वह राणा अपना कहाँ गया ,
जो रण में हुंकारें भरता था।
वह महा प्रतापी कहाँ गया,
जिससे काल युद्ध में डरता था ।
जिसके चेतक को देख – देख ,
मृगराज दंडवत करता था।
वह वीर प्रतापी कहाँ गया ,
जिसके भाले को देख देख ,
खड्ग निज तेज खण्डवत करता था।
वह विकराल वज्र मय कहाँ गया ,
जिससे अकबर समरांगण में डरता था।
Rana prtap

Comments
12 responses to “Rana prtap”
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Very nice
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Thanks
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वाह, वीर रस से भारी है कविता
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Thanks
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वाह बहुत सुंदर रचना
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Thanks
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सुंदर रचना
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बहुत सुन्दर
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Nice
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Thanks
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Thanks all my friends
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Nice
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