़ामोशी की चादर
अब के गर्मिओं मेँ ये आई कैसी बरसात है
न कोई शिकायत न कोई मूह फेरने की रस्म
ऐसी चुप सी मुलाक़ात भी कोई मुलाकात है
तेरे सवालों की कोई किताब नहीं ‘अरमान ‘
ज़िंदगी तो खुद अपनी एक सवालात है
पत्थर ही पत्थर ——–
राजेश ‘अरमान ‘ -
जाते जाते कुछ कह गयी ज़िंदगी
जाते जाते कुछ कह गयी ज़िंदगी
समझ पाया तो ढह गयी ज़िंदगीकरते गुजरा हर सांसों का हिसाब
ज़िंदगी से कुछ कम रह गयी ज़िंदगीपहलूँ में लिए बैठे कई चाँद उदास
जाने क्याक्या न सह गयी ज़िंदगीलम्हां लम्हां मिलके सजी मिलके बनी
जाते जाते चुपचाप कह गई ज़िंदगीउम्र गुजरी किसी सेहरा में ‘अरमान’
आखरी दौर दरिया में बह गयी ज़िंदगी
राजेश ‘अरमान’ -
बिखरे ख्वाबों को
बिखरे ख्वाबों को बारहा चुनता क्या है
ज़ख़्म तो जख्म है बारहा गिनता क्या हैइन हवाओं से कब कोई मुड़ के देखा
सेहरा की रेत पे बारहा लिखता क्या हैगैर हो न सके, न अपनों में रहे
देख तजुर्बों से तुझे दिखता क्या हैवो बैठा रहा सच की बाँहों में
देख सही तेरे बाजार में बिकता क्या हैयही दुंनिया के दस्तूर रह गए ‘अरमान’
डूबते चाँद को बारहा तकता क्या हैबिखरे ख्वाबों को बारहा चुनता क्या है
ज़ख़्म तो जख्म है बारहा गिनता क्या है
राजेश’अरमान’ -
हर चेहरे अपने पर
हर चेहरे अपने पर कोई आश्ना न मिला
गिला खुद से मगर कोई आईना न मिलाअपनी तक़दीर-बुलंदी का क्या कहना
बर्क़ को जब कोई आशियाँ न मिलाफ़िज़ां मिली तो मगर खुशगवार न थी
तल्खियों भरा कोई सेहरा न मिलाहस्ती अपनी जमाने में जुदा निकली
कोई शख्स शहर में जब बेजुबान न मिलाएक चुप से लिपट बैठा ‘अरमान’
क्यों कहते हो कोई तज़ुर्बा न मिलाराजेश’अरमान’
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सिर्फ एहसास है
सिर्फ एहसास है वफ़ा फिर छूने को जी करता है
यह कौन देता है सदा सुनने को जी करता हैहर शख्स का वज़ूद जुदा फितरत भी जुदा
फिर भी उम्मीद वो खुद के वज़ूद सा करता हैक्या हो तामीर तेरे घर की तेरी आरज़ू से जुदा
हर दरीचा मेरे जेहन का तेरी गली खुलता हैये अंधेरों की है वफ़ा या उजालों की जफ़ा
ज़ख्म इक मगर दर्द बारहा मिलता हैकितने कुचले हुए लिए बैठा है ‘अरमान’
कोई उजड़ा हुआ गुलशन कभी खिलता हैराजेश ‘अरमान’
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बुझे चरागों को हवाओं
बुझे चरागों को हवाओं का करम न दे
मेरी हस्ती मिटने का कोई भरम न देजो गुजरा नहीं खुद , मगर आखिर गुजरा
तुम फ़क़त कोई उदास सा वहम न देजुबाँ जो है हाथों को कोई खंजर क्या दे
मेरे ज़ख्म हरा रख, कोई मरहम न देफिर कोई मौसम गुजरा मेरे वीरानो में
तेरी चुप से लिपटा कोई मौसम न देजो भी लिखता, दिल से लिखता ‘अरमान’
मेरे इन हाथों को कोई कलम न देबुझे चरागों को हवाओं का करम न दे
मेरी हस्ती मिटने का कोई भरम न दे
राजेश ‘अरमान’ -
मेरे सफिनों का नाखुदा हो
मेरे सफिनों का नाखुदा हो , जो तूफानों का तलबगार न हो
मुझे ऐसा चराग बना दे जो हवाओं का कर्ज़दार न होमेरे हिस्से की हर शे पे लिख दिया तेरा नाम आखिर
गिला करें वो हरदम और तेरा तरफदार न होऐसा कोई सौदा न हो और कोई सौदाई भी न हो
बिक जाएँ जहाँ मेरी वफ़ा ऐसा कोई बाजार न होज़ीस्त की राहों में ऐसा किसे नसीब गुलशन
फूल की चाह हो और हाथों में खार न होमत ओढ़ के सो जाना चादर किसी वीरानी की
कौन समझेगा इसे कहीं हस्ती तेरी शर्मशार न होन हो ऐसा कोई लम्हा मेरी किस्मत में ‘अरमान’
ख्वाब देखूं तो तेरे चेहरे का दीदार न होराजेश ‘अरमान’
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कतरा कतरा लहूँ का
कतरा कतरा लहूँ का जिस्म में सहम गया
चलो इसी बहाने रगों में बहने का वहम गयावो कोई हिस्सा था मेरे ही जिस्म का
जुदा हुआ वो तोड़ कोई कसम गयामेरे मिटने की तारीख एक फ़लसफ़ा ही थी
जाने क्यों बाँट वो मेरी मौत का परचम गयाकब था इंकार मुझे मेरी तन्हाई के सौदे का
वो देख खुद मेरी तन्हाई आखिर सहम गयावो तेरे लब्ज़ों की बाज़ीगरी न थी तो क्या थी
फिर कोई छेड़ मेरे ज़ख्मों में कोई नज़्म गयाकोई फ़रियाद क्या करें अपनी सांसों से ‘अरमान’
जब सांसें ही हो क़ातिल ,ठहरा मुझे मुजरिम गया
राजेश ‘अरमान’ -
उसने खौफ से कभी
उसने खौफ से कभी आइना साफ़ न किया
आ जाएँ न नज़र कहीं तस्वीर साफ़ उसकी
राजेश ‘अरमान’ -
तजुर्बों से सीखा
तजुर्बों से सीखा मगर बस इतना सीखा
फिर गिर पड़े तज़ुर्बा जो गिरने का था
राजेश ‘अरमान’ -
हम लुत्फ़ कुछ
हम लुत्फ़ कुछ बारिशों का यूँ उठा रहे है
अपने आंसुओं को बारिशों में छुपा रहे हैउसी को याद करना और हमेशा याद रखना
किसी को भूलने की क्या अदावत निभा रहे हैहम तो हो गए कायल अपने नए हुनर के
खाक दीवानगी की हर तरफ उड़ा रहे हैअभी तो कारवां कोई गुजरा नहीं फिर भी
जनाब आप आखिर किस गुबार से घबरा रहे हैजहाँ में कौन कब किसी का हुआ ‘अरमान’
बस ये सोच हम तबियत अपनी बहला रहे हैहम लुत्फ़ कुछ बारिशों का यूँ उठा रहे है
अपने आंसुओं को बारिशों में छुपा रहे है
राजेश’अरमान’ -
मेरे तस्सवुर के रंग
मेरे तस्सवुर के रंग क्यों फीके होने लगे है
मेरे सायें भी अब मुझसे दूर होने लगे हैमैंने गिन गिन के सजाये थे जो मेरी वसीयत थी
वो लम्हे क्यों मेरी ज़िंदगी से कम होने लगे हैमाना की जुस्तजू से ताल्लुक रखना है गुनाह
अब तो हर ताल्लुक मेरे अपनों से खोने लगे हैमिज़ाज़ वक़्त का होता है किसी मदारी जैसा
हम भी चुपचाप किसी खेल में होने लगे हैअपने दरवाजें को बंद कर दे ‘अरमान’
ख्वाब आँखों में आके फिर सोने लगे है
राजेश’अरमान’ -
रिश्तों का सत्य
रिश्तों का सत्य जो लगता यथार्थ से परे सदा
मानते हुए छलावा हम जुड़े रहना चाहते है सदाये रिश्तें जो खून से बनते ,खून में ही पनपते है
अंत होता है खून में ही ये सनते है सदाइन्हे तोड़ने का साहस भी न कोई जुटा पाया कभी
है कोई इस खोखलेपन से गहरा जुड़ा है सदाअदा करना जरूरी नहीं जितना जताना जरूरी है
इन रिश्तों ने जताया है अपना हक़ वो सदाजिसे सीखे गए बस औरों को सीखने के लिए
सिखाये है रिश्तों ने ऐसे ही दस्तूर सदाइन रिश्तों का भ्रम कब तक कोई पाले
अहसास एक पल भी न होने का रहता है सदातोड़ डाले पर होगा ये यथार्थ से सीधा पलायन
जुड़े बैठे है अनचाहे इन रिश्तों से सदाराजेश’अरमान’ ०५/०२/१९९२
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फूलों की हसरत
फूलों की हसरत की ,यही कसूर है मेरा
काटें ही काटें मिले ये नसीब है मेरासोचा था तूफां से कस्ती पार निकल जाएगी
तूफां का क्या कसूर, निकला नाखुदा नासेह मेराकल तक जो अपने थे बन गए बेगाने खास
रिश्तों की डोर से कुछ ऐसा है ताल्लुक मेराफूल लगे गैर मुझे काटें कुछ अपनों से लगे
बस यही गुलशन से है शायद रिश्ता मेरायाद कर के फिर हो जाता उदास ‘अरमान’
सूखे पत्तों की तरह हो गया वज़ूद मेरा -
ज़िंदगी धुप -छोंव्
ज़िंदगी धुप -छोंव्
तपती रेत धसते पाँवराही सुप्त
बिखरे ख्वाब मंज़िल लुप्तटूटे सपने
अहसास हुआ थे ये अपनेजख्म हरे
जो की पीड़ा से भरेदुःख के घेरे
चारों और घनघोर अँधेरेमौत आखरी दांव
लम्बे सफर का अंतिम पड़ाव
राजेश ‘अरमान’ 19/10/1991 -
अरमां था ज़िंदगी
अरमां था ज़िंदगी से कभी मुलाकात होगी
बिठा पलकों पे कुछ खास बात होगी
सोचता था होगी ज़िंदगी मेरी फूलों की तरह
निकाले होगी घूँघट किसी रहस्य की तरह
कभी आती जब ज़िंदगी मेरे ख्वाब में
नज़र आती ज़िंदगी मुझे एक नक़ाब में
हाथ में उसके विष से भरा सोने का प्याला
पहने गले में मधुमय काँटों की माला
कभी लगता है वो मनचाही किताब
कभी लगता ज़िंदगी है आंसुओं का सैलाबये तो एक ख्वाब है ,पर क्या ज़िंदगी ख्वाब नहीं है
खड़े कई प्रश्न ऐसे जिसका कोई जवाब नहीं है
गर जो मिली मुझको ले लूँगा प्रश्नों के घेरे में
होते हुई भी मेरी क्या भेद है तेरे मेरे में
ज़िंदगी तेरे इतने रंग है जो समझ से परे
हर सांस अजनबी सवाल वही तेरे मेरे
ज़िंदगी का अंत है मौत ,तो मौत का अंत भी होता होगा
मौत की आगोश में कभी ग़म भी तो सोता होगा
कल रात ख्वाब में मेरी आई ज़िंदगी
अपनी कम ज्यादा पराई लगी ज़िंदगी
मौत के अहसास से समझ पाया ज़िंदगी की शान
ज़िंदगी तो निकली रेगिस्तान में काटों की तरह ‘अरमान
राजेश ‘अरमान’ २०/०४/१९९० -
ये ख्वाइशें
रेत के महलों की तरह ,हरदम ढहती है ये ख्वाइशें
फिर भी हर पल क्यों सजती सवरती है ये ख्वाइशेंउम्मीदे इन्ही ज़िंदा रखती सांसों में रचती -बसती
पलती-बढ़ती सब चुपचाप सहती है ये ख्वाइशेंएक खवाइश पूरी होते ही अपनी कोख से
दे जाती जनम कोख में पलती है ये ख्वाइशेंइन्हे पूरा होने की आस में रहते बैचेनी की गोद में
जाने -अनजाने दर्द से आलिंगन चाहती है ये ख्वाइशेंकभी होगा खत्म इन ख्वाइशों का अनवरत क्रम
जिंदगी का है अंत पर अमर होती है ये ख्वाइशेंहर खवाइश बंधी आशा की सुनहरी जंजीरों से
जिसे तोड़ने की खवाइश भी ,जन्म देती चंद नई ये ख्वाइशेंकौन कहता है होती नहीं इन ख्वाइशों की जुबान
हर पल टूटती न जाने ,क्या चीखती है ये ख्वाइशेंशायद इन ख्वाइशों और धड़कनों का नहीं कोई रिश्ता
मर जाता है इंसान, पर मरती नहीं है ये ख्वाइशेंलगता इन ख्वाइशों का सच अपनी समझ से परे ‘अरमान’
शायद यही ज़िंदगी है कुछ उम्मीदें और अनंत है ये ख्वाइशें -
हम उन लम्हों
हम उन लम्हों की याद को
जेहन में यु संजोये बैठे है
रहकर भी दूर जैसे
आँखों में बसता है कोई
उन लम्हों की सांसें हमें
हरदम चलती नज़र आती है
जो अहसास कराती है अपने
और लम्हो के जीवित होने का
लगता इन लम्हो की धड़कन
रूक जाने से शायद
रुक जाएगी मेरी धड़कन भी
सोचता हूँ क्या बात है खास
उन बीत गए लम्हो में
क्यों इन्हे सजोने की इच्छा
इस कदर रखता हूँ मैं
आखिर क्यों उन लम्हो को
कफ़न ओढ़ा दफ़न नहीं कर पाता
शायद कोई ठोस कारण है इसका
शायद इसे दफ़न नहीं कर पाता इसलिए
क्योकि ये मेरे जीवित होने का
जीवंत भ्रम पालने के लिए
लगता एक अनिवार्य दस्तावेज बन गया है
राजेश ‘अरमान’२३/०७/१९८९ -
हालात फिर बदले
कल भी हम थे ,ये जमीं थी
पर वो पाँव नहीं थे
ढूंढ सकते जो तेरे क़दमों के निशाँहालात फिर बदले
इन पाँव को
मिली कोई मंज़िल
जो थी तेरे
पलकों की महफ़िलहालात फिर बदले
मेरे पाँव ,तुम्हारे पाँव
अब हमारे हो गए
लगने लगे सब बेगाने
तुम इतने हमें प्यारे हो गएहालात फिर बदले
तुम लौट गए सफर से
मिटाकर उन क़दमों के निशां
जिस राह पर कदम थे मेरे
नहीं थे तुंम्हारे क़दमों के निशांहालात फिर बदले
हम तुम और मैं हो गए
जमीं रही वही मगर
हम भी रहे ,सफर भी रहा
पर रहा न कोई हमसफ़रहालात फिर बदले
मैं हूँ मेरे पाँव है
तुम हो तुम्हारे पाँव है
पर तले उसके
वो साँझा जमीं न रही -
छोड़ आया थी
छोड़ आया थी अपनी तन्हाई को भींड में
लुत्फ़ अब ले रहां हूँ तन्हाई की भीड़ में
राजेश ‘अरमान’ -
अजीब इत्तफ़ाक़ है
अजीब इत्तफ़ाक़ है
अजीब इत्तफ़ाक़ है
तेरे जाने और सावन के आने काअजीब इत्तफ़ाक़ है
तेरी चुप और मौसम के गुनगुनाने काअजीब इत्तफ़ाक़ है
मेरे माज़ी और मेरे मुस्कराने काअजीब इत्तफ़ाक़ है
तेरे मिलने और मेरे ज़ख्म खाने काअजीब इत्तफ़ाक़ है
तेरे गेसू और घटाओं के छाने काअजीब इत्तफ़ाक़ है
तेरे तीर और कहीं चल जाने काअजीब इत्तफ़ाक़ है
मिल के और ग़ुम हो जाने काअजीब इत्तफ़ाक़ है
बंद आँखें और ख्वाब टूट जाने काअजीब इत्तफ़ाक़ है
‘अरमान ‘ तेरे और तेरे अनजाने काराजेश ‘अरमान’
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चलो चुप लफ्जों
चलो चुप लफ्जों को मिल के बाँट लेते है
चल निकले लफ्जों को मिटटी से पाट देते हैवो तेरा कहना मुझे मौसम की तरह
चल तीर को किसी शाख पे गाड़ देते हैवो तेरा मिलना किसी अजनबी जैसे
चल इसे पहली मुलाक़ात का नाम देते हैवो तेरा बारहा जाना फिर रूठ के मुझसे
चल इसे तेरे क़दमों की ख़ता मान लेते हैवो हर बात पे कहना तुम वैसे न रहे ‘अरमान’
चल इसे वक़्त के साथ चलना जान लेते है -
न माथे पे
न माथे पे कोई बिंदिया
न हाथों में कोई कंगन
न होठों पे कोई लाली
न पोशाक में तेरी खुश्बू
न जुल्फें सवरी हुई
न माथे पे कोई टीका
न आँखों में काजल
न पैरों में है पायल
न हिना की महक
आ तुझे प्यार करूँ
ज़िंदगी तू सज के तो आराजेश ‘अरमान’ १२/११/१९८९
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मैं संघर्ष कर रहा हूँ
मैं संघर्ष कर रहा हूँ
मैं संघर्ष कर रहा हूँएक ‘मैं’ हूँ अपने ही जैसा एक ‘मैं’ और भी है
इन दोनों ‘मैं’ में तालमेल बिलकुल भी नहीं
फिर भी मैं रखता हूँ दोनों को अपने साथ
अपने जिस्म में ,रूह की गहराईयों में
कभी एक ‘मैं ‘ मेरा दर्द होता है
तो दूसरा ‘मैं’ दवा बन जाता है
कभी एक ‘मैं’ मेरा दोस्त होता है
तो दूसरा ‘मैं ‘ दुश्मन बन जाता है
इन दोनों ‘मैं’ में से बस एक ही
समय एक ही ‘मैं ‘मेरे अस्तित्व
की परछाई बन दुनिया को दिखता है
मेरे अंदर दो ‘मैं’ रहते है
अस्तित्व केवल एक ‘मैं’ का
आज तक मैं दुसरे ‘ मैं’ को उसका
हक़ नहीं दिला पाया हूँ
क्योकि दोनों में से एक ही ‘मैं’
को मिली है नागरिकता
बस अपराधबोध पनपता है
एक उस दुसरे ‘मैं’ के
नाजायज होने का
अब भी उस दूसरे ‘मैं ‘के लिए
मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..
मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..राजेश’अरमान’
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गर वाबस्ता हो
गर वाबस्ता हो जाता रूहे-अहसास से जमाना
न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
गर वफ़ा करने की आदत होती जहाँ में
न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
गर न तेरे शिकवे होते न शिकायत होती
न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
अंधे ख्वाबों का न सिलसिला गर होता
न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
जज़्बे की तौहीन न दिल तार तार होता
न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
तेरी कलम की रोशनाई सूख जाती ‘अरमान’ गर
न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
राजेश’अरमान’ 12/04/1991 -
बिखरे बिखरे ख्वाब
बिखरे बिखरे ख्वाब
सुलगते सुलगते आंसूं
सीने में तूफ़ान
दिल में बस कशिश
काफिले यादों के लम्बे
कोई शै मुकम्मल नहीं
तनहा तनहा सफर
लम्बी लम्बी रातें
न वफ़ा का इल्म
न जफ़ा का तजुर्बा
बस एक गहरी खाई सी जीस्त
उस पर भी सुकु के ,
पंख होते तो उड़ते फिरते
खुली हवा में भी ,
पिंजरे का बंदपन
सांसें भी लेते है ,
खुद पे अहसान जताकर
लगता है सृष्टि रचते वक़्त ही ,
ग़ज़ल भी रच दी गई थी
राजेश ‘अरमान’ १४/०२/१९९० -
वर्तमान ही सत्य
वर्तमान ही सत्य बाकी सब मिथ्या है.
भूत तो बिन बाती तेल का दीया है
मत सोच में डुबो, तुझे किसी से क्या मिला
कर हिसाब तूने किसी को क्या दिया हैराजेश ‘अरमान’
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फरियाद बन के
फरियाद बन के निकली मेरी वफ़ा तेरी गली में
कौन सुनता मेरे दिल की सदा तेरी गली मेंयूँ तो बस आवाज़ हूँ एक बुतखाने की
कौन बख्सेगा यूँ मेरी खता तेरी गली मेंदरो-दीवार से लिपटी हुई एक तस्वीर सही
कौन मुड़ के देखेगा यहाँ तेरी गली मेंबात दरियां की करों या समुन्दर की
डूब के देखेगा मुझे कौन भला तेरी गली मेंमेरी आहट भी मुझे नागवारा गुजरी ‘अरमान’
मेरे सनाटों को सुनेगा कौन भला तेरी गली में
राजेश ‘अरमान’ -
ग़मे-ए-मुदाम
ग़मे-ए-मुदाम से इस कदर परेशां न हो ,
सुना है हर गम के पंख भी होते है
राजेश’अरमान’ -
तेरे साथ गुज़ारे
तेरे साथ गुज़ारे चंद लम्हों की
जागीर की बस मिल्कियत रखता हूँ
ये अलग बात है खुद को
सबसे अमीर अब भी समझता हूँ
राजेश’अरमान’ -
वो समझते रहे ताउम्र
वो समझते रहे ताउम्र, बस एक किस्सा मुझे
हम वहम् में रहे वो समझते है ,अपना हिस्सा मुझेफरेब खाने की तो तालीम अपनी बड़ी पुरानी है
हम फूलों की तरह मिलते, वो दिखाते काटों का गुस्सा मुझेराजेश’अरमान’
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तूफां मन के
तूफां मन के अंदर हो या समुन्दर में
लहरें कुछ न कुछ खींच के ले ही जाती है
राजेश ‘अरमान’ -
मैंने खुद ही
मैंने खुद ही
खींची लकीरें
अपने दरम्यामैंने खुद ही
बना दिये
इतने धर्ममैंने खुद ही
सीखा दिया
भूर्ण को छल कपटमैंने खुद ही
गिरा दिए
अपने संस्कारमैंने खुद ही
मिटा दिए
अपने हर्ष कोमैंने खुद ही
बना लिए
खाली मकानमैंने खुद ही
जला दिए
अपने सपनो कोमैंने खुद ही
ओढ़ लिए
कई चेहरेमैंने खुद ही
सब किया है
अब तकमैंने खुद ही
रचा है
अतृप्त रंगमचमैंने खुद ही
सजाये है
सूनी सेजमैंने खुद ही
बहाये है
आँखों से नीरमैंने खुद ही
नहीं माना
खुदको दोषीक्या हो अंत
इस खुद का
जो है अनंतजिजीविषा के
इस मायावी
अंतर्मन कोकिसी की नहीं
दस्तक चाहिए, बस ,
अपने खुद कीराजेश’अरमान’
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बंदगी तेरी
बंदगी तेरी यूँ मेरे काम आ गई
अब किसी दुआ की जुस्तजू न रहीराजेश’अरमान’
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मन की चेतना
मन की चेतना
आत्मा की वेदना
सत्य का भेदना
अधीर प्रश्न
बुझे उत्तर
बिलखते प्रश्नचिन्ह
निष्कर्ष कुंठित
आज का आदमीराजेश ‘अरमान’