Category: हिन्दी-उर्दू कविता

  • गंगा की व्यथा

    जीवन का आधार हूं मैं
    भागीरथ की पुकार हूं मैं
    मोक्ष का द्वार हूं मैं
    तेरे पूर्वजों का उपहार हूं मैं
    तेरा आज, तेरा कल हूं मैं
    तुझ पर ममता का आंचल हूं मैं
    हर युग की कथा हूं मैं
    विचलित व्यथित व्यथा हूं मैं
    तेरी मां हूं मैं, गंगा हूं मैं|

    अनादि अनंत काल से
    हिमगिरी से बह रही
    तेरी हर पीढ़ी को
    अपने पानी से सींच रही
    मेरी धारों से गर्वित धरा
    धन-धान से फूल रही
    विडंबना है यह कैसी?
    यह धरा ही मुझको भूल रही
    क्ष्रद्धाएं रो रही है, विश्वास रो रहा है
    प्रणय विकल रहा है, मेरा ह्रदय रो रहा है
    तेरी क्ष्रध्दा का श्रोत हूं मैं
    प्रणय का प्रकोष हूं मैं
    मेरी मासूम बूंदो का रोष हूं मैं
    तेरी मां हूं मैं, गंगा हूं मैं|

    असहाय हूं मैं,लाचार हूं
    सदियों से शोषण का शिकार हूं
    अब तो थोडी सी अपनी उदारता का प्रमाण दो
    मेरी इस दशा को थोडा तो सुधार दो
    तेरे संस्कारो का क्ष्रंगार हूं मैं
    तेरी संस्क्रति की गरिमा हूं मैं
    तेरी मां हूं मैं, गंगा हूं मैं…. गंगा |

  • कहीं हमको भी जाना है..

    तू ही दौलत मेरे दिल कि तू ही मेरा खज़ाना है,
    मेरे दिल में मेरे साक़ी तेरा ही गुनगुनाना है.
    चलो अब देखते है फिर मुलाक़ातें कहाँ होंगी ,
    कहीं तुमको भी जाना है कहीं हमको भी जाना है..

    ….atr

  • मुझको पिलाओ यारो…..

    आज फिर जी भर के मुझको पिलाओ यारो,
    मैं तो झूमा हूँ, मुझे और झुमाओ यारो..
    आज इतनी पिलाओ कि फिर होश न रहे,
    अब तो साकी से मुझे और दिलाओ यारो..
    रात आधी है बंद है मयकदा,
    मेरे जीने के लिए इसको खुलाओ यारो..
    पी पी के मरने में वक़्त लगेगा मुझे;
    आज ही बंद करके मय न जलाओ यारो.

    फिर कभी याद में उसकी न धुआं दिल से उठे ,
    इसलिए दिल में लगी आग बुझाओ यारो…
    आज फिर जी भर के मुझको पिलाओ यारो..

    …atr

  • तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है

    तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है

    तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है
    तुझसे एक बार मैं कह दू, तू मेरी जुस्तजु है

    भॅवरा बनकर भटकता रहा महोब्बत ए मधुवन में
    चमन में चारो तरफ फैली जो तेरी खुशबु है

    जल जाता है परवाना होकर पागल
    जानता है जिंदगी दो पल की गुफ्तगु है

    दर्द–ए–दिल–ए–दास्ता कैसे कहे तुझसे
    नहीं खबर मुझे कहां मैं और कहां तू है

    शायर- ए- ग़म तो मैं नहीं हूं मगर
    मेरे दिल से निकली हर गज़ल में बस तू है

  • उनकी उलझी हुई जुल्फ़ें

    उनकी उलझी हुई जुल्फ़ें

    उनकी उलझी हुई जुल्फ़ें जब मेरे शानों पे बिखरती है
    सुलझ सी जाती है मेरी उलझी हुई जिंदगी

  • न उस रात चांदनी होती

    न उस रात चांदनी होती

    न उस रात चांदनी होती
    न वो चांद सा चेहरा दिखता
    न मासूम मोहब्बत होती
    न नादान दिला ताउम्र तडपता

  • मैं तो सन्नाटा हूं

    ये तो मुमकिन नही यूं ही फ़ना हो जाऊं
    मैं तो सन्नाटा हूं फैलूं तो सदा हो जाऊं

  • सलाखें ग़ज़ल गाती हैं

    अब तो उनके घर से सदायें आती हैं ,जो कभी मेरे न थे उनकी भी दुआएं आती हैं …
    सुना है उन मकानों में हज़ारो कत्लखाने हैं , जहाँ दिल चूर होते हैं , सलाखें ग़ज़ल गाती हैं…
    ……

    …atr

  • मैं आइना हूँ……

    न मैं उसके जैसा हूँ ,न मैं तेरे जैसा हूँ ,
    जो देखेगा मुझे जैसा ,यहाँ मैं उसके जैसा हूँ..
    न मेरी जाति है कोई ,न मज़हब से है मेरा नाम,
    न मंदिर की मुझे चिंता ,न मस्जिद से मुझे है काम.
    मैंने देखा है उसे प्यार की रंगीन मुद्रा में,
    मगर मैं फिर भी कहता हूँ , न कहता हूँ मैं गैरों से..
    मैंने प्यार की अटखेलियां दोनों की देखीं है,
    मगर अब चाह बस मेरी यही इतनी सी बाक़ी है,
    मैं चाहता हूँ कि मैं बस प्यार देखूं ,न क्रोध ,न भय ,न चिंता,
    क्यूंकि मैं मैं नहीं,मैं तुम हूँ,मैं वो हूँ ,मैं ये हूँ,
    मैं सबकुछ नहीं …….मैं आइना हूँ……

    …atr

  • आज फिर कोई रो रहा है….

    आज फिर कोई रो रहा है…
    फिर कहीं किसी किसी गली से आवाज़ आ रही है,
    फिर आज कोई बैठा समंदर पिरो रहा है..
    आज फिर कोई रो रहा है….

    फिर कहीं कोई कसक नैनों में आ गयी,
    फिर वादो की टूटी माला कोई पिरो रहा है,
    आज फिर कोई रो रहा है..

    आँखों से उमङा सागर दीदार प्रिया का पाकर ,
    फिर कोई प्रणयनी का आँचल भिगो रहा है,
    आज फिर कोई रो रहा है…..

    प्रीति की लपट से फिर झुलस गया कोई ,
    फिर तीर से हो लथपथ दिल को संजो रहा है ,
    आज फिर कोई रो रहा है……

    …atr

  • एक प्रश्न

    आँखों से झरते आंसू ने थमकर पूछा
    आखिर सजा क्यों मिली मुझे ख़ुदकुशी की?
    दिल रो पड़ा पुराना जखम फिर हरा हुआ,
    कहा, गुनाह उसी ने किया जिस छत से तू गिरा ..

    ..atr

  • मंज़िलें नज़दीक है…

    सफर शुरू हुआ है मगर मंज़िलें नज़दीक है…
    ज़िंदगी जब जंगलोके बीच से गुजरे,
    कही किसी शेर की आहट सुनाई दे,
    जब रात हो घुप्प ,चाँद छिप पड़े,
    तब समझ लेना मुसाफिर मंज़िलें नज़दीक है..
    जब सावन की बदली तुम्हारी ज़िंदगी ढक ले,
    पड़ने लगे बूंदे रात में हौले हौले,
    हो मूसलाधार जब बरस पड़े ओले,
    तब समझ लेना मुसाफिर मंज़िले नज़दीक है..

    .
    हो घना कुहरा के आँखे देख न पाये,
    जब पड़े पाला ,रात में स्वान चिल्लाएं,
    अचानक तीव्र तीखी जब हवा चलने लगे,
    तब समझ लेना मुसाफिर मंज़िले नज़दीक हैं..
    जब कड़कती धूप में चेतनता जाने लगे,
    आश्मान से जब दिवाकर आग बरसाने लगे,
    फ़ट पड़े धरती अचानक जब प्रलय के काल से,
    तब समझ लेना मुसाफिर मंज़िले नज़दीक हैं..
    यदि मुसाफिर इन दशाओं में तेरी शक्ति रहे,
    तू सदा जगता रहे,चलता रहे,
    आप पर विश्वास लेकर शंख की उन्नाद से,
    तब समझ लेना मुसाफिर मंज़िले नज़दीक हैं..

    …atr

  • बस प्यार चाहिए

    हथियार न बन्दूक न तलवार चाहिए ,

    इंसान से इंसान का बस प्यार चाहिए.

    है बंद गुलिस्ता ये मुद्दतो से मीर,
    इस में फकत गुल ओ बहार चाहिए.
    नेकी की राह बड़ी बेरहम है ना,
    नेकी के मुसाफिर को तलबगार चाहिए.
    न भीड़ हो अन्धो की,गूंगो की,और बहरों की यहाँ,
    जो हो शरीफ उनका मुश्कबार चाहिए.

    ये इश्क की सजा है या तूणीर का कहर ,
    ये तीर इस जिगर के आर पार चाहिए.
    ग़मगीन जो समां हो मेरा नाम लेना मीर ,
    चेहरे पे ख़ुशी और दिल में प्यार चाहिए.

    ….atr

  • इस कफ़स में वो उडान, मैं कहॉ से लाऊं

    इन परों में वो आसमान, मैं कहॉ से लाऊं
    इस कफ़स में वो उडान, मैं कहॉ से लाऊं   (कफ़स  = cage)

    हो गये पेड सूने इस पतझड के शागिर्द में
    अब इन पर नये पत्ते, मैं कहॉ से लाऊं

    जले हुए गांव में अब बन गये है नये घर
    अब इन घरों में रखने को नये लोग, मैं कहॉ से लाऊं

    बुझी-बुझी है जिंदगी, बुझे-बुझे से है जज्बात यहॉ
    इस बुझी हुई राख में चिन्गारियॉ, मैं कहॉ से लाऊं

    पथरा गयी है मेरे ख्यालों की दुनिया
    अब इस दुनिया में मुस्कान, मैं कहॉ से लाऊं

  • …पुरानी नजरों से

    उनको हर रोज नये चांद सा नया पाया हमने
    मगर उन्होने हमें देखा वही पुरानी नजरों से

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  • शागिर्द ए शाम

    जब शागिर्द ए शाम तुम हो तो खल्क का ख्याल क्या करें
    जुस्तजु ही नहीं किसी जबाब की तो सवाल क्या करें

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  • अब न चांदनी रही न कोई चिराग रहा

    अब न चांदनी रही न कोई चिराग रहा
    राहों में रोशनी के लिए न कोई आफताब रहा

    उनकी महोब्बत के हम मकरूज़ हो गए
    उनका दो पल का प्यार हम पर उधार रहा

    वेवफाई से भरी दुनिया में हम वफा को तरस गए
    अब तो खुद पर भी न हमें एतबार रहा

    शम्मा के दर पर बसर कर दी जिंदगी सारी
    परवाने को शम्मा में जलने का इंतजार रहा

    उन्हे देख देख कभी गज़ल लिखा करते थे हम
    अब न वो गजल रही और न वो हॅसी गुबार रहा

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  • कैसे करें शिकवे

    कैसे करें शिकवे गिले हम उनसे
    उनकी हर मासूम खता के हम खिदमतगार है

    sign

  • वो आये कभी पतझङ कभी सावन की तरह

    वो आये कभी पतझङ कभी सावन की तरह
    जिंदगी हमें मिली हमेशा बस उनकी तरह

    फूलों के तसव्वुर में भी हुआ उनका अहसास
    आये वो मेरी जिंदगी में खिलती कली की तरह

    जब से दी जगह खुदा की उनको दिल में हमने
    याद करना उनको हो गया इबादत की तरह

    डूब गया दिल दर्द ए गम ए महोब्बत में
    बहा ले गयी हमें साहिल ए इश्क में लहरो की तरह

    हुई जब रुह रुबरु उनसे जिंदगी ए महफिल में
    समा गयी वो मेरी रुह में सांसो की तरह

  • ये कैसा तसव्वुर, कैसा रब्त

    ये कैसा तसव्वुर, कैसा रब्त, कैसा वक्त है
    जो कभी होता भी नहीं, कभी गुजरता भी नहीं

    रब्तः संबंध

     

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