ठहरी हुई वो शाम

May 5, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

ठहरी हुई वो शाम ,
हाथों पे स्याही से लिखा
वो नाम

चलती हुई सी वो सड़क
साथ चलना बस यूँ ही
हाथ उनका थाम

मुस्कुराहटों में उनकी
ढूंढना खुशियाँ दबी
देखना कनखी से उनको
और नजरे भर कभी

धीरे धीरे पग बढाना
रास्ता लम्बा चले
आँखों में भरने को उनको
और ज्यादा शब मिले

माँगना कुछ और घंटे
माँगना मंदिर के आगे
लम्बी कर दे शाम

चलती हुई सी वो सड़क
साथ चलना बस यूँ ही
हाथ उनका थाम

परछाइयां

April 28, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

रोकर कोई न जंग जीता है न जीतेगा कभी ,
वक्त है यह वक्त से पहले न बीतेगा कभी l
हाथों में काले से बस कुछ दाग ही रह जायेंगे,
हाथों से परछाइयों को जो घसीटेगा कभी ll

-#विकास_भान्ती

ब्रम्हास्त्र

April 26, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक मित्र ने यही मुझसे ब्रम्हास्त्र की फरमाइश की थी तो जी लीजिये जी पेश है

 

खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए दिल बोला कि फिर वो समां चाहिए
वो बहती हवा वो गुज़रा ज़माना ये चाँद आज फिर से जवां चाहिए
तारे गिने अब ज़माना हुआ कोई छत को फिर से रोशन सा कर दे
वो किस्से वो गप्पें वो चाय के प्याले वो यारों की महफ़िल रवां चाहिए

खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए

कि हो ऐसी बारिश कोई डर न हो जल्दी न हो और फिकर भी न हो
बरगद के आँचल में बैठे हों हम तुम बातों का कोई जिकर भी न हो
न शिकवा शिकन न कोई शिकायत बस आँखों से बातें बयां चाहिए
वो पगड़ी वो थैला वो रिक्शा वो तांगा घर में मुझे वो कुआं चाहिए

खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए

मुझे चाहिए वो पायल की छम छम मुझे उसकी वो ही नज़र चाहिए
मुझे खिलखिलाहट वही चाहिए फिर से वो उसकी फिकर चाहिए
बहुत हो चुकीं ये बुतों की इबादत मुझे मेरा अपना खुदा चाहिए
बहुत मिल चुकीं ये झूठी तसल्ली सच्ची वो एक ही दुआ चाहिए

खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए

‪#‎विकास_भान्ती‬

 

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Ram

April 25, 2016 in Other

रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

काहू सो कहूँ ब्यथा अपनी मैं नित ही पंथ निहारूं |
दनुजन को तुम त्रास दये नाम राम ही पुकारूं |
सांझ घनेरी रात है काली भक्तन को उद्धारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

बड़ देवन के तुम काज संभारे आसिस दिए बड़े |
देव दनुज गन्धर्व दूत सब तेरे द्वार खड़े||
दृष्टि धरो जगत धरा पर भक्तन को निहारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

‪#‎विकास_भान्ती‬

बारिश

November 22, 2015 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक दफा बारिश का आनंद लेने की ठानी,
यही कर दी हमने सबसे बड़ी नादानी |
घर के बाहर ही कीचड का ढेर था ,
और उस ढेर में फंसा मेरा पैर था |
फिर भी मैंने हार ना मानी ,
आगे बढ़ने की दिल में थी ठानी |
शूकर पानी का आनंद ले रहे थे ,
जाने कैसे विचार मेरे मन में बह रहे थे |
आगे बढ़ा तो कार वाले ने नहला दिया ,
मेरे कपड़ो पर कीचड ही कीचड फैला दिया |
यह सब तो मेरे लिए आम था ,
क्योंकि मैं एक आम इंसान था |
सड़क पर ही तालाब की अनुभूति थी ,
पर मेरी ख़ुशी भी उतनी ही झूठी थी |
तभी पब्लिक चिल्लाई अबे ये कहाँ गया ,
मैं एक पल में खुले मैनहोल में समा गया |
व्यवस्था परखने की ललक मौत बन के आई थी ,
पर हमारे व्यवस्थापकों की रूह भी न लजाई थी |
खुद के बंगले के आगे की सड़क तो पक्की करा ली ,
और यह कह दिखा के उन्होंने शहर की तरक्की करा ली |

4 Liner#4

November 15, 2015 in हिन्दी-उर्दू कविता

क्यों नहीं कहता जो फ़साना है तेरा ये कैसा बेमान अफसाना है तेरा
क्यों बना बैठा है वो बुत जो पूजा जाये ये किसकी परस्ती है की वो छा जाये
क्यों नहीं तोड़ता तू ये तमाम बेड़ियांक्यों नहीं छोड़ता तू ये तमाम देहरियां
तेरी बेईमानी तेरा इमान क्यों है ऐ दिल, तू इतना बेजुबान क्यों है

4 liner#3

November 14, 2015 in हिन्दी-उर्दू कविता

कर के दरकिनार फासलों को तू बढ़ता जा

तू चढ़ता जा सीढियां वो तमाम

जो हर पल गोल घूम जातीं हैं सताती हैं पर

बताती हैं कि बढ़ना ही जिंदगी है चढ़ना ही जिंदगी है

4 Liner#2

November 13, 2015 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम साज़ बनो हम गीत बनेंगे ,
तुम प्रिय बनो हम प्रीत बनेंगे |
चल दो कुछ पग मेरे पथ पर
तुम दौड़ बनो हम जीत बनेंगे |

फिर से राम

November 13, 2015 in हिन्दी-उर्दू कविता

रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

काहू सो कहूँ ब्यथा अपनी मैं नित ही पंथ निहारूं |
दनुजन को तुम त्रास दये नाम राम ही पुकारूं |
सांझ घनेरी रात है काली भक्तन को उद्धारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

बड़ देवन के तुम काज संभारे आसिस दिए बड़े |
देव दनुज गन्धर्व दूत सब तेरे द्वार खड़े||
दृष्टि धरो जगत धरा पर भक्तन को निहारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

‪#‎विकास_भान्ती‬

अनकही सी एक बात

November 12, 2015 in हिन्दी-उर्दू कविता

बिन माँ और पिता का एक बच्चा इसके सिवा सोचेगा भी तो क्या,

कोई बेचे तो मैं हँसी खरीद लूँ
खरीद लूँ वो गुड्डे गुड़िया
जिनकी बंद आँखे भी हँसी देती है
और खरीद लूँ वो खिलौने
जिसमें लाखों कि खुशी रहती है
खरीदना है मुझे आँचल वो माँ का
जिसके पहलू में कभी धूप नही लगती
कहाँ पाऊँ मैं जिगर बाप का
जिसके साये में कभी भूख न बिलखती
ऐसी कश्ती से मेरा सामना हर बार हो गया है
कितनी तेजी से ये शहर भी बाज़ार हो गया है

4 Liner#1

November 12, 2015 in हिन्दी-उर्दू कविता

मिलती गर इज़ाज़त, थोड़ी सी मोहलत मांग लेता |
पिंजरे की दाल छोड़कर, आसमानों की भांग लेता ||
चल पड़ता जहाँ बढ़ते कदम, मुड़ता बस नज़र की ओर |
उतार देता थैला काँधे से , नौकरी खूंटी पर टांग देता ||

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