कल भी हम थे ,ये जमीं थी पर वो पाँव नहीं थे ढूंढ सकते जो तेरे क़दमों के निशाँ हालात फिर बदले इन पाँव को मिली कोई मंज़िल जो थी तेरे पलकों की महफ़िल हालात […]
कल भी हम थे ,ये जमीं थी पर वो पाँव नहीं थे ढूंढ सकते जो तेरे क़दमों के निशाँ हालात फिर बदले इन पाँव को मिली कोई मंज़िल जो थी तेरे पलकों की महफ़िल हालात […]
छोड़ आया थी अपनी तन्हाई को भींड में लुत्फ़ अब ले रहां हूँ तन्हाई की भीड़ में राजेश ‘अरमान’
अजीब इत्तफ़ाक़ है अजीब इत्तफ़ाक़ है तेरे जाने और सावन के आने का अजीब इत्तफ़ाक़ है तेरी चुप और मौसम के गुनगुनाने का अजीब इत्तफ़ाक़ है मेरे माज़ी और मेरे मुस्कराने का अजीब इत्तफ़ाक़ है […]
चलो चुप लफ्जों को मिल के बाँट लेते है चल निकले लफ्जों को मिटटी से पाट देते है वो तेरा कहना मुझे मौसम की तरह चल तीर को किसी शाख पे गाड़ देते है वो […]
न माथे पे कोई बिंदिया न हाथों में कोई कंगन न होठों पे कोई लाली न पोशाक में तेरी खुश्बू न जुल्फें सवरी हुई न माथे पे कोई टीका न आँखों में काजल न पैरों […]
मैं संघर्ष कर रहा हूँ मैं संघर्ष कर रहा हूँ एक ‘मैं’ हूँ अपने ही जैसा एक ‘मैं’ और भी है इन दोनों ‘मैं’ में तालमेल बिलकुल भी नहीं फिर भी मैं रखता हूँ दोनों […]
गर वाबस्ता हो जाता रूहे-अहसास से जमाना न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती गर वफ़ा करने की आदत होती जहाँ में न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती गर न तेरे शिकवे […]
बिखरे बिखरे ख्वाब सुलगते सुलगते आंसूं सीने में तूफ़ान दिल में बस कशिश काफिले यादों के लम्बे कोई शै मुकम्मल नहीं तनहा तनहा सफर लम्बी लम्बी रातें न वफ़ा का इल्म न जफ़ा का तजुर्बा […]
वर्तमान ही सत्य बाकी सब मिथ्या है. भूत तो बिन बाती तेल का दीया है मत सोच में डुबो, तुझे किसी से क्या मिला कर हिसाब तूने किसी को क्या दिया है राजेश ‘अरमान’
फरियाद बन के निकली मेरी वफ़ा तेरी गली में कौन सुनता मेरे दिल की सदा तेरी गली में यूँ तो बस आवाज़ हूँ एक बुतखाने की कौन बख्सेगा यूँ मेरी खता तेरी गली में दरो-दीवार […]
ग़मे-ए-मुदाम से इस कदर परेशां न हो , सुना है हर गम के पंख भी होते है राजेश’अरमान’
तेरे साथ गुज़ारे चंद लम्हों की जागीर की बस मिल्कियत रखता हूँ ये अलग बात है खुद को सबसे अमीर अब भी समझता हूँ राजेश’अरमान’
वो समझते रहे ताउम्र, बस एक किस्सा मुझे हम वहम् में रहे वो समझते है ,अपना हिस्सा मुझे फरेब खाने की तो तालीम अपनी बड़ी पुरानी है हम फूलों की तरह मिलते, वो दिखाते काटों […]
तूफां मन के अंदर हो या समुन्दर में लहरें कुछ न कुछ खींच के ले ही जाती है राजेश ‘अरमान’
मैंने खुद ही खींची लकीरें अपने दरम्या मैंने खुद ही बना दिये इतने धर्म मैंने खुद ही सीखा दिया भूर्ण को छल कपट मैंने खुद ही गिरा दिए अपने संस्कार मैंने खुद ही मिटा दिए […]
बंदगी तेरी यूँ मेरे काम आ गई अब किसी दुआ की जुस्तजू न रही राजेश’अरमान’
मन की चेतना आत्मा की वेदना सत्य का भेदना अधीर प्रश्न बुझे उत्तर बिलखते प्रश्नचिन्ह निष्कर्ष कुंठित आज का आदमी राजेश ‘अरमान’
आँखों में रखा बुलंदिओं का जोश है यहाँ हर इंसा खुद में मदहोश है वहां से निकल तो आया था जहाँ शोर था कैसे निकलू जो अपने ही अंदर सरफ़रोश है कौन सी दुनिया को […]
aankhon mein rakha bulandion ka josh hai yahan har insaa khud mein madhosh hai wahan se nikal to aaya tha jahan shor tha kaise nikaloon jo apne hi ander sarfarosh hai kaun si duniya ko […]
हासिल कुछ भी नहीं नफरतों से क्यों खेलते हो फिर जज्बातों से जब इंसा ही इंसा का दुश्मन हो क्या मिलेगा किसी को इबादतों से राजेश’अरमान’
कमबख्त दिल सब समझता है खुद दिल से दूरियां रखते है वज़ूद सामने होता है लेकिन खुद को बहरूपिया रखते है राजेश’अरमान’
जिनके आने से पहले, मौसम का गुमाँ हो जाता था आज वो खुद ही हो गए, इक मौसम की तरह राजेश’अरमान’
इम्तिहाँ लेते है वो कुछ इस अंदाज़ से आता हुआ जवाब भी हम भूल जाते है राजेश’अरमान’
अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है ये चादर जरा आहिस्ते से संभल कर ही हटाना ये फूलों से नहीं ,चुभते काटों से सजी मजार […]
सब कुछ है जहाँ में ,बस यहाँ किल्लत कुछ और है ज़िंदगी तुझे जीने के लिए ,बस जिल्लत का दौर है आईने ने कब माफ़ की है ख़ता किसी गुनाहगार की और हमें सच बोलते […]
आराईश अपने अंदर की तो हम अब खो चुके है तलाश आलम की करते फिरते रहने को नासबूर है परस्तिश बन्दे की हो या फिर ख़ुदा की हो बस कुछ न कुछ मांगने का अजीब […]
मेरी खिड़की से कोई ख्वाब निकल फिर खो गया इन हवाओं में अब मैं खिड़की बंद रखने लगा अब ख्वाब आते है भागते भी नहीं बस इक घुटन सी फैलती है उनके साथ रहने से […]
आए न रास किश्तों के क़त्ल ,क़त्ल हो तो एक बार हो मेरे क़ातिल दुआ मेरी ,तेरे खंजर की न खत्म कभी धार हो देते है खुद को धोखा ,औरो के फरेब से क्या बच […]
अनंत की खोज व्याकुल सा कण कण मन चंचल अपार चिंतन जिजीविषा मृतप्राय अपने होने का अभिप्राय एक खोज अनंत की निष्कर्ष मरीचिका एक खोज मोक्ष की निष्कर्ष अज्ञात एक खोज सृष्टि की निष्कर्ष मौन […]
वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे बाग़ की रौनके पूछिए उस बागबाँ से जिसने खिलाये है फूल तेरी चाहत पे कौन समझा है इन […]
दर्द के चरागों को बुझने का कोई बसेरा दे दो ग़ुम हुए लोगों को कोई इक नया चेहरा दे दो इन सुर्ख आँखों का कसूर तुम्हारा हिस्सा है इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा […]
दर्द के चरागों को बुझने की कोई हवा दे दो ग़ुम हुए लोगों को लौटने का कोई पता दे दो इन सुर्ख आँखों का कसूर इतना तुम्हारा हिस्सा है इन आँखों को तुम कोई ख्वाब […]
है तो इंसा ही हम कोई खुदा नहीं है, गुस्ताखिओं की और कोई वज़ह नहीं है गिरते झरने से, अच्छे लगते है उड़ते परिंदे पर मेरा अक्स ये जमीं है कोई आस्मां नहीं है यूँ […]
मेरे अस्तित्व के इर्दगिर्द बैठे है कई जाल मकड़ी के भेदना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे सत्य के इर्दगिर्द बैठे है असत्य के पंछी उड़ाना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे मन के इर्दगिर्द बैठे है […]
अनुभूति से ओतप्रोत जीवन चलता है जैसे कोई लहर जैसे कोई झोँका जैसे कोई मौसम बस अनुभूति ही तो है अनुभूति से परे अपने भीतर का अपने मन का अपने अंतर्द्वंद का कोई नाता होता […]
तुम एक परिणाम हो तुम क्रिया नहीं हो सृष्टि एक क्रिया है जो रची गयी है रचने की क्रिया एक अलोकिक सत्य है प्रकृति ,पानी .वायु ,अग्नि सब परिणाम है बस तुम्हारी तरह तुम भयभीत […]
गैरों से क्या करें शिकायत अपनों से ही मिली तिज़ारत रूसवाइयां तेरी साथ लेकर कर लेंगे इस जहाँ से रुखसत राजेश ‘अरमान’…
हम भी है तुम भी हो ,पर ये सहारे बदल गए लहरें तो वही है मगर ये किनारे बदल गए लोग पत्थर के बन गए है , ,दिल हमारे है आईने हम तो अब भी […]
गर निकल पड़े जो सफर को देख मुड़ के न फिर डगर को आएँगे यूँ तो कई विघ्न पड़ेंगे देखने कई दुर्दिन हौसला हो साथ अगर हो जायेंगे ये छिन-भिन्न तट से जो भटक गई […]
निकला ढूंढने अपने दुश्मन को कोई मिला नहीं टटोला जो अपने मन को पहचान गया अपने दुश्मन को राजेश ‘अरमान’
तुम महज एक तस्वीर हो मैं जानता हूँ कि, तुम महज इक तस्वीर हो ओर उससे आगे कुछ भी नहीं मगर दिल ये कहता है तुम महज इक तस्वीर नहीं हो सुना था तस्वीरें बोला […]
मेरे ज़ख्मों का खाता इक दिन नीलाम हो गया दुश्मनों को मिला न हिसाब और इन्तेक़ाम हो गया वाबस्ता थे जिन चेहरों से ,जो थे मेरे रात दिन उनके चेहरों का रंग सारे शहर में […]
टूटे अल्फ़ाज़ों को नसीहत की जरूरत क्या बिखरे ख्वाबों को किस्मत की जरूरत क्या जो बिक गया खुद ही सरेआम बाज़ारों में फिर इंसान की कीमत की जरूरत क्या हर इक शै का […]
समझते सब है पर मानता कोई नहीं पहचान सब से है पर जानता कोई नहीं यूँ तो पड़ा हूँ खुली किताब की तरह पढ़े लिखे सब है पर बांचता कोई नहीं […]
एक वो बचपन था अल्हड सा आज तो सावन भी है पतछड सा थक गए ढूँढ़ते अब तो पल वो प्यारे खुला आसमान भी मिला पिंजरे सा कोई वज़ह नहीं थी कभी दौड़ने की अब […]
उठे जब भी सवाल ज़िंदगी की तरफ उठे है हाथ मेरे तेरी बंदगी की तरफ महज इत्तफ़ाक़ था या और कुछ मेरा इशारा है दिल्लगी की तरफ वो हर जगह जो मोज़ू था मगर नज़र […]
हर शख्स बस अपने ही ख्याल बुनता है जिसका जवाब नहीं वही सवाल चुनता है कोई कैसे कहे वो गुमसुम सा क्यों है जिसे भी देखिये अपने ही जाल बुनता है राजेश’अरमान’
याद है आज भी वो दिन जब किताब के बीच कोई फूल दबा देते थे और खाली लम्हों को उस सूखे फूल से महकाया करते थे याद है आज भी वो दिन किताबों के पन्नें […]
अजी कैसा विकास करते हो छलों को बाहुपाश करते हो जिन पेड़ो से मिलती है साँसें उन पेड़ों का विनाश करते हो हर चीज़ है, पर समय नहीं ख़ुदकुशी का क्यों प्रयास करते हो मौन […]
कोई कोना जिस्म का उड़ के बैठा किसी कोने में अब सफर साँसों का गुजरता है कभी जिस्म में कभी, किसी कोने में राजेश’अरमान’
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