Nari Shakti

आज का यह समाज, चक्रव्यू है पुराने गले सढ़े रिवाजों का,
लड़ अभिमन्यु की तरह, अपनी सोच का समाज पे प्रहार कर,

सुन ली सब की आज तक, ना रहा वक्त अब लिहजो का,
खौफ से निकल, खुद से लड़ के खुद पर ऐतबार कर,

क्यूं तुझे है डर घूरती निग़ाहों का और लोगो के अल्फजो का,
सेहने की होती है हद्द कोई, अनसुना कर उन्हें जो कहते है सब्र कर,

किससे फरियाद करेगी, जब डर है अपने घर के बंद दरवाजों का,
अब ना रिश्तों का लिहाज कर, बचना है तुझे तो खुल के वार कर,

क्यूं चुप करवाते है लोग तुझे, क्यूं डर है इनको तेरी परवाजो का,
हार मान के जीना है या लड़ के मरना है, अब तू यह विचार कर,

जब तक खुद के लिए ना लड़ेगी तू, ना आयेगा दौर नए आगाजो का,
लक्ष्मी है घर की तू, पर दुर्गा भी है तू ही है यह स्वीकार कर,

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7 Comments

  1. राम नरेशपुरवाला - September 20, 2019, 8:38 pm

    वाह

  2. NIMISHA SINGHAL - September 20, 2019, 9:32 pm

    ,👏👏

  3. Poonam singh - September 21, 2019, 11:15 am

    Nice

  4. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 21, 2019, 3:03 pm

    वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति

  5. Deovrat Sharma - September 21, 2019, 7:16 pm

    Beautiful poetry

  6. Rakeah Kumar - September 21, 2019, 10:55 pm

    सभी साथी कवियों का धन्यवाद और आभार मेरी कविता को पड़ने और पसंद करने के लिए

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