अपनी उलझनों के हम यूँ आदी हो गए है
कभी मुजरिम तो कभी फरियादी हो गए है
न होता कुछ तो कुछ और जरूर होता
बस इसी सोच में कोई बर्बादी हो गए है
राजेश’अरमान’
Category: हिन्दी-उर्दू कविता
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soch
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तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं
तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं
प्यार तो दूर बहुत मैं तेरी नफरत भी नहींक्या दबा रखा है अंदर किसी खंजर की तरह
अब मरासिम न सही मगर ऐसी अदावत भी नहींज़ख्म गीले है अपने कहीं तो निशां रहेंगे लेकिन
दिल में इक शोर है मगर ऐसी बगावत भी नहींअपने अंदर हूँ खुद किसी अजनबी की तरह
जान पहचान की मगर कोई फुर्सत भी नहींयूँ तो मिलते है सभी अपने ही सायों की तरह
हाथ तो बढ़ते है मगर ऐसी कुर्बत भी नहींराजेश ‘अरमान’
२०-०२-२०१६ -
मेरी आवाज दबा दी गयी
मेरी आवाज दबा दी गयी
मेरे अल्फ़ाज मिटा दिये गये
जला दिया मेरा जिस्म भी दुनिया ने
मगर ख्वाहिशे कहां मिटती है
ढ़ूढ़ लेती है कोई न कोई राह
निकल पडती है परत दर परत
मिट्टी में मिलने के बाद
इक नन्हे पौधे की तरह! -

छोटू
दुबले-पतले,गोरे-काले।
तन पर कपड़े जैसे जाले।।
दिख जाते हैं।
नुक्कड़ पर,दुकानों पर।
ढाबों पर,निर्माणधीर मकानों पर।।देश में इन की पूरी फौज।
बिना लक्ष्य ये फिरते हैं यहां वहां हर रोज़।।
ज़िन्दगी के पाठ ये बचपन में सीख लेते हैं।
कल की इन्हें फिकर नहीं ये आज में जीते हैं।।कुछ अनाथ हैं।
कुछ के पास परिवार का साथ है।।
नन्ही सी उम्र में ये परेशान,मजबूर हैं।
देश डिजिटल हो रहा है,ये एनालॉग से भी दूर हैं।।इनके लिए,ज़िन्दगी एक कठिन सी जंग है।
दिवाली अँधेरी और होली बेरंग है।।
पारिवारिक बोझ ने इनकी आशाओं को धो दिया।
दुनियादारी की होड़ में अपना बचपन युहीं खो दिया।।ये बेचारे बेबस गुमसुम से रहते हैं।
और इस देश के लोग इन्हें छोटू कहते हैं।।
हमारी से दूर इन्होंने अपनी दुनिया संजोई है।
सपने ये देखते नहीं,उम्मीदें इनकी सोई हैं।।इतना सब सहकर भी इन्होंने
हिम्मत अपनी खोई नहीं।
मेरी नज़र में इन छोटुओं से बड़ा
पूरी दुनिया में कोई नहीं।। -
“जवाब” #2Liner-62….
ღღ__मैं कह ही नहीं पाता, या तुम समझ नहीं पाते साहब;.कि अक्सर कुछ सवालों के, कोई जवाब नहीं होते !!…..#अक्स. -

बस एक बार फिर …
जॅंहा बचपन गुजारा ,
उन गलियों में जाना चाहती हूं ;
जिन्होनें बचपन सॅंवारा,
उन पत्थरों से खेलना चाहती हूं ;
आलीशान बगांले को छोड़कर,
मम्मी की साड़ी से बने घर में रहना चाहती हॅू ;
ब्रांडेड चाकॅलेट छोड़कर,
सतंरी टॉफी और खट्टे – मीठे चुरन का मज़ा लेना चाहती हॅू ;
किताबों को छोड़कर गेंद थमाना चाहती हॅू ,
एक शरारत करना चाहती हॅू ,
वक्त के पहिये को उल्टा घुमना चाहती हॅू ;
बस एक बार फिर बचपन जीना चाहती हॅू ,
बचपन जीना चाहती हॅू | -
चाहतों के दरमियाँ दर्द की दीवारें हैं
चाहतों के दरमियाँ दर्द की दीवारें हैं!
ख्वाहिशों में हरतरफ दौड़ती दरारें हैं!
खोजते हैं सब्र को मयखानों में सभी,
मयकशी में डूबते ख्वाब के नजारे हैं!Composed By #महादेव
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कविता — संदर्भ हीन
तुम !
किसी दुर्दम्य वासना में क़ैद
छटपटातीं रहीं
जल — हीन मछली सी …….और मैं ;
तमाम वर्जनाओं में घिरा
मोम–सा पिघलता रहा
अनमना सुलगता रहा
यक़ीनन , यह समझौता था—सम्बंध नहीं
कहीं कोई प्रतिकार नहीं
तनिक भी प्रतिबंध नहींतब भी ———
जब ओढ़ती रहीं : तुम
उस मर्द की देह
: जिसे पति कहा गया ………..
एक अनमनी प्रक्रिया की तरह
निर्लिप्त परोपकार लिए
: वंश—परम्परा हेतुतुम !
बनी रहीं बंजर ; अ—सिंचित जमीन सी
स्लथ ……. स्तंभित ………… स्खलित“ वह “————–
जब भी मनोयोग से झुका तुम पर
“तुम” , ……… और ऊपर उठ गईं
: ऊपर—बहुत ऊपर…उसकी पहुँच से परे
दोनों चेतनाएं —— भटकती रहीं
भौतिक—क्रियाएँ असामान्य पूर्वाग्रह लिए
प्रतिक्रिया—विहीन हादसे सी गुजरींलेकिन ; कहाँ था दोषी ?
‘ वह मर्द ‘…….. जो पति था !
मगर ; पा न सका अपना स्वामित्व
अनुभवों ने तुम्हें बखूबी सिखाया
मोहजाल फैलानावही हुआ ——-
‘ जिस्म के जंगल ‘ का ‘ वर्जित फल ‘
खाने की लालसा , ले आई तुम्हें
अनगिनत बाहों में पिसने के लिए
मिथ्या–सुख की प्रपंची—ज्वालायें
पोर ——- पोर में समाकर
आप्यायित करती रहीं : तुम्हेंतुम !
उन्मुक्त मादा सी
यौवन—भार से इठलातीं
विचरतीं रहीं निरंकुश
अ—विश्वास की तेज़ धूप में
परछाई—सी …. बद—हवास
किसी अंत————हीन यात्रा में
संदर्भ—हीन……एकाकी…….निरर्थक
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ग़ज़ल
ग़ज़ल
: अनुपम त्रिपाठीइक शख्स कभी शहर से ;
पहुँचा था गाँव में ।
अब रास्ते सब गाँव के ;
जाते हैं शहर को ।।खेत–फ़सल–मौसम ;
खलिहान हैं उदास ।
ग़मगीन चुभे पनघट ;
हर सूनी नज़र को ।।कुम्हलाने लगे ” चाँद” ये;
घूंघट की ओट में ।
पायल से पूछें चूडियाँ ;
कब आयेंगे घर ” वो ” ।।बेटा निढाल हो के ;
हर रोज पूंछे माँ से ।
क्यूं छोड़ गया बापू ?
इस गाँव को– घर को ।।गाँवों में कम है : सुविधा;
पर अपनापन महकता ।
बेहतर है रुखी–सूखी;
ये अपनी गुज़र को ।।सुनते हैं रहती गाँवों में;
भारत की आत्मा ।
शहरों में क्या है : जादू ?
लगे आग शहर को ।।डंसती है रात बैरन ;
झुलसाए मदन तन–मन ।
कैसे बताऊं साजन ;
मैं ! पीती ज़हर जो ।।हुक्के में डूबा ” बापू ” ;
अलाव बन गया ।
किसको दिखाऊं ” अनुपम”
इस चाक़— जिग़र को ।।
: अनुपम त्रिपाठी
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#anupamtripathi
#anupamtripathiG -
व्यंग्य —- पूंछ पुराण
व्यंग्य ……………………………………
****** पूंछ— पुराण (समग्र)******
कभी देखा है ;आपने , ऐसा कुत्ता !
जो ; देखने में हो छोटा–सा
मगर;पूंछ उसकी लंबी हो
यानि कि ; —— भली–चंगी हो.
जी हाँ !
कई ऐसे कुत्ते हैं : यहाँ
और बहुतायत में हैं : वे पूंछें
जो;जरुरत पड़ने पर,किसी भी कुत्ते के पीछे लग जाती हैं
……………………. अपने — आप को खू—-ब हिलाती हैं .
पूंछ की महिमा निराली है…………
तमंचा है : कुत्ता — तो ; पूंछ : दुनाली है.
पूंछ : आजकल शान का प्रतीक है……
सोचिये जरा! पूंछविहीन कुत्ता भी कितना खाली-खाली है ?
कुत्ता नामक ” संज्ञा ” पर ;
पूंछ : “विशेषण ” की तरह नज़र आती है
……..हिलते रहने की प्रक्रिया दोहराती है.
यहाँ ” कुत्ता ” ; पशु नहीं ——— प्रतीक है
लोकतांत्रिक व्यवस्था है ———— ठीक है
………. और ; पूंछें तो विशुद्ध व्यक्तिवादी हैं
“वे” ; अभिशप्त हैं ————- हिलने को
स्वाभाविक तौर पर ; इसकी आदी हैं .
फिर भी ; पूंछ की परख कम नहीं होती
……….. कुत्ते के पास है ही “वह इकलौती”
कुत्ता : उसे शान से लटकाये घूमता है
सदैव ……”दूसरों की उठाकर सूंघता है” .
हिलती हुई पूंछ ; कुत्ते को आल्हादित् करती है….
——कुत्ता मिमियाये तो पूंछ दुबक जाती है——-
गुर्राते हुए कुत्ते की ; पूंछ भी क्या खूब फ़बती है !
पूंछ का टेढापन ; कुत्ते के अहम् को संतुष्ट करता है
पूंछ उठाकर ही तो;कुत्ता : विजेता की तरह लगता है.
पूंछ का भूगोल ही ; कुत्ते की नागरिकता तय करता है
: इसी पूंछ से ही तो उसका इतिहास उभरता है.
टेढापन : पूंछ का स्थायी ——— भाव है
दबाव में दुबक जाना जन्मजात् स्वभाव है
कुत्ते : स्वभाव से शान्त् होते हैं
आक्रामक होती हैं ——- : पूंछें
जो अनचाहे हिलती हैं — आपस में मिलती हैं
और घेर लेती हैं ——————- कुत्ते को.
कुत्ता : मुस्कुराता है … खिलखिलाती हैं : पूंछें
कुत्ता : गुर्राता है ……. सहम जाती हैं : पूंछें
कुत्ता : बैचेन है………. बिलखने लगती हैं
पीछे मुड़कर–टांगों में घुसकर ; सहलाने लगती हैं
: कुत्ते को ही हिलाने लगती हैं .
कुत्ता : पूंछों के बीच घिरा खुद को
सुरक्षित् महसूस करता है
पूंछें : कुत्ते के आगे रास्ता और
पीछे “माल” साफ़ करती हैं
—— दोनों का मिलाप दर्शनीय होता है —–
—— औरों के लिये अ-सहनीय होता है —–
यह स्थापित् सत्य है कि ; ————–
सीधे कुत्ते की पूंछ टेढी ही होती है……
कुत्ते का टेढापन ; पूंछ पहिले ही भांप लेती है
खतरा महसूसते ही–सुरक्षित दूरी नाप लेती है
कुत्ते और पूंछ का संबंध सनातन है……….
पूंछ का “आधुनिक नाम ” —– चमचा है
कुत्ता तो सदाबहार बर्तन है………..
कुत्ते को चार लातें मारिये …… पुचकारिए
मान जायेगा ……………..
पूंछ मरोड़ कर देखिए — तुरन्त काट खायेगा .
कुत्ते के बिना पूंछ का अस्तित्व कल्पनातीत है
पूंछविहीन कुत्ता— आजाद भारत का अतीत है
कुत्ता और पूंछ ——— इस दौर की पहचान हैं
पूंछ में ही तो ज़नाब ! कुत्ते की असली जान है.
तो ; हे,मानव !
तू भी कुत्ते की कद्र करना सीख
कुछ भी दबा — कुछ भी ऊलीच
पर;शान्त् खडे कुत्ते की पूंछ कभी मत खींच
——————–पूंछ कभी भी मत खींच.
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#anupamtripathi
#anupamtripathik
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मुक्तक
ख़्वाबे-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर
इन आँसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर
जब से चला हूँ मैं कहीं ठहरा न एक पल
राहें भी रो पड़ीं मेरी तलाश देखकर©® लोकेश नदीश
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लफ़्जो का खेल
सब लफ़्जो का खेल है इस दुनिया में
ये ही रिश्ते बनाते भी है बिगाड़ते भी यही है -
“जुदा” #2Liner-61…….
ღღ__इसमें कोई शक नहीं, कि तुम सबसे जुदा थे “साहब”;.मगर ऐसा भी क्या जुदा होना, कि हमसे ही जुदा रहो!!…..#अक्स.
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वक्त गुजरता है मगर खामोशी नहीं जाती
वक्त गुजरता है मगर खामोशी नहीं जाती!
तेरी #चाहतों की मदहोशी नहीं जाती!
किसतरह अब रोकूँ मैं यादों का सिलसिला?
धड़कनों से तेरी सरगोशी नहीं जाती!Composed By #महादेव
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मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से
मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से
फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से
आँगन तेरी आँखों का, न हो जाये कहीं तर
डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से
साहिल पे कुछ भी न था तेरी याद के सिवा
दरिया भी थम चुका था अश्क़ का उफ़ान से
नज़रों से मेरी नज़रें मिलाता है हर घड़ी
इकरार-ए-इश्क़ पर नहीं करता ज़ुबान से
कटती है ज़िन्दगी नदीश की कुछ इस तरह
हर लम्हाँ गुज़रता है नये इम्तिहान से
©® लोकेश नदीश
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कोई बद्दुआ करे!!#2Liner-60……
ღღ__तू गर नाराज़ है मुझसे, तो रह, खुदा करे;.मैं भी चाहता हूँ मेरे हक़ में, कोई बद्दुआ करे!!……#अक्स. -
जिसको प्यार सिखाया मैने
जिसको प्यार सिखाया मैने !
राह सही दिखलाया मैने !!
आज वही है जान का दुश्मन !
अपना जिसे बनाया मैने !! -
जी रहा हूँ मैं तेरी यादों को लेकर
जी रहा हूँ मैं तेरी यादों को लेकर!
दर्द़ बन गया हूँ मैं मुरादों को लेकर!
खोजता हूँ हरतरफ़ मंजिलों को अपनी,
हालात के भँवर में इरादों को लेकर!Composed By #महादेव
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” भूख ” (Poetry on Picture Contest)….
गरीबी ख़ुद के सिवा, औरों पे असरदार नहीं होती;
शायद इसीलिए भूखों की, कोई सरकार नहीं होती !!
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महज़ दो वक़्त की रोटी, और चन्द पैरहन तन पे;
फक़ीरों को इससे ज्यादा की, दरकार नहीं होती !!
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रोटियां फेंकने से बेहतर है, किसी गरीब को दे-दो;
किसी के खा लेने से, रोटी कभी बेकार नहीं होती !!
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भूख का दर्द “साहब”, हर एक दर्द से बढ़कर है;
गर ये दर्द ना हो तो, शायद कोई तकरार ना होती !!…..#अक्स
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जब बन जाता है हमारा याराना
इक वक्त, इक रब्त जुड़ा था, [रब्त = Relation]
वक्त गुजर गया, रब्त रह गया
कुछ लम्हो की दास्ता बनकर ये याराना
पक्के अल्फ़ाजों में ज़हन में छप गया
कुछ पल अजीज है बहुत,
कुछ लोग अजीज है
दूर हो कितने भी
अरसा गुजर जाने के बाद भी
करीब लगते है, अपने लगते है
जिंदगी इनके होने से ही
अपनी लगती है,
मुकम्मल लगती है, जिंदगी की दास्ता [मुकम्मल = Complete]
जब रब्त जुड़ता है
जब बन जाता है हमारा याराना
Happy B’day Bhaiji 🙂
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भूखी दास्तां (Poetry on Picture Contest)
वो आंखे आज तक चुभती है मुझको
एक दम खाली,
खाली कटोरे सी
जो पूछ रही हों,
कह रही हो अपनी भूखी दास्तां
लफ़्ज ही बेबस है,
नहीं समेट सकते दर्द को उनके
खाली है वो भी
उनके खाली पेट की तरह! -
“शौक-ए-दीदार” #2Liner-59……
ღღ__इबादतगाह भी जाऊं तो, तुझे ही ढूँढती हैं नज़रें;.शौक-ए-दीदार ने तेरे, मुझे काफ़िर बना दिया !!…..#अक्स.
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सुनो, मैंने भी एक दौर देखा हैं..
सुनो, मैंने भी एक दौर देखा हैं..
पिछले कुछ समय में मैंने एक दौर देखा हैं,
मैंने अन्ना का आंदोलन देखा हैं,
मैंने निर्भया की माँ देखी हैं,
मैंने रोहित वेमुला की लाश देखी हैं,
दिल्ली की गद्दी को बदलते देखा हैं,
जिनकी गोली नहीं, बल्कि कलम से डर था, उनकी मौत देखी हैं,
कभी जो डरकर जात छुपाते थे,
उनको खुलकर खुद को चमार कहते देखा, ,
जो खुद के रेप की रिपोर्ट लिखाने पुलिस स्टेशन तक नहीं जा सकी,
आज उसको दूसरों के हक़ के लिए लड़ता देखा हैं ,
थोड़े से समय में मैंने एक दौर देखा हैं.सुनो, मैंने भी एक दौर देखा हैं……
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नहीं हो जब कोई अंजाम
नहीं हो जब कोई अंजाम,
अगर आगाज़ का
बस इक राह हो,
न कोई मंजिल हो
दिल में बस मोहब्बत हो,
दिल मिलने को मुन्तजिर हो -
“खत” #2Liner-58…..
ღღ__आखिर इसमें उनकी, खता भी क्या है साहब;.जब मोम सा दिल रखोगे, तो दुनिया जलाएगी !!……#अक्स.
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पथरों के शहर
पथरों के शहर
बस्ती है यह पथरों की
शहर जिसे कहते लोग
बस्ती यह ऊँची मंजिलों की
जहां छोटे दिल के बस्ते लोग
बस्ती है यह मकानों की
यहां घर नहीं मिला करते
बस्ती यह उन महफलों की
जिनमें ठहाके नहीं लगा करते
यह सफेद खून की बस्ती है
रिश्तो के रंग नही मिला करते
यहां प्यार मोहब्बत पैसा है
ईमान नही मिला करते
यहां चमक हर शै की आला है
असल में सब काला है
यहां सूरत पे मत मिट जाना
सीरत सबकी मैली है
मोल चुका सकते हो तो
हर मुस्कान तुम्हारी है
इस बस्ती की फिज़ाओ में
वफा बिलकुल बेमानी है
भागम भाग में यह दुनीया
यूई किस चीज की जल्दी है ?
कहते है बसते जिंदा लोग यहां
मुझे दिखती ज़िन्दा लाशे है
….. यूई
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kisi ne na dekha
Wo khwabon me rha,hakikat ko na dekha..
hwao me udne walon me,jameen ko na dekha..
dur se haste hue dikha jo shaks,uske chupe dard ko kisi ne na dekha..
byan krne wale ki ankhon me b aagye anshu, kalam ne dhadkan ki kampan ko na dekha…
shahi mukut sbko dikh rha h mere sir pr, meri mehnat ka jmana kisi ne na dekha…
“mere chahne wale jane kis mulk me ja bass gye h,
meri dosti ka smaan gujra
wo kisi ne na dekha”
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dard kam kyu nhi ho jata
aansu bhane se hi dard kam kyu nhi ho jata,
sochne bhar se hi koi hamdard kyu nhi ban jata,
kuch kehne bhar ki hi tamanna rhi h dil me,
sb kuch ankho se byan h,wo smj kyu nhi jata
gustak dil ko..koi or dilbhar kyu nhi bhata,
khyalon me milan,hakikat me judai…
sb kuch iske viprit kyu nhi ho jata,
umeedo k shaaare katt rhi h zindgi…
na umeedi ka damaan chuut kyu nhi jata,
har wakt tumhare hi samne jhukh jata h dil,
“EGO” ka mkaan tumhare sehar me kyu nhi ban pata…
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स्वर्ण – चित्
स्वर्ण – चित्
एक तरंग , एक सुर , एक ल्य
है अब , सोच वचन और कर्म में मेरे
एक ल्य , एक सुर , एक तरंग
है अब , कर्म वचन और सोच में मेरे
इस तरंग सी ही है , वोह तरंग
इन सुरों से है मिलते , वोह सुर
इस ल्य से है जुड़ी , वोह ल्य
है जो बाहर का गीत, वोही अन्दर का संगीत ,
है जो बाहर का संगीत, वोही अन्दर का गीत
रोशन हुआ अंतर्मन जो तुझमें, मंज़िलें अपनी ख़ुद की छूटी ,
ल्य–म्य हो यूई रमा यूँ तुझमें, भव्सागर की चाह भी छूटी
…… यूई
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“तौबा साहब, तौबा” #2Liner-56…
ღღ__वो इक पल जिसमें तुम्हारे लब हों, मेरे लबों के पास;.उस वक़्त भी हम रहें शरीफ?? “तौबा साहब, तौबा” !!…..#अक्स.
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कभी कभी, तुम राहें भूल कर…! (गीत )
कभी कभी, तुम राहें भूल कर……! (गीत )
कभी कभी, तुम राहें भूल कर,
मेरी गलियों मे आया करो….
कभी कभी तुम ख़ुद को भूल कर,
ज़रा नजरें मिलाया करो…………!ख़ुद में इतने खोये हो,
न तुझको कुछ ख़बर,
काम के सिवा,
न तुझको आता कुछ नज़र,
कभी कभी, सारे काम भूल कर,
ज़रा दुनिया को देखा करो…..
कभी कभी, बेवजह ही सही,
दुनिया को निहारा करो……
कभी कभी, तुम राहें भूल कर,
मेरी गलियों मे आया करो……..!दिन ये जिंदगी के,
यूं ही बीत जायेंगे,
बीत जो गये,
कभी वो फिर न आयेंगे,
कभी कभी, तनहाइयों मे तुम,
ज़रा इसकी भी सोचा करो…..
कभी कभी, तनहाइयों मे तुम,
ज़रा मेरी भी सोचा करो….
कभी कभी, तुम राहें भूल कर,
मेरी गलियों मे आया करो….!जिंदगी का अर्थ, प्यार,
और कुछ नहीं…
दिल किसी को देना ही,
इसीलिए सही…
कभी कभी, सारे बन्ध तोड़ कर,
मेरी बाँहों मे आया करो,
कभी कभी, तुम सब को भूल कर,
मेरी बाँहों मे आया करो….
कभी कभी, तुम राहें भूल कर,
मेरी गलियों मे आया करो……!कभी कभी….!
” विश्व नन्द “
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चाहतों की दुनिया से अब उकता गये है
चाहतों की दुनिया से अब उकता गये है
सब दिखता है यहां, मगर कुछ मिलता नहीं -
“तुमसे गले मिले हुए” #2Liner-56
ღღ__यूँ तो अरसा हुआ है साहब, तुमसे गले मिले हुए;.पर जिस्म मेरा आज भी, इत्र-सा महकता है !!……#अक्स.
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घर और खँडहर
घर और खँडहर
ईटों और रिश्तों
मैँ गुंध कर
मकान पथरों का
हो जाता घर
ज्यों बालू , सीमेंट और पानी
जोड़ें ईट से ईट
त्यों भरोसा, जज़्बात और प्यार
जोड़ें रिश्तों में मीत
चूल्हे में भखती ईटें
माँ की याद दिलाती है
जो ख़ुद के तन पे आग जला
सबकी भूख मिटाती है
नींव में दफन ईटें
दादा-दादी की याद दिलाती है
ख़ुद पे सारा बोझ लदा
घर की मंजिलों को बनाती हैं
छत में लगी यह ईटें
बाप की याद दिलाती हैं
ख़ुद पे सारी गर्मी खा
घर को ठंडा रखती हैं
दीवारों में चिनी यह ईटें
भाभी की याद दिलाती हैं
जो नींव को छत से जोड़
घर की इज़्ज़त बचाती है
आँगन में बिछी यह ईटें
भाई-बहनो की याद दिलाती हैं
कदमों के थपेड़ों को सह्ती
गिरने पे चोट नहीँ लगाती है
खिड़कियों को सम्भालती यह ईटें
गुरूओं की याद दिलाती हैं
रोशनी की किरणें अन्दर ला
अंधेरों को दूर् भगाती हैं
सीड़ीयों में लगी यह ईटें
यारों की याद दिलाती हैं
एक एक कदम साथ निभाते
ऊँचाइयों पे ले जाते हैं
खँडहर बने हर घर को देख्
यूई को खयाल यहि आता है
यहाँ रिशते चरमराए होंगे
याँ भरोसे डगमगाए होंगे
नींव बोझ सह ना पाई होगी
याँ गर्मी में छत पिघलायी होगी
दीवारें कमजोर बन आयी होंगी
याँ खिड़कियाँ बंद रह गई होंगी
कुछ ईटों कुछ रिश्तों
के चरमराते ही
हर बसा बसाया घर
खँडहर हो जाता है
………. यूई
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तेरा मेरा रिश्ता
तेरा मेरा रिश्ता
यूई की आंखों से
बहते आँसुओं को
रूह की नजर से देख
यह आँखें मेरी हैं
पर आँसू तेरे हैं
इन आंसुओं में जो बहता है
वोह पानी मेरा है
पर धारा तेरी है
यह धारा जिस दिल से निकली
वोह दिल मेरा है
पर उसकी धड़कन तेरी है
यह धड़कन
जिस जिस्म में धड़कती
वोह जिस्म मेरा है
पर उसकी रूह तेरी है
यह रूह जिस खुदा से निकली
वोह खुदा मेरा है
और वोही खुदा तो तेरा है
यही रिश्ता है
तेरा मेरा
जो तेरा है वोह मेरा है
जो मेरा है वोह तेरा है
…… यूई
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MAANAVTAA KI SAHI KAHAANI HOGI
Chhtpataa rahi insaaniyat
haivaaniyat ke quaid mei-
sisak…rahaa bhaaichaaraa
bddniyatee ke aeib mei.khoon ki qeemat nhi…(?)
wo to, bss dikhne mei laal hai
hrr koi ek-duze ko jhhpattne ki
saazisho mei hi bss behaal haitohfaa biawasghaat ka —
bddniyatee ki bazaar se lete
prem viheen maahaul,mei dekho
hrr koi sirf laachaar se hai dikhtehrrpnaa–hrrppnaa–aurr hrrppnaa
maano,hrrpp lenaa hi jeet ho
maansiktaa mei pariwartann aisa..??
maano,milnaa julnaa haar-jeet homaanavtaa chhut rahaa hai
aupchaariktaa loot rahaa hai–
rishto ke bandhan ke ehaaas ko
phirr bhi,n jaane kyu- adharr chup hai
aurr,dil tarrapp rahaa—- aabhas ko“samajh” jise log bhulaa rahe ,
“apnaapann” jise logg bhool rahe
“nijtaa” ki seemitataa ko tyaagkrr–
apnepann ki samajh banaani hogi..
tabhi maanavtaa ki sahi kahani hogi…I -
“याद” #2Liner-55
लो आ ही गयी साहब, उनकी याद, आज फिर आखिर;
.
और वो आज फिर नहीं आये, इतने इंतज़ार के बाद !!…..#अक्स -
कागज़ और कलम
जब आसपास की खट पट
खामोशी में बदलती है।
जब तेज़ भागती घडी की सुइंया
धीरे धीरे चलती है।।
दिनभर दिमाग के रास्तों पर
विचारों का जाम होता है।
मन रूपी मेरी तकती पर नजाने
किस किस का नाम होता है।।
जब विचारों का ये जाम
हौले हौले खुल जाता है।
और सर सर करते पंखे का शोर भी
कानो में घुलता जाता है।
तब अचानक कल्पनाओं का
इंद्रधनुष खिल जाता है।।
कागज़ और कलम की बातें
तब सुनने में आती हैं।
कागज़ फड़फड़ाता है
कलम इतराती शर्माती है।।
बोला कागज़ ऐ कलम-
जो थी मेरी मजबूरी
उसे तुम मुक्कदर समझ बेठी।
मैं तुम्हे सुलझाने आया था
तुम मुझसे ही उलझ बैठी।।
तुझसे मिलने को मैं
कितनी ही बार उखड़ा हूँ।
साथ तेरे कविता ,कहानी
अकेला केवल एक टुकड़ा हूँ।।
रहता हूँ पन्नों के बीच
बस इसी इंतज़ार में।
के आकर मेरे पास तू
मेरा जीवन संवार दे।।
जानता हूँ आएगी तू पास मेरे
इसलिए मन में रखता हूँ सबुरी।
तेरे बिन हूँ में अधूरा
मेरे बिन है तू अधूरी।।
कभी वक़्त मिल जाय तो
मुझे भी याद कर लेना।
मेरे इस कोरेपन को तू
अपनी श्याही से भर देना।।
दर्द सहकार भी देख ले
मै चुप ही रहता हूँ।
तू जो लिख देती है मुझ पर
मै बस वो ही कहता हूँ।।
कागज़ के बातें सुनकर
कलम के अश्क छलक आय।
कागज़ ने उन्हें संभाल लिया
ताकि मोती बिखर न जाँय।।
कलम के आंसुओं से कागज़ पर
एक बात उभर आई।
तूने बुलाया था मुझको
देख ले तेरे पास चली आई।।
इस हलकी फुल्की नोक झोंक की
फिर आपस में चर्चा होती है।
और बंज़र पड़े उन दिलों पर फिरसे
प्रेम की वर्षा होती है।।
कलम कागज़ की कहानी को
मै कुछ ऐसे कहता हूँ।
और अगर कागज़ हूँ मै तो हाँ
कलम से दूर रहता हूँ।।
विचार कीजियेगा???
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Retirement का सुकून ……..!
Retirement का सुकून ……..!
अब सुकून आ गया है जिन्दगी मे थोडा,
जब से मैंने औरों संग दौड़ना है छोडा…
जब से मैंने औरों जैसा दौड़ना है छोडा…अब तो वक्त मिल रहा है, कुछ तो ख़ुद के वास्ते,
सोचने, मैं कौन हूँ और कौन से हैं रास्ते…..लग रहा है सब नया, जो दृष्टि कुछ नयी मिली,
पहले जैसी दुनिया भी है, लगती अब नई नई ……भा रहा निसर्ग जैसे स्वर्ग ही यथार्थ ये,
मुक्त मन जो हो गया है, व्यर्थ के स्वगर्व से,
मुक्त मन जो हो गया है, अर्थहीन स्वार्थ से …..वक्त जो गुजर गया है, उसकी न परवाह है,
हाथ मे समय बचा है, पल पल उससे प्यार है ….हूँ अलिप्त मैं मगर, सर्व में जुटा हुआ,
दलदलों में देख कमल, सुंदर सा जी रहा……..अब जो राहें चल रहा हूँ, कुछ तो ख़ुद चुनी हुईं,
हर छलांग पे यहाँ हैं, मंजिलें नयीं नयीं……बाजी ख़ुद से है यहाँ, इंसान पूर्ण बनने की,
दिन-ब-दिन नया नया प्रयोग, ख़ुद ही करने की……है कठिन ये राह फिर भी चलने में सुकून है,
ना किसीसे दोस्ती न दुश्मनी की शर्त है……पास कुछ नहीं जो मेरे, खोने का मैं भय धरूँ,
ज्ञान ये हुआ कि ज्ञान ही बटोरता फिरूं……ये है ऐसी राहें, जिनको भी मेरी तलाश है,
मंजिलें ये ऐसी, जिनको मेरा इंतजार है,
मंजिलें ये ऐसी जो मेरे ही आसपास हैं……अब सुकून आ गया है जिन्दगी मे थोडा,
जब से मैंने औरों संग दौड़ना है छोडा…
जब से मैंने औरों जैसा दौड़ना भी छोडा……“ विश्व नन्द “
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दर्द-ए-गम
दर्द-ए-गम
इस दर्द-ए-गम का, अपना ही मंज़र है,
रात तो आती है, पर नींद नहीं आती
शून्य का एहसास है, पर समझ नहीं आती
जिंदगी तो चलती है, पर जान नहीं होती
एक घुटन सी होती है, पर नज़र नहीं आती
दिल पल-पल रोता है, पर आँख नहीं बह्ती
रूह तक तड़प जाती है, पर आहट नहीं होती
इस दर्द-ए-गम की, कोई दवा नहीं होती
इस नामुराद बीमारी में, दुआ भी काम नहीं आती
यूई को अब हर पल,
मौत का इंतज़ार रह्ता है,
कम्बख़्त वोह भी नहीं आती
…… यूई
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आज नहीं तो कल
आज नहीं तो कल
तैरे नाम की बंदगी मैँ , झुका हुआ मेरा सर
तैरे इशक की इबादत में, बंधे हुए मेरे हाथ
तेरे नूरानी नूर मैँ, रौशन रह्ता मेरा मन
तेरी ख़ुशियों मैँ, नाच्ता गाता मेरा दिल
औरन के दर्द मैँ , बड़ते मेरे कदम
तेरे मन की चाहतों मैँ, रम चुके मेरे कर्म
आज नहीं तो कल,
मेरी दुआओं का, असर हो ही जाएगा
आज नहीं तो कल,
मेरी बन्दगी, तुझे भा ही जाएगी
आज नहीं तो कल,
यूई का अंदाज़-ए-इश्क, तुझे पा ही जाएगा
आज नहीं तो कल,
तेरा मन मुझमें, रम ही जाएगा
आज नहीं तो कल,
मैं तुझमें और तू मुझमें, मिल ही जाएँगे
..…. यूई
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वो खुशनुमा चेहरा
वो खुशनुमा चेहरा कितना नूरदार है आज की रात
जैसे फैल गया हो चांद पिघलकर उनके रूखसारों पर
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Get well soon #Hanumanthappa
I started dreaming when you falling asleep
I worked day and night to make proud of my country
I never afraid about the height of the mountain
Or the deepness of the sea
and fly like a vulture,
swim like a whale,
And now my story become an example for each and everyone
This is my life friend
You do not compare my dream under the scale of your imagination
As i am ready to crack the deepness of the ocean of ice






