Author: rajesh arman

  • पिंजरे तो खोल

    पिंजरे तो खोल दिए लेकिन
    पंछी उड़ गया पिंजरे लेकर
                  राजेश’अरमान’

  • बरपने लगा

    बरपने लगा शोर कुछ अपने पाले सन्नाटों में
    कुछ उधर भी है खलबली उनके दिए काँटों में
    माना की कोई मरासिम नहीं उनके सायों से ,
    अब भी मौजूं है मगर हर किसी की आहटों में
    राजेश’अरमान’

  • दरके आइनों को

    दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है
    गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत है

    फासले वस्ल के यू सायें से बढ़े जाते है
    ये कोई मिलना या तुम्हारी रुखसत है

    हरसूँ बिखर गए तेरे पन्नें नसीब के
    अब तो खाली जिल्द की हसरत है

    वक़्त रूठा किसी बच्चे की माफिक
    जिसकी जिद है या कोई शरारत है

    अब किस और जहान जाएँ’अरमान’
    जिस तरफ देखिये बस नफरत है

    दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है
    गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत है

    राजेश’अरमान’

  • कहाँ तो आरजुएं थी

    वक़्त की चाल के अंदाज़ निराले तो न थे
    ख्वाब ही सो गए लेके कोई करवट शायद

    कहाँ तो आरजुएं थी तेरे मिलने की
    यां तो खुद ही हिस्सों में बट गए शायद

    जुबान पे क्यों कोई इल्ज़ाम रहें
    खता मेरी जो चुप रह गए शायद

    मैं ही चल न सका साथ कारवां के
    फ़ासले काफिलों से यू बढ़ गए शायद

    हर सीने में मंज़िलें धड़कती है
    यही रिश्ता बस रह गया शायद

    निस्बत कुछ इस तरह निभाई गई
    पास रहकर भी दूर रह गए शायद

    चंद कतरे भीगे साथ रख ‘अरमान’
    अब आँखों में नमी आ जाये शायद

  • धुंधले आईने में

    धुंधले आईने में कोई अक्स नज़र नहीं आता
    वक़्त की सुईया पकड़ने से वक़्त ठेहर नहीं जाता

    वो चिरागों सा रोशन कभी एक नूर सा था
    क्या हुआ शख्स अब वो नज़र नहीं आता

    कहता रहा रहने दो रिश्तों को पर्दों में
    कुरेदने से सच रिश्तों का बदल नहीं जाता

    उसकी हसरत थी महफूज उसके हाथों में
    हाथों की जिन लकीरों को कोई बदल नहीं पाता

    कौन देखेगा इन हवाओं में मुड़ के ‘अरमान’
    साथ दुनिया के आखिर वो क्यों चल नहीं पाता

    धुंधले आईने में कोई अक्स नज़र नहीं आता
    वक़्त की सुईया पकड़ने से वक़्त ठेहर नहीं जाता
    राजेश ‘अरमान’

  • रिश्तों की बानगियाँ

    रिश्तों की बानगियाँ अब तेजी से बदलने लगी है
    वास्ता लाश से कम कफ़न से ज्यादा हो गया है
    राजेश’अरमान’

  • ऊंची दीवारें भी पल

    ऊंची दीवारें भी पल में मिट जाती है
    बस नज़रें दीवार के पार जानी चाहिए
    राजेश’अरमान’

  • हर सांस है मुजरिम न

    हर सांस है मुजरिम न जाने किस गुनाह में
    हर ख्वाईश है क़ैद न जाने किस गुनाह में

    न कुछ बस में तेरे न कोई डोर हाथ में
    जाएँ तो ज़िंदगी किन क़दमों की पनाह में

    थमा वक़्त कभी तेज भागता वक़्त बेपैबंद
    हर लम्हा दुबका बैठा ज़िंदगी की राह में

    ख्वाब के बाद ऑंखें सदा खुली रखना
    न जाने कब आ जाएँ कोई निगाह में

    कब तलक खुद को बहलाएगा ‘अरमान’
    फिर किसी अजनबी से मरासिम की चाह में

    हर सांस मुजरिम है न जाने किस गुनाह में
    हर ख्वाईश क़ैद है न जाने किस गुनाह में

    राजेश ‘अरमान

  • ज़िंदगी कभी गूंथे हुए

    ज़िंदगी कभी गूंथे हुए आटे की तरह लगती
    कभी फायदे की कभी घाटे की तरह लगती

    आस के फूल हर शाख पे खिलने दो
    टूटी आस चुभते हुए काटें की तरह लगती

    वक़्त की मार से कब कौन बचा यारों
    कभी मुक्के तो कभी लातों की तरह लगती

    ख्वाइश से उगती खवाइश का खेल ज़िंदगी’अरमान’
    कभी चुप तो कभी चीखते सनाटे की तरह लगती

    ज़िंदगी कभी गूंथे हुए आटे की तरह लगती
    कभी फायदे की कभी घाटे की तरह लगती
    राजेश ‘अरमान’

  • कोई दिल का मेरे चारागर होता

    कोई दिल का मेरे चारागर होता
    यूँ न तन्हा मेरा सफ़र होता
    आज फिर दिल ने आरजू की है
    घर के अंदर मेरा घर होता /
    वो जो रहते थे हमसाये की तरह
    मेरी परछाई में फिर क्यों न बसर होता
    अब गिला क्या करें किन बातों का
    गर जो होना था कुछ असर होता
    आज मैं दूर बहुत दूर चला आया हूँ
    काश के पास मेरा शहर होता/…
    जुस्तजू की भी कोई होती अगर जुस्तजू
    फसले-गुल न होती, न कोई शजर होता
    कोई दिल का मेरे चारागर होता———–
    RAJESH ‘ARMAN’

  • हर लम्हा गुजर गुजर

    हर लम्हा गुजर गुजर कर कुछ कह गया
    अपनी आँखों में हल्का सा कुछ तैरता गया
    ज़िद जिनकी थी वो ज़िद में रह गए
    हाथ से उनके कोई फैसला सा गया
    ज़िंदगी कुनकुनी धुप तो कभी चुभती तपन
    वो कहते क्यों वो कुम्हलाया सा गया
    असर किसी का किसी पे होने में
    वक़्त लगता मगर किसी से लगाया न गया
    फासले कैसे भी हो मिट सकते है
    सरहद की तरह कभी हमसे बनाया न गया
    जिसको हासिल बुत सी ख़ामोशी ‘अरमान’
    क्यों कहते उससे हाथ मिलाया न गया
    राजेश ‘अरमान’

  • रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात

    रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
    कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
    तंगदिल है मेरा या तेरा सिलसिला क़ाफ़िर
    न तुम समझे न कुछ हम समझ नहीं पाएं
    वक़्त के वलवले कुछ कम नज़र आते
    ज़ख्म अपने ही मगर भर नहीं पाएं
    तेरी रुखसत से जुड़ा कोई किस्सा हूँ
    पढ़ना चाहा भी मगर पढ़ नहीं पाएं
    अपनी मर्ज़ी भी कोई मर्ज़ी है ‘अरमान’
    जो हुआ हम कुछ कर नहीं पाएं
    रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
    कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
    राजेश ‘अरमान’
    की बरसात

    कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
    तंगदिल है मेरा या तेरा सिलसिला क़ाफ़िर
    न तुम समझे न कुछ हम समझ नहीं पाएं
    वक़्त के वलवले कुछ कम नज़र आते
    ज़ख्म अपने ही मगर भर नहीं पाएं
    तेरी रुखसत से जुड़ा कोई किस्सा हूँ
    पढ़ना चाहा भी मगर पढ़ नहीं पाएं
    अपनी मर्ज़ी भी कोई मर्ज़ी है ‘अरमान’
    जो हुआ हम कुछ कर नहीं पाएं
    रोज़ होती रही तेरे वादों की बरसात
    कमाल ये के कभी हम भीग नहीं पाएं
    राजेश ‘अरमान’

  • एक जरूरी दस्तावेज

    एक जरूरी दस्तावेज ही तो है जीवन
    न कागज़ अपना न स्याही अपनी
    फिर भी भ्रम अपना कहने का

    अपनी सासें अपनी धड़कन से विवाद करती
    कभी तालमेल नहीं मन से मन का
    फिर भी भ्रम अपना कहने का

    मन से मन मिलता नहीं फिर भी
    हर संयम अपना ही उपहास करता
    फिर भी भ्रम अपना कहने का

    यथार्थ हो गए पुराने अख़बार से
    हम लिपट गए किसी शै की तरह
    फिर भी भ्रम अपना कहने का

    राजेश ‘अरमान’

  • मुड़े कागज़ की तरह

    मुड़े कागज़ की तरह माथे की लकीरें बन गई है
    मेरी किस्मत की हाथों की लकीरों से ठन गई है
    अपने हिस्से की गिरवी रखी उदासी को
    देख अब उस पे कितनी सूद चढ़ गई है
    माना हस्ती अपनी खुद की न कतरे से जुदा
    खुद ये कतरा मेरा आईना बन गई है
    मेरी कलम से निकली हुई स्याही यूँ हुई खफा
    ज़ीस्त अपनी कोई बिगड़ी कहानी बन गई है
    क्या है अर्ज़ तेरी कौन सुनेगा ‘अरमान’
    ख्वाइशें खुद बखुद खौफ बन गई है
    मुड़े कागज़ की तरह माथे की लकीरें बन गई है
    मेरी किस्मत की हाथों की लकीरों से ठन गई है

    राजेश ‘अरमान’

  • कभी तो मेरे माजी

    कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ
    जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ
    माना की शब की जीस्त दुआओं से है भरी
    हो असर ऐसा ख़्वाबों को सहर कर दिया जाएँ
    फूल भी चुभते रहे ताउम्र किसी खंजर की तरह
    चलो किसी खंजर को फूलों से भर दिया जाएँ
    लाजिमी हो के कुछ वक़्त यू भी मिल जाएँ
    किसी पिंजरे से रिहा खुद को कर दिया जाएँ
    तिश्नगी सेहरा की न थी इस दिल को ‘अरमान’
    कभी ऐसा हो तस्सवुर में समुन्दर भर लिया जाएँ
    कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ
    जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ
    राजेश ‘अरमान ‘

  • पत्थर ही पत्थर है दिल

    पत्थर ही पत्थर है दिल की जेब मेँ
    है बड़ी सच्ची मगर गर्दिशों की बात है
    अब के गर्मिओं मेँ ठंडक है तो हैरत किसलिए
    किस कदर गर्मियां थी पिछली सर्दियों की बात है
    किस कदर ओढ ली थी तुमने ख़ामोशी की चादर
    अब के गर्मिओं मेँ ये आई कैसी बरसात है
    न कोई शिकायत न कोई मूह फेरने की रस्म
    ऐसी चुप सी मुलाक़ात भी कोई मुलाकात है
    तेरे सवालों की कोई किताब नहीं ‘अरमान ‘
    ज़िंदगी तो खुद अपनी एक सवालात है
    पत्थर ही पत्थर ——–
    राजेश ‘अरमान ‘

  • जाते जाते कुछ कह गयी ज़िंदगी

    जाते जाते कुछ कह गयी ज़िंदगी
    समझ पाया तो ढह गयी ज़िंदगी

    करते गुजरा हर सांसों का हिसाब
    ज़िंदगी से कुछ कम रह गयी ज़िंदगी

    पहलूँ में लिए बैठे कई चाँद उदास
    जाने क्याक्या न सह गयी ज़िंदगी

    लम्हां लम्हां मिलके सजी मिलके बनी
    जाते जाते चुपचाप कह गई ज़िंदगी

    उम्र गुजरी किसी सेहरा में ‘अरमान’
    आखरी दौर दरिया में बह गयी ज़िंदगी
    राजेश ‘अरमान’

  • बिखरे ख्वाबों को

    बिखरे ख्वाबों को बारहा चुनता क्या है
    ज़ख़्म तो जख्म है बारहा गिनता क्या है

    इन हवाओं से कब कोई मुड़ के देखा
    सेहरा की रेत पे बारहा लिखता क्या है

    गैर हो न सके, न अपनों में रहे
    देख तजुर्बों से तुझे दिखता क्या है

    वो बैठा रहा सच की बाँहों में
    देख सही तेरे बाजार में बिकता क्या है

    यही दुंनिया के दस्तूर रह गए ‘अरमान’
    डूबते चाँद को बारहा तकता क्या है

    बिखरे ख्वाबों को बारहा चुनता क्या है
    ज़ख़्म तो जख्म है बारहा गिनता क्या है
    राजेश’अरमान’

  • हर चेहरे अपने पर

    हर चेहरे अपने पर कोई आश्ना न मिला
    गिला खुद से मगर कोई आईना न मिला

    अपनी तक़दीर-बुलंदी का क्या कहना
    बर्क़ को जब कोई आशियाँ न मिला

    फ़िज़ां मिली तो मगर खुशगवार न थी
    तल्खियों भरा कोई सेहरा न मिला

    हस्ती अपनी जमाने में जुदा निकली
    कोई शख्स शहर में जब बेजुबान न मिला

    एक चुप से लिपट बैठा ‘अरमान’
    क्यों कहते हो कोई तज़ुर्बा न मिला

    राजेश’अरमान’

  • सिर्फ एहसास है

    सिर्फ एहसास है वफ़ा फिर छूने को जी करता है
    यह कौन देता है सदा सुनने को जी करता है

    हर शख्स का वज़ूद जुदा फितरत भी जुदा
    फिर भी उम्मीद वो खुद के वज़ूद सा करता ह

    क्या हो तामीर तेरे घर की तेरी आरज़ू से जुदा
    हर दरीचा मेरे जेहन का तेरी गली खुलता है

    ये अंधेरों की है वफ़ा या उजालों की जफ़ा
    ज़ख्म इक मगर दर्द बारहा मिलता है

    कितने कुचले हुए लिए बैठा है ‘अरमान’
    कोई उजड़ा हुआ गुलशन कभी खिलता है

    राजेश ‘अरमान’

  • बुझे चरागों को हवाओं

    बुझे चरागों को हवाओं का करम न दे
    मेरी हस्ती मिटने का कोई भरम न दे

    जो गुजरा नहीं खुद , मगर आखिर गुजरा
    तुम फ़क़त कोई उदास सा वहम न दे

    जुबाँ जो है हाथों को कोई खंजर क्या दे
    मेरे ज़ख्म हरा रख, कोई मरहम न दे

    फिर कोई मौसम गुजरा मेरे वीरानो में
    तेरी चुप से लिपटा कोई मौसम न दे

    जो भी लिखता, दिल से लिखता ‘अरमान’
    मेरे इन हाथों को कोई कलम न दे

    बुझे चरागों को हवाओं का करम न दे
    मेरी हस्ती मिटने का कोई भरम न दे
    राजेश ‘अरमान’

  • मेरे सफिनों का नाखुदा हो

    मेरे सफिनों का नाखुदा हो , जो तूफानों का तलबगार न हो
    मुझे ऐसा चराग बना दे जो हवाओं का कर्ज़दार न हो

    मेरे हिस्से की हर शे पे लिख दिया तेरा नाम आखिर
    गिला करें वो हरदम और तेरा तरफदार न हो

    ऐसा कोई सौदा न हो और कोई सौदाई भी न हो
    बिक जाएँ जहाँ मेरी वफ़ा ऐसा कोई बाजार न हो

    ज़ीस्त की राहों में ऐसा किसे नसीब गुलशन
    फूल की चाह हो और हाथों में खार न हो

    मत ओढ़ के सो जाना चादर किसी वीरानी की
    कौन समझेगा इसे कहीं हस्ती तेरी शर्मशार न हो

    न हो ऐसा कोई लम्हा मेरी किस्मत में ‘अरमान’
    ख्वाब देखूं तो तेरे चेहरे का दीदार न हो

    राजेश ‘अरमान’

  • कतरा कतरा लहूँ का

    कतरा कतरा लहूँ का जिस्म में सहम गया
    चलो इसी बहाने रगों में बहने का वहम गया

    वो कोई हिस्सा था मेरे ही जिस्म का
    जुदा हुआ वो तोड़ कोई कसम गया

    मेरे मिटने की तारीख एक फ़लसफ़ा ही थी
    जाने क्यों बाँट वो मेरी मौत का परचम गया

    कब था इंकार मुझे मेरी तन्हाई के सौदे का
    वो देख खुद मेरी तन्हाई आखिर सहम गया

    वो तेरे लब्ज़ों की बाज़ीगरी न थी तो क्या थी
    फिर कोई छेड़ मेरे ज़ख्मों में कोई नज़्म गया

    कोई फ़रियाद क्या करें अपनी सांसों से ‘अरमान’
    जब सांसें ही हो क़ातिल ,ठहरा मुझे मुजरिम गया
    राजेश ‘अरमान’

  • उसने खौफ से कभी

    उसने खौफ से कभी आइना साफ़ न किया
    आ जाएँ न नज़र कहीं तस्वीर साफ़ उसकी
    राजेश ‘अरमान’

  • तजुर्बों से सीखा

    तजुर्बों से सीखा मगर बस इतना सीखा
    फिर गिर पड़े तज़ुर्बा जो गिरने का था
    राजेश ‘अरमान’

  • हम लुत्फ़ कुछ

    हम लुत्फ़ कुछ बारिशों का यूँ उठा रहे है
    अपने आंसुओं को बारिशों में छुपा रहे है

    उसी को याद करना और हमेशा याद रखना
    किसी को भूलने की क्या अदावत निभा रहे है

    हम तो हो गए कायल अपने नए हुनर के
    खाक दीवानगी की हर तरफ उड़ा रहे है

    अभी तो कारवां कोई गुजरा नहीं फिर भी
    जनाब आप आखिर किस गुबार से घबरा रहे है

    जहाँ में कौन कब किसी का हुआ ‘अरमान’
    बस ये सोच हम तबियत अपनी बहला रहे है

    हम लुत्फ़ कुछ बारिशों का यूँ उठा रहे है
    अपने आंसुओं को बारिशों में छुपा रहे है
    राजेश’अरमान’

  • मेरे तस्सवुर के रंग

    मेरे तस्सवुर के रंग क्यों फीके होने लगे है
    मेरे सायें भी अब मुझसे दूर होने लगे है

    मैंने गिन गिन के सजाये थे जो मेरी वसीयत थी
    वो लम्हे क्यों मेरी ज़िंदगी से कम होने लगे है

    माना की जुस्तजू से ताल्लुक रखना है गुनाह
    अब तो हर ताल्लुक मेरे अपनों से खोने लगे है

    मिज़ाज़ वक़्त का होता है किसी मदारी जैसा
    हम भी चुपचाप किसी खेल में होने लगे है

    अपने दरवाजें को बंद कर दे ‘अरमान’
    ख्वाब आँखों में आके फिर सोने लगे है
    राजेश’अरमान’

  • रिश्तों का सत्य

    रिश्तों का सत्य जो लगता यथार्थ से परे सदा
    मानते हुए छलावा हम जुड़े रहना चाहते है सदा

    ये रिश्तें जो खून से बनते ,खून में ही पनपते है
    अंत होता है खून में ही ये सनते है सदा

    इन्हे तोड़ने का साहस भी न कोई जुटा पाया कभी
    है कोई इस खोखलेपन से गहरा जुड़ा है सदा

    अदा करना जरूरी नहीं जितना जताना जरूरी है
    इन रिश्तों ने जताया है अपना हक़ वो सदा

    जिसे सीखे गए बस औरों को सीखने के लिए
    सिखाये है रिश्तों ने ऐसे ही दस्तूर सदा

    इन रिश्तों का भ्रम कब तक कोई पाले
    अहसास एक पल भी न होने का रहता है सदा

    तोड़ डाले पर होगा ये यथार्थ से सीधा पलायन
    जुड़े बैठे है अनचाहे इन रिश्तों से सदा

    राजेश’अरमान’ ०५/०२/१९९२

  • फूलों की हसरत

    फूलों की हसरत की ,यही कसूर है मेरा
    काटें ही काटें मिले ये नसीब है मेरा

    सोचा था तूफां से कस्ती पार निकल जाएगी
    तूफां का क्या कसूर, निकला नाखुदा नासेह मेरा

    कल तक जो अपने थे बन गए बेगाने खास
    रिश्तों की डोर से कुछ ऐसा है ताल्लुक मेरा

    फूल लगे गैर मुझे काटें कुछ अपनों से लगे
    बस यही गुलशन से है शायद रिश्ता मेरा

    याद कर के फिर हो जाता उदास ‘अरमान’
    सूखे पत्तों की तरह हो गया वज़ूद मेरा

  • ज़िंदगी धुप -छोंव्

    ज़िंदगी धुप -छोंव्
    तपती रेत धसते पाँव

    राही सुप्त
    बिखरे ख्वाब मंज़िल लुप्त

    टूटे सपने
    अहसास हुआ थे ये अपने

    जख्म हरे
    जो की पीड़ा से भरे

    दुःख के घेरे
    चारों और घनघोर अँधेरे

    मौत आखरी दांव
    लम्बे सफर का अंतिम पड़ाव
    राजेश ‘अरमान’ 19/10/1991

  • अरमां था ज़िंदगी

    अरमां था ज़िंदगी से कभी मुलाकात होगी
    बिठा पलकों पे कुछ खास बात होगी
    सोचता था होगी ज़िंदगी मेरी फूलों की तरह
    निकाले होगी घूँघट किसी रहस्य की तरह
    कभी आती जब ज़िंदगी मेरे ख्वाब में
    नज़र आती ज़िंदगी मुझे एक नक़ाब में
    हाथ में उसके विष से भरा सोने का प्याला
    पहने गले में मधुमय काँटों की माला
    कभी लगता है वो मनचाही किताब
    कभी लगता ज़िंदगी है आंसुओं का सैलाब

    ये तो एक ख्वाब है ,पर क्या ज़िंदगी ख्वाब नहीं है
    खड़े कई प्रश्न ऐसे जिसका कोई जवाब नहीं है
    गर जो मिली मुझको ले लूँगा प्रश्नों के घेरे में
    होते हुई भी मेरी क्या भेद है तेरे मेरे में
    ज़िंदगी तेरे इतने रंग है जो समझ से परे
    हर सांस अजनबी सवाल वही तेरे मेरे
    ज़िंदगी का अंत है मौत ,तो मौत का अंत भी होता होगा
    मौत की आगोश में कभी ग़म भी तो सोता होगा
    कल रात ख्वाब में मेरी आई ज़िंदगी
    अपनी कम ज्यादा पराई लगी ज़िंदगी
    मौत के अहसास से समझ पाया ज़िंदगी की शान
    ज़िंदगी तो निकली रेगिस्तान में काटों की तरह ‘अरमान
    राजेश ‘अरमान’ २०/०४/१९९०

  • ये ख्वाइशें

    रेत के महलों की तरह ,हरदम ढहती है ये ख्वाइशें
    फिर भी हर पल क्यों सजती सवरती है ये ख्वाइशें

    उम्मीदे इन्ही ज़िंदा रखती सांसों में रचती -बसती
    पलती-बढ़ती सब चुपचाप सहती है ये ख्वाइशें

    एक खवाइश पूरी होते ही अपनी कोख से
    दे जाती जनम कोख में पलती है ये ख्वाइशें

    इन्हे पूरा होने की आस में रहते बैचेनी की गोद में
    जाने -अनजाने दर्द से आलिंगन चाहती है ये ख्वाइशें

    कभी होगा खत्म इन ख्वाइशों का अनवरत क्रम
    जिंदगी का है अंत पर अमर होती है ये ख्वाइशें

    हर खवाइश बंधी आशा की सुनहरी जंजीरों से
    जिसे तोड़ने की खवाइश भी ,जन्म देती चंद नई ये ख्वाइशें

    कौन कहता है होती नहीं इन ख्वाइशों की जुबान
    हर पल टूटती न जाने ,क्या चीखती है ये ख्वाइशें

    शायद इन ख्वाइशों और धड़कनों का नहीं कोई रिश्ता
    मर जाता है इंसान, पर मरती नहीं है ये ख्वाइशें

    लगता इन ख्वाइशों का सच अपनी समझ से परे ‘अरमान’
    शायद यही ज़िंदगी है कुछ उम्मीदें और अनंत है ये ख्वाइशें

  • हम उन लम्हों

    हम उन लम्हों की याद को
    जेहन में यु संजोये बैठे है
    रहकर भी दूर जैसे
    आँखों में बसता है कोई
    उन लम्हों की सांसें हमें
    हरदम चलती नज़र आती है
    जो अहसास कराती है अपने
    और लम्हो के जीवित होने का
    लगता इन लम्हो की धड़कन
    रूक जाने से शायद
    रुक जाएगी मेरी धड़कन भी
    सोचता हूँ क्या बात है खास
    उन बीत गए लम्हो में
    क्यों इन्हे सजोने की इच्छा
    इस कदर रखता हूँ मैं
    आखिर क्यों उन लम्हो को
    कफ़न ओढ़ा दफ़न नहीं कर पाता
    शायद कोई ठोस कारण है इसका
    शायद इसे दफ़न नहीं कर पाता इसलिए
    क्योकि ये मेरे जीवित होने का
    जीवंत भ्रम पालने के लिए
    लगता एक अनिवार्य दस्तावेज बन गया है
    राजेश ‘अरमान’२३/०७/१९८९

  • हालात फिर बदले

    कल भी हम थे ,ये जमीं थी
    पर वो पाँव नहीं थे
    ढूंढ सकते जो तेरे क़दमों के निशाँ

    हालात फिर बदले

    इन पाँव को
    मिली कोई मंज़िल
    जो थी तेरे
    पलकों की महफ़िल

    हालात फिर बदले

    मेरे पाँव ,तुम्हारे पाँव
    अब हमारे हो गए
    लगने लगे सब बेगाने
    तुम इतने हमें प्यारे हो गए

    हालात फिर बदले

    तुम लौट गए सफर से
    मिटाकर उन क़दमों के निशां
    जिस राह पर कदम थे मेरे
    नहीं थे तुंम्हारे क़दमों के निशां

    हालात फिर बदले

    हम तुम और मैं हो गए
    जमीं रही वही मगर
    हम भी रहे ,सफर भी रहा
    पर रहा न कोई हमसफ़र

    हालात फिर बदले

    मैं हूँ मेरे पाँव है
    तुम हो तुम्हारे पाँव है
    पर तले उसके
    वो साँझा जमीं न रही

  • छोड़ आया थी

    छोड़ आया थी अपनी तन्हाई को भींड में
    लुत्फ़ अब ले रहां हूँ तन्हाई की भीड़ में
    राजेश ‘अरमान’

  • अजीब इत्तफ़ाक़ है

    अजीब इत्तफ़ाक़ है

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे जाने और सावन के आने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरी चुप और मौसम के गुनगुनाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    मेरे माज़ी और मेरे मुस्कराने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे मिलने और मेरे ज़ख्म खाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे गेसू और घटाओं के छाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे तीर और कहीं चल जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    मिल के और ग़ुम हो जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    बंद आँखें और ख्वाब टूट जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    ‘अरमान ‘ तेरे और तेरे अनजाने का

    राजेश ‘अरमान’

  • चलो चुप लफ्जों

    चलो चुप लफ्जों को मिल के बाँट लेते है
    चल निकले लफ्जों को मिटटी से पाट देते है

    वो तेरा कहना मुझे मौसम की तरह
    चल तीर को किसी शाख पे गाड़ देते है

    वो तेरा मिलना किसी अजनबी जैसे
    चल इसे पहली मुलाक़ात का नाम देते है

    वो तेरा बारहा जाना फिर रूठ के मुझसे
    चल इसे तेरे क़दमों की ख़ता मान लेते है

    वो हर बात पे कहना तुम वैसे न रहे ‘अरमान’
    चल इसे वक़्त के साथ चलना जान लेते है

  • न माथे पे

    न माथे पे कोई बिंदिया
    न हाथों में कोई कंगन
    न होठों पे कोई लाली
    न पोशाक में तेरी खुश्बू
    न जुल्फें सवरी हुई
    न माथे पे कोई टीका
    न आँखों में काजल
    न पैरों में है पायल
    न हिना की महक
    आ तुझे प्यार करूँ
    ज़िंदगी तू सज के तो आ

    राजेश ‘अरमान’ १२/११/१९८९

  • मैं संघर्ष कर रहा हूँ

    मैं संघर्ष कर रहा हूँ
    मैं संघर्ष कर रहा हूँ

    एक ‘मैं’ हूँ अपने ही जैसा एक ‘मैं’ और भी है
    इन दोनों ‘मैं’ में तालमेल बिलकुल भी नहीं
    फिर भी मैं रखता हूँ दोनों को अपने साथ
    अपने जिस्म में ,रूह की गहराईयों में
    कभी एक ‘मैं ‘ मेरा दर्द होता है
    तो दूसरा ‘मैं’ दवा बन जाता है
    कभी एक ‘मैं’ मेरा दोस्त होता है
    तो दूसरा ‘मैं ‘ दुश्मन बन जाता है
    इन दोनों ‘मैं’ में से बस एक ही
    समय एक ही ‘मैं ‘मेरे अस्तित्व
    की परछाई बन दुनिया को दिखता है
    मेरे अंदर दो ‘मैं’ रहते है
    अस्तित्व केवल एक ‘मैं’ का
    आज तक मैं दुसरे ‘ मैं’ को उसका
    हक़ नहीं दिला पाया हूँ
    क्योकि दोनों में से एक ही ‘मैं’
    को मिली है नागरिकता
    बस अपराधबोध पनपता है
    एक उस दुसरे ‘मैं’ के
    नाजायज होने का
    अब भी उस दूसरे ‘मैं ‘के लिए
    मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..
    मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..

    राजेश’अरमान’

  • गर वाबस्ता हो

    गर वाबस्ता हो जाता रूहे-अहसास से जमाना
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    गर वफ़ा करने की आदत होती जहाँ में
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    गर न तेरे शिकवे होते न शिकायत होती
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    अंधे ख्वाबों का न सिलसिला गर होता
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    जज़्बे की तौहीन न दिल तार तार होता
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    तेरी कलम की रोशनाई सूख जाती ‘अरमान’ गर
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    राजेश’अरमान’ 12/04/1991

  • बिखरे बिखरे ख्वाब

    बिखरे बिखरे ख्वाब
    सुलगते सुलगते आंसूं
    सीने में तूफ़ान
    दिल में बस कशिश
    काफिले यादों के लम्बे
    कोई शै मुकम्मल नहीं
    तनहा तनहा सफर
    लम्बी लम्बी रातें
    न वफ़ा का इल्म
    न जफ़ा का तजुर्बा
    बस एक गहरी खाई सी जीस्त
    उस पर भी सुकु के ,
    पंख होते तो उड़ते फिरते
    खुली हवा में भी ,
    पिंजरे का बंदपन
    सांसें भी लेते है ,
    खुद पे अहसान जताकर
    लगता है सृष्टि रचते वक़्त ही ,
    ग़ज़ल भी रच दी गई थी
    राजेश ‘अरमान’ १४/०२/१९९०

  • वर्तमान ही सत्य

    वर्तमान ही सत्य बाकी सब मिथ्या है.
    भूत तो बिन बाती तेल का दीया है
    मत सोच में डुबो, तुझे किसी से क्या मिला
    कर हिसाब तूने किसी को क्या दिया है

    राजेश ‘अरमान’

  • फरियाद बन के

    फरियाद बन के निकली मेरी वफ़ा तेरी गली में
    कौन सुनता मेरे दिल की सदा तेरी गली में

    यूँ तो बस आवाज़ हूँ एक बुतखाने की
    कौन बख्सेगा यूँ मेरी खता तेरी गली में

    दरो-दीवार से लिपटी हुई एक तस्वीर सही
    कौन मुड़ के देखेगा यहाँ तेरी गली में

    बात दरियां की करों या समुन्दर की
    डूब के देखेगा मुझे कौन भला तेरी गली में

    मेरी आहट भी मुझे नागवारा गुजरी ‘अरमान’
    मेरे सनाटों को सुनेगा कौन भला तेरी गली में
    राजेश ‘अरमान’

  • ग़मे-ए-मुदाम

    ग़मे-ए-मुदाम से इस कदर परेशां न हो ,
    सुना है हर गम के पंख भी होते है
    राजेश’अरमान’

  • तेरे साथ गुज़ारे

    तेरे साथ गुज़ारे चंद लम्हों की
    जागीर की बस मिल्कियत रखता हूँ
    ये अलग बात है खुद को
    सबसे अमीर अब भी समझता हूँ
    राजेश’अरमान’

  • वो समझते रहे ताउम्र

    वो समझते रहे ताउम्र, बस एक किस्सा मुझे
    हम वहम् में रहे वो समझते है ,अपना हिस्सा मुझे

    फरेब खाने की तो तालीम अपनी बड़ी पुरानी है
    हम फूलों की तरह मिलते, वो दिखाते काटों का गुस्सा मुझे

    राजेश’अरमान’

  • तूफां मन के

    तूफां मन के अंदर हो या समुन्दर में
    लहरें कुछ न कुछ खींच के ले ही जाती है
    राजेश ‘अरमान’

  • मैंने खुद ही

    मैंने खुद ही
    खींची लकीरें
    अपने दरम्या

    मैंने खुद ही
    बना दिये
    इतने धर्म

    मैंने खुद ही
    सीखा दिया
    भूर्ण को छल कपट

    मैंने खुद ही
    गिरा दिए
    अपने संस्कार

    मैंने खुद ही
    मिटा दिए
    अपने हर्ष को

    मैंने खुद ही
    बना लिए
    खाली मकान

    मैंने खुद ही
    जला दिए
    अपने सपनो को

    मैंने खुद ही
    ओढ़ लिए
    कई चेहरे

    मैंने खुद ही
    सब किया है
    अब तक

    मैंने खुद ही
    रचा है
    अतृप्त रंगमच

    मैंने खुद ही
    सजाये है
    सूनी सेज

    मैंने खुद ही
    बहाये है
    आँखों से नीर

    मैंने खुद ही
    नहीं माना
    खुदको दोषी

    क्या हो अंत
    इस खुद का
    जो है अनंत

    जिजीविषा के
    इस मायावी
    अंतर्मन को

    किसी की नहीं
    दस्तक चाहिए, बस ,
    अपने खुद की

    राजेश’अरमान’

  • बंदगी तेरी

    बंदगी तेरी यूँ मेरे काम आ गई
    अब किसी दुआ की जुस्तजू न रही

    राजेश’अरमान’

  • मन की चेतना

    मन की चेतना
    आत्मा की वेदना
    सत्य का भेदना
    अधीर प्रश्न
    बुझे उत्तर
    बिलखते प्रश्नचिन्ह
    निष्कर्ष कुंठित
    आज का आदमी

    राजेश ‘अरमान’

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