Sulabh Jaiswal

  • रौनक-ए-गुलशन की ख़ातिर अज़ल लिख रहा हूँ
    ख्वाईश इन्किलाब की है मुसलसल लिख रहा हूँ।

    सब कुछ लूट चुका था बस्तियां वीराँ थी
    बेमतलब हुआ क्यूँ फिर दखल लिख रहा हूँ।

    आवाजों के भीड़ में मेरी आवाज़ गुम है
    अल […]

  • हर विभाग आज सुस्त और बेहाल है
    काम कुछ नही सिर्फ़ हड़ताल है ।

    भ्रष्ट्राचार का तिलक सबके भाल है
    भेड़िये ओढे भेड़ की खाल है।

    उपरवाले तो तर मालामाल है
    हमारे खाते में आश्वासनों का जाल है।

    घोटालो […]

  • बचपन में हम उन दिनों
    बहुत ज्यादा शरमाते थे.
    कविता के दो लाइन भी
    खुलकर नही बोल पाते थे.

    दूरदर्शन के आगे बैठ
    जंगल- जिंगल गाते थे.
    पापा घर में आ जाये तब
    डर से उनके घबराते थे.

    स्कूल में हम परीक्षाओं में
    अंक बहुत […]

  • रात आती है तेरी याद लिए आती है
    यादों की रंगीन बरात लिए आती है
    यह मुश्किल है कि तेरी याद ना आये
    कैसे भूलूं वो मुलाक़ात लिए आती है ।

    यादों के भंवर मे किनारा नही मिलता
    आसमा मे दुसरा सितारा नही मिलता
    तनहा दिल है मे […]