दर-दर गिरते हैं

दर-दर गिरते रहते हैं, अक्सर संभलने वाले,
खाते हैं अक्सर घाव, मरहम रखने वाले।

कर लिया था तौबा इश्क़ की गलियों से,
मगर मिले हर तरफ़ मोहब्बत करने वाले।

किसके ख़्वाबों में खोया रहेगा हमारा दिल,
अगर आ गए करीब ख़्वाबों में रहने वाले।

बेकरार हैं वो भी शायद हमारी ही तरह,
ख़ामोश हैं इसलिए अक्सर चहकने वाले।

इक झलक भी नहीं मयस्सर1, गुम हैं कहीं,
हो जाएँगे हाज़िर कभी भी, ये कहने वाले।

हो गया है मयख़ाने2 का हर शख़्स अजनबी,
किससे कहे हाल-ए-दिल इश्क़ करने वाले।

घटती जा रही है गिनती ग़म के मारों की,
रह गए हैं दो-चार कुछ, दर्द सहने वाले।

1. उपलब्ध; 2. मदिरालय।

 

यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना

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