भूखा प्यासा नन्हा सा बालक,
सड़क किनारे बैठा था वो,
फटे थे तन पर कपड़े उसके,
मांग कर खाना ही फितरत थी उसकी,
ममता उसे नसीब न थी,
मां बाबा कहकर किसी
को पुकारा भी ना था,
पडी निगाह एक दिलदार की
उस पर, दिया सहारा
उसने उसे बेटा बना कर,
होते बहुत कम है ऐसे रहमदिल,
सबको अपनी की परी है आजकल,
देता नहीं कोई साथ किसी का,
बस अपना स्वार्थ देखते हैं आजकल |
Bhukha pyasa nanha sa balak
Comments
2 responses to “Bhukha pyasa nanha sa balak”
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अतिसुन्दर मार्मिक रचना
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Awesome
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