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Bhargav Patel

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Bhargav Patel

@Bhargav Patel • Joined Jan 2017 • Active 9 years ago

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by Bhargav Patel

नौकरी

January 24, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

गुलामी का अर्थ
तो तब समझ आया,
जब नौकरी की कुछ दिन
एक प्राइवेट कंपनी में |
कहते है उसे ‘नौकरी’ क्यों,
यह तो जानता था |
किन्तु वह अस्तित्व में है ‘चाकरी’,
यह तो अब समझ आया |
समझ आया कि
तलवे चाटने से है बहेतर
बेकारी अपनी!
चाहे जेब खाली रह जाए,
कम से कम
सिद्धांत दृढ रहते है |

~Bhargav Patel (अनवरत)

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by Bhargav Patel

जीवनसमुद्र

January 23, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

कट जाते है दिन
पैसो की झनकार सुनने के लिए |
किन्तु रात आते-आते
शुष्क पड़ जाता है वह जीवनरस;
जिसे पीने के लिए
मथते रहते है जीवनसमुद्र |

-Bhargav Patel (अनवरत)

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by Bhargav Patel

गणतंत्र

January 23, 2017 in Poetry on Picture Contest

राजा-शासन गया दूर कही, गणतंत्र का यह देश है |
चलता यहाँ सामंतवाद नहीं, प्रजातंत्र का यह देश है |

दिया गया है प्रारब्ध देश का, प्रजा के कर में;
किन्तु है राजनीति चल रही यहाँ सबके सर में |
तोड़ते है और बाँटने है प्रजा को अपने धर्म से,
विमुख करने देश की प्रजा को निज कर्म से |

यद्यपि है शक्ति आज भी प्रजा के साथ,
यदि मिल जाए समस्त भारतीयों के हाथ;
जोड़ी जा सकती है शक्ति एक मुष्टि में,
बज सकता है डंका अपना भी सृष्टि में |

यदि मिल कर बनाये हम ऐसा गणतंत्र,
जो हो सर्वोच्च-शक्तिमान-श्रेष्ठ प्रजातंत्र |
अंततः यही है हमारा भारत, हमारी मातृभूमि;
कर्तव्य है हमारा इसे बनाना हमारी कर्मभूमि |

-Bhargav Patel (अनवरत)

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by Bhargav Patel

चाय

January 23, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

उषा की रश्मि
जब घोलती है चाय में चुस्ती,
शुरू करते है दिन हम अपना |
लेकिन शाम आते-आते
आन पड़ती है फिर एक चाय की जरुरत;
घोली हो जिसमे
संध्या ने कोई अलौकिकता
हमारे तन में
नये प्राण डालने के लिए |

~ Bhargav Patel (अनवरत)

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by Bhargav Patel

अन्धकार

January 21, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

रात का अन्धकार हूँ मैं
मुझमे रौशनी भरने के आश में
खुद जल कर मिट जाओगी,
लेकिन यह अँधेरा कभी
सूर्य का तेज नहीं देगा |

-Bhargav Patel (अनवरत)

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by Bhargav Patel

खालीपन

January 21, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

शब्द छलकते रहते है
अनवरत
आँखों से |
और मैं
उन्हें श्याही बना कर
भरता रहता हूँ
कोरे कागजो का
खालीपन |

-Bhargav Patel (अनवरत)

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by Bhargav Patel

सब पीछे छूट रहा है

January 20, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

देख रहा हूँ

रात में जगमगाती लाइट्स

इन अंजान रास्तो पर,

ज्यों जीवन धबकता है शहरो के दिल में।

एक तसल्ली रहती है मन में

कि हम जिन्दा है।

लेकिन चलती कार के साथ

वो सब पीछे छूट रहा है।

बिलकुल मेरी जिंदगी की तरह…

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by Bhargav Patel

बाती

January 19, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

मत डाला करो अब और तेल!
यह बाती तो कब की जल कर मिट चुकी है,
उस ज्योत के क्षणभर के उजाले के लिए |

-Bhargav Patel (अनवरत)

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by Bhargav Patel

महक

January 19, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

विक्स के इन्हेलर से ली हुई
एक लंबी श्वास,
ज्यों श्वासनली के बंध दरवाजे खोल देती है!
तुम्हारे पुराने कपड़ो में से आती महक,
दिल के उन बंध कमरो के ताले तोड़ कर,
तुम्हारी यादो को
आँखों से बहा देती है |

-Bhargav Patel (अनवरत)

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by Bhargav Patel

मीठी सुपारी

January 18, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिंदगी भी

मीठी सुपारी के दाने-सी हो गई है |

कुछ देर तक भरपूर मिठाश देती है |

लेकिन हलक से उतरते ही

गला दुखा देती है | 😛 😀

[It’s humorous. Don’t try to feel 🙂 ]

-Bhargav Patel (अनवरत)

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by Bhargav Patel

कूड़े का ढेर

January 17, 2017 in Poetry on Picture Contest

जिसे कहते हो तुम कूड़े का ढेर;
वह कोई कूड़ा नहीं!
वह है तुम्हारी, अपनी चीजो का ‘आज’ |
जिसे खरीदकर
कल तुमने बसाया था घर में;
उन्ही चीजो का है यह ‘आज’ |
जिस जगह
तुम उड़ेल देते हो अपना कल;
उसी कूड़े के ढेर में खोजते है कुछ लोग
अपना आज |

जिन्हें ‘बेकार’ कहकर
फैंक देते हो तुम कचरे में,
उसी अपव्यय में तलाशते है कुछ लोग
अपना बहुमूल्य रजत-कंचन |
उनके थैलो में भरी हुई
बासी, बदबूदार, बेकार चीजे
उनके लिए कोई कूड़ा नहीं;
भरते है वे प्रतिदिन
उन मैले थैलो में अपनी रोटियाँ |

वह भूखा-नंगा बच्चा
जो बैठता है अपनी माँ के आँचल में,
जाड़े की कातिल ठण्ड में ठिठुरता!
जरा देखो!
देखो उसकी उदासीन आँखों में!
कैसे वह एक
फटे हुए कपडे की गर्माहट में
छिप जाना चाहता है!

क्षुधा से पीड़ित
वह बिमार बूढा!
जो उठा रहा है अपने सामर्थ्य से अधिक बोझ
अपने उन जीर्ण कंधो पर!
चाहता है वह कि आज
उसे सोना न पड़े खाली पेट!
कि कही थोड़ा-सा अधिक बोझ
उसे आज की रोटी कमा कर दे दें!

ज़रा देखो दृश्य अम्लान!
जिस अमीरी को तुम
रास्तो पर फैंक देते हो,
बेझिझक,
कूड़ा बना कर;
उस कचरे के ढेर में,
कुछ लोग
अपनी गरीबी मिटाने का उपाय ढूँढते है |
जिसे कहते हो तुम कूड़े का ढेर;
वह कोई कूड़ा नहीं!
वह तुम्हारा, खुद का,
‘आज’ है!

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by Bhargav Patel

सत्य

January 17, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

सत्य!
यों देखो तो
सत्य यहाँ कुछ भी नहीं;
सब छलावा है, मिथ्या है |
जिस साये को मान साथी
हम चलते है यहाँ,
साथ छोड़ देता है वह साया भी
निशा के तम में |
सत्य है केवल इतना
कि इस विवृत्त सृष्टि में
तुम बिलकुल अकेले हो |
साथी आते है
क्षणभर के लिए,
और फिर चले जाते है |
ठहरता कोई नहीं यहाँ
जीवनभर के लिए |

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by Bhargav Patel

ईश्वर

January 17, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

झाँक रहा था मैं एक रोज

ईश्वर की खिड़की के भीतर,

किन्तु दंग रह गया

निज प्रतिबिम्ब देख उस खिड़की में!

अनायास ही कोई

अनहद नाद उठा मस्तिष्क में:

‘देख ले दर्पण यह,

देख ले निज ईश्वर की छवि!’

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