Author: UE Vijay Sharma
तेरी कश्ती मेरी कश्ती बस इतनी सी तो रवानी है हर ज़िन्दगी की कहानी है सब कागज की कश्ती है और ख़ुद को पार लगानी है दिखती सब अलग सी हैं असल में […]
वैराग-चित् संपदा कर पाए जब तूं दिल से प्रति सुख और दुख के, एक समान उपेक्षा कर पाए जब अंतर मन से विभिन भ्रांतियों पर, चिरकाल विजय कर पाए जब यह अनुभूति ना इधर […]
गुरु – महिमा यह रचना है , गुरु-देव की महिमा का गुनगान , वो ख़ुद के चित् में है अन्तहीन , जिनकी परिभाषा है असीम , ऋषि की विशिष्टताओं का पैग़ाम जो देकर हमको […]
धीरे से उठाना सदियों से गह्न निद्रा में , है सोया यह समाज़ , धीरे से उठाना युगों का अंधकार समेटे , है सोया यह समाज़ , धीरे से उठाना इसको सुबह की […]
ज़िंन्दगी एक दिन की मेरा हर सुबह मौत के गर्भ से ख़ुद को जन्म देना हर रात ढले अपने ही कंधों पे ख़ुद को मरघट ले जाना उस मंदिर के आँगन में, ख़ुद को खुद […]
अर्जुन की राह मन मेरा शंकित हो कहता , अर्जुन मैं भी हो जाता , गर सारथी मेरा कृष्ण हो पाता , जीवन मेरा भी तर जाता , गर कृष्ण को मैं ढूंढ़ पता […]
मृत्यु – एक पड़ाव अंधकार नही , जीवन का द्वार है मृत्यु भय नही , उससे मिलने की राह है मृत्यु होता तात्पर्य मृत्यु का मिटना , पर मिटता यहां कुछ भी नहीं […]
ख़ुद को कर्म–पथ पे जिवा, धर्म–पथ भी निभाना है धर्म–पथ पर चलते हुए, भूलों को राह दिखानी है अपने तन की पीर भुला, औरन की पीर घटानी है जिनके अपने भूल चुके, अपना उन्हेँ बनाना है हार चुके मनों को , जीत की राह दिखानी है नाम, वैभव, वित की चाह भुला, परार्थ की राह अपनानी है लोग जो तम में बस्ते है, दिल में उनके दीपक की लो जलानी है ना–उम्मीदी से भरे दिलों को, उम्मीद की किरणों से सजाना है जिन्हें लोग तुछ मान चुके, सम्मान उनका लौटाना है सबके दिलो में सम्मानता ला, भिन्नता को दफनाना है यह जो मेरा जीवन है , यह कर्म–धर्म का जीवन है यूई कर्म–धर्म की राहों को, अब सहर्ष निभाना है तन–मन से अपना इस राह को, मानव–धर्म को नयी ऊँचाई दिलाना है […]
कर्म–पथ कर्म–पथ पर चलना है, कोई दुरमति राह अपनानी नहीं मिलेगी उलझी डगर यहां, इसमें कभी घभ्ह्रना नहीं बड़ते हुए कठिन राहो पर, भूले से कभी उक्ताना नहीं मंज़िल अपनी पाए बिना, मन से कभी […]
अधूरे ख्वाब थे ख्वाब जो चुन-बुन सजाए हमनें पा मुझको तन्हा , बहुत तड़पाते हैं . कारवाँ तेरी यादों का लंबा है , या मेरे ग़मों की रात गहरी है , दशकों बीते, […]
ए ज़िन्दगी कैसे शिकायत करूँ तुझसे खुदा की बंदगी पाई तुझसे बस तुझमें सिमटा रह्ता हूँ हर पल तेरे ही संग रहता हूँ कभी टेडी मेडी लकीरों में कभी रंग भर उन्ही लकीरों […]
मुझे याद रहा, तुम भूल गए कहने को दो दिल चार आँखे हम, थी एक रूह में बस्ती जान हमारी कहने को दिया और बाती हम, थी बस लौ ही पहचान हमारी मदमस्त हवाओं के झोंकों से, थे लहराते गाते जज़्बात हमारे, उतार सजाया आस्मानो में, थे सपने जो जनमें पलकों तले हमारे कुछ यूँ खाईं थी क़समें हमने, हर हाल में प्यार निभाएँगे मिल पाए तो ज़िन्दा हैं, ना मिल पाए तो यादों में निभाएँगे हुए गर तन से ज़ुदा तो क्या, ज़ुदा ना मन से कभी हो पाएँगे गर साँसें छोड़ जाएँ साथ तो क्या, जन्मो का साथ निभाएँगे बरसों से हम उसी मोड़ पे अटके, राह जहां से तुम बदल गए मोहब्बत को नए मायने दे कर, उन मायनों को ही तुम बदल गए उठा फर्श से अर्श पे बिठा हमको, अपना अर्श ही तुम बदल गए वफाएँ लेती थी तुमसे सबक वफ़ा का, अपना सबक ही तुम बदल गए जब मुझको सब यह याद रहा, कैसे तुम सब भूल गए मर के भी यूई भूल ना पाया, […]
इशक है तेरा ग़ुरबत के वक्त को , मेरी रज़ा मान हाथ जोड़ जाना इशक है तेरा अपनी हर सफलता को , मेरी दुआ कह जाना इशक है
इशक है तेरा मेरे हर रुप की , बन्दगी में झुक जाना इशक है तेरा मुझे पाने के […]
तेरा बिना ख्वाहिश के , आजन्म मुझसे मिलते रहना इशक है तेरा मेरी जूठन को भी , चूम कर अपना जाना इशक है
तेरा बंद आँखों कर , मेरे मन में उतर जाना इशक है तेरा मेरे नूर में खो , मंद मंद मुस्कराना इशक है
अहिंसक होना है जीवंत जीवन का दर्पण यह, प्रतिबद्धता है आजन्म की यह , है ख़ुद की ख़ुद से लड़ाई यह , कर यूई , संपूर्ण अहिंसक हो
अहिंसक होना है नही कोई मुखौटा यह , आत्मा का है पह्नावा यह , है नही कोई दिखावा यह , चित् का है आभूषण यह ,
अहिंसक होना अहिंसक विचारों का दहन जब कर पाएगा , तब संपूर्ण अहिंसा की राह् तूं चल पाएगा
अहिंसक होना ना होना हिंसा का, नहीं अहिंसा का लक्षण , तलवार फेंक देने से, अहिंसक ना हो पाएगा
अहिंसक हो मेरे चित् , अहिंसक हो अनैतिक भाव , क्भी नहीं निर्जीव पे वार , क्भी नहीं
अहिंसक हो मेरे चित् , अहिंसक हो जीव हत्या , क्भी नहीं वनस्पति अपमान , क्भी नहीं
अहिंसक हो मेरे चित् , अहिंसक हो दुर्वचन अपशब्द , क्भी नहीं ज्ञान निरादर, क्भी नहीं
अहिंसक हो मेरे चित् , अहिंसक हो शस्त्र उपयोग क्भी नहीं छल कपट क्भी नहीं […]
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो आए सब जहाँ से हम , वहीं तो लौट जाना हैं , जिसके हैं असल में हम , उसमें ही तो स्माना है
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो जिस धन का ना कोई मोल वहाँ, उस धन को क्यों कर पाना हैं , वोह धन जो अनमोल वहाँ, बस वोही धन यहाँ कमाना हैं
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो परम् – सत्य हैं स्दीवी आगे , फिर तूने क्यों मूंदी हैं आँखें , तब पछताए क्या पाएगा, अब संभला तो सब संभल जाएगा
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो काले कर्म जितने किये यहाँ हैं, अकेले देना हिसाब वहाँ हैं, खातिर जिनकी किये कुकर्म यहाँ, उनमें होगा ना कोई संग वहाँ
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो समान जो दिखता तेरा मेरा , है यह सब ना तेरा – ना मेरा , यह सब उस मालिक की माया, उसकी रज़ा से इस देह संग पाया
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो सच में तो हैं सब अकेले , फिर भी करते मेले – मेले
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो नही है कोई यहाँ किसी का, ना ही हो तुम भी किसी के
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो ना कोई आने की राह का साथी, ना जाने की राह का कोई नाती
अच्छा है , जितना जल्दी जान लो आते हैं यहाँ सब अकेले, जाते भी हैं सब अकेले ,
इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है तेरे अंतर्मन अपनी जगह बनायी है