कुछ परछाइयाँ सी चलती है मेरे पीछे , वक़्त भी बहरूपिया होता है गुमाँ न था राजेश’अरमान’
कुछ परछाइयाँ सी चलती है मेरे पीछे , वक़्त भी बहरूपिया होता है गुमाँ न था राजेश’अरमान’
कभी मन करता है फिर से दुनिया को औरों की नज़र से देखूँ शायद मेरी नज़र में कोई भ्रान्ति दोष हो एक बार देखा जब दुनिया को दूसरी नज़र से लगा आँखों पे कोई चाबुक […]
गहरे राज़ छुपे है अपनी ही साँसों में लो तो ठंडी छोड़ों तो गर्म -गर्म राजेश’अरमान’
आँखें तो बस देखती रही ज़िंदगी के आवागमन को राजेश’अरमान’
कोई पुल ऐसा भी होता जिस पर चलते सिर्फ तुम राजेश’अरमान’
मर गई आत्मा ,शरीर कहने को ज़िंदा है पंछी मन का उड़ गया ,आँखों में परिंदा है राजेश’अरमान’
न सूत न कपास फिर भी बंधी आस जुलाहे ले के बैठे लट्ठ कभी तो आएगी कपास राजेश’अरमान
चारों और अधर्म के जंगल भक्ति हो गई दावानल राजेश’अरमान’
अच्छा हुआ आँखों से बह गए आँसूं जो जिगर में जम जाते तो हादसा होता राजेश’अरमान’
अपनी हर सांस तो बस तेरी चाह में गुजरी तेरी सारी उम्र जमाने की परवाह में गुजरी सोचा था कहोगे उदास तुम मेरी खातिर न हो क्या कहेगा ज़माना ,फिक्र ज़िंदगी की राह में गुजरी […]
मेरे लफ्ज़ ग़ुलाम बन गए तेरे लफ़्ज़ों की सरफ़रोशी से राजेश’अरमान’
कभी बादलों से कभी बिजलिओं से बनती है सरगम कलकल बहते पानी चलती हवाओं से बनती है सरगम इठलाती घूमती बेटियां होती झंकार बनती है सरगम अपनी साँसें भी जब सुर में हो बनती है […]
कल रात फिर आँखों में गिरफ्तार हुए कई ख्वाब नशे में आवारागर्दी करते राजेश’अरमान ‘
कोई वज़ह यूँ भी निकल आती तेरे मिलने की तारों की सजी डोली लेके आता कहार मेरे मन के द्वार मैं मन ही मन में रूप लेता निहार काश उस डोली में कोई ख्वाब सजा […]
देख लेता मैं भी तेरे जलवे गर तेरे जलवे पराये न होते राजेश’अरमान’
की परवरिश जिन ख़्वाबों की औलाद की तरह दफ़न कर मुझे फ़र्ज़ निभाया औलाद की तरह राजेश’अरमान
गम की फसलें सींचता आँखों की बारिश से हर ख्वाब ने दम तोडा अपनी ही गुजारिश से राजेश’अरमान’
किसी ने सूद से भरी पुरवाइयां चुनी किसी ने दर्द भरी शहनाइयां चुनी हमें कुछ चुनने का हुनर न आता था सो गम से लिपटी तन्हाईयाँ चुनी राजेश’अरमान’
चल पड़ा फिर जिस्म किसी राह में मन को छोड़ अकेला क्यों नहीं चलते दोनों साथ -साथ कोई रंजिश नहीं फिर भी रंजिश फूल की बगावत किसी टहनी से भवरे की शिकायत किसी फूलों से […]
रात अपना ही कोई किस्सा बन जाता हूँ दिन के उजाले में कोई हिस्सा बन जाता हूँ निकल तो जाता हूँ बाज़ारों में कहीं शाम के होते ही न चलने वाला कोई सिक्का बन जाता […]
जरूरत के हिसाब से , खुद से पहचान हुई कई हिस्से अब भी अजनबी है मेरे अंदर राजेश’अरमान’
उसकी नज़रों की तलाशी में मेरे किरदार बदले से मिले मैं ढूंढ़ता रहा उसकी आँखों में चंद कतरे पर जमे से मिलें राजेश’अरमान’
अब मंज़िल मेरे साथ-साथ चलती है जब से बनाया मंज़िल अपने साये को राजेश’अरमान’
चंद क़दमों में थक के बैठ गया राही मंज़िल मुसीबत नहीं जो बैठे- बैठे गले पड़े राजेश’अरमान’
कुछ खास है वो मेरे वास्ते दे गए सब बिना मोल-भाव के राजेश’अरमान’
वीराने भी अब गुफ्तगू करने लगे नज़र लग गयी इसे भी जमाने की राजेश’अरमान’
चाहा था इक बार फिर अजनबी बन जाना वो मिलते है हर बार अब अजनबी से राजेश’अरमान’
मेरे जज्बात अब पत्थर हो गए है अब फूलों की बातें पहरों में सिसक रही है अब लहरें समुन्दर की सांसें बन गई है अब हवाओं में फैल गए है नग्मे दर्द भरे अब जमाने […]
कुछ तो हैरान होगी ज़िंदगी भी जब हमने अपना मुँह मोड़ लिया राजेश’अरमान’
बचपन की कागज़ की नाव जो बारिश के पानी में तैरती थी जो कई बार तैरते तैरते थक जाती थी और उसे फिर से सीधा कर पानी में छोड़ देते थे और वो फिर तैरने […]
मंज़िल की बेताबी खत्म हुई यूँ कारवां से दिल लगाया हमने राजेश’अरमान’
हम बढ़ते रहे हम समझते रहे हम पढ़ते गए हम समझते गए छोटे थे तो बड़ा होने का ख्वाब बड़े हुए तो बचपन लगा प्यारा कुछ पाया तो खोने का डर कुछ न था तो […]
दोस्त इक अजीब सा रिश्ता पनपने लगा हम दोनों के बीच इक दूजे के दर्द को महसूस सा करने लगे कुछ खट्टी कुछ मीठी सांसों का बँटवारा भी रजा से करने लगे कुछ प्यार से […]
जुर्म उनके ,सितम उनके ,खता उनकी हम तो अब भी खाली हाथ बैठे है राजेश’अरमान’
रहस्य जीवन अनेक प्रश्न निरुत्तर प्रश्न संभव जीवन संभव मोक्ष निरर्थक प्रश्न पुनर्जन्म संभव जन्म सार्थक प्रश्न मृत्यु प्रश्न सत्य प्रश्न यथार्थ प्रश्न प्रारब्ध चिंतन सार्वभौमिक चिंतन अलोकिक प्रश्न जीवन चिंतन जीवंत प्रश्न आलोकित प्रश्न […]
जिधर का रुख करें इन फ़िज़ाओं को साथ रख लेना इन फ़िज़ाओं में बसी अपनी साँसों को साथ रख लेना वक़्त मिलता कहाँ कभी खुद से रुबरूं होने का कभी हाथों में तुम एक टूटा […]
जीतने की ख्वाइश में कछुए सा चल रहा हूँ, लेकिन ख्वाइशों का खरगोश सोने के लिए रूकता ही नहीं राजेश’अरमान’
खौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है हर शक्ल आईने के सामने आकर बिखर जाती है कुछ तो रहस्य छिपा है आईने में शक्ल जो सिहर जाती है आईने को तोड़ के देखा शक्लों […]
बंद कर देखों नयन अपने खुली रहने दो , सब जो नयन नहीं है नयन से देखने का अभ्यास अविरल है स्वयं अन्य इन्द्रियों की दृष्टि शक्ति कम की है अभ्यास एक शास्वत जीवंत परिणाम […]
अपने साये भी अब अनजान नज़र आते है बिन बुलाये से मेहमान नज़र आते है हर शक्स उदास हर रिश्ते अब तो पत्थरों से ये बेजान नज़र आते है राजेश’अरमान’
तालीम कुछ गिनती की यूँ काम आई बस जाती सांसों को गिनता रह गया राजेश’अरमान’
मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है मृग जाने किस चाह से भटक रहा है रहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं दर्पण किस गुनाह से भटक रहा है किस सत्य की खोज में मन […]
सच ने जब भी तोडा है दम झूठ ने ही उसे अग्नि दी है राजेश’अरमान’
था वो गुलाब के मानिंद नज़र बस तेरी काटों पे गड़ी मैंने भी महसूस किया कैक्टस को नज़रे जो कभी फूलों पे पड़ी राजेश’अरमान’
जब अपनी ही साँसें एहसान जताने लगे समझ लो साँसें भी अपनी हो गई है राजेश’अरमान’
धर्म की दूकान सदियों से चल रही है , कीमत तो चुकाई पर सामान नहीं मिला राजेश’अरमान’
बिखरी जा रही ज़िंदगी कुछ तेज रफ़्तार से कोई मोहलत नहीं कुछ भी दुरुस्त करने को राजेश’अरमान’
तेरी बेरुखी इस कदर काम कर गई बेवज़ह वक़्त को बदनाम कर गई रिश्तों पे पड़ी धूल जब जमने लगी ख़ामोशी के राज़ सरेआम कर गई राजेश’अरमान’
हर फैसले मेरे तेरे क़दमों में थे तूने क़दमों का फ़ासला कर लिया न हो दरम्यां सांसें भी अपनी लेकिन , तूने ज़ख्मों का काफिला चुन लिया राजेश’अरमान’
मैं समझ नहीं पाता अपने ही देश में देशद्रोहिता के रहस्य मैं समझ नहीं पाता अपने ही देश में असहिष्णुता के मायने मैं समझ नहीं पाता अपने ही देश में पलता धर्मो का खेल मैं […]
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