Tag: मुक्तक

  • मुक्तक

    ये आँखे मेरी निर्झर जैसे झर जाती तो अच्छा होता
    जिग्यासा दर्शन की मन में मर जाती तो अच्छा होता |
    तुम पथिक मेरे पथ के ही नही तुम दूजे पथगामी हो
    मेरे पागल मन से यह प्रीत उतर जाती तो अच्छा होता ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक-पुष्प की अभिलाषा

    पुष्प की अभिलाषा -(एक मुक्तक)
    ……………………………………………..
    टूट कर शाख से शायद बिखर गया होगा
    कुचल कर और ओ गुल निखर गया होगा |
    जिसके जज्बे में वतन पे शहीद था होना
    मुल्क के वास्ते मर कर ओ तर गया होगा ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    रूह उठती है काँप जमाने की तस्वीर देख कर
    खुशनसीब और बदनसीब की तकदीर देख कर |
    कोई हाजमे को परेशां है कोई रोटी की खातिर
    बहुत हैरत में हूँ हथेलियों की लकीर देख कर ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक-मनहरण घनाक्षरी

    अनुभव कंटक-जालों का बस उसी पथिक को होता है
    जिसका चरण अग्निपथ चलकर कभी जला होता है |
    मखमल और कंचन पर सोने वालों पता तुम्हें क्या है
    जीवन सच में आतप अंधड़ में जीने वालों का होता है ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    मुक्तक

    बिस्तर से उठ चुके हैं मगर अब भी सोये है
    न जाने कैसे ख़्वाब में मतिहीन खोये है |
    गैरत ईमान का खतना बदस्तूर है जारी
    आँखों ने कर दिया बयां छुप छुप के रोये है ||
    फिर भी लगे है दाग के दामन से धोये है
    सब कुछ लगा है दाव पर सपने संजोये है |
    उम्मीद फिर लगी उसी साहिल से आज भी
    जिसने कि बार हां मेरी कश्ती डूबोये है ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक-घनाक्षरी

    कुछ अंध बधिर उन्मूलन किया करते है
    अथवा पंगु गिरि शिखर चढा करते है |
    कुछ सीमित आय बंधन में बांध हवा को
    क्षैतिज उदीप्त किरिचों पर चाम मढते हैं ||
    लेकिन कौन जो रोक सका शशि रवि को
    लेखक विचारक और भला किस कवि को !
    यह अनमोल धरोहर है स्वच्छंद धरा की
    मति मूढ सहज सीमा इनकी तय करते है ||
    ललचाते नयन लिये पैसों पर बिक जाते है
    जो शिक्षा बेच मदिरालय में मदिरा पी जाते है |
    जिनकी बुद्धि छोटी जीवन का मूल न जाने
    चाटुकार को महामहिम का आसन दे जाते है ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    मुक्तक

    “अशिक्षा पर एक छोटा सा व्यंग मुक्तक ”

    हिन्दी लिखते शर्म आती है अंग्रेजी में लोला राम
    चुप है जब तक छुपा हुआ है खुला मुंह बकलोला राम
    अकल बडी या भैस समझ पाया ना काला अक्षर क्या
    तुतली भाषा जान गये सब बोल पडे बडबोला राम
    अंधो में काना राजा बन चले पहन यह चोला राम
    देख प्रतीत होता कि पडा है सीर मुडाते ओला राम !
    शिक्षा का आडंबर रचकर करते फिरते बंडोला राम
    अधजल गगरी हाल बना खाते फिरते हिचकोला राम
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    मुक्तक

    उष्णत्तर उरदाह की अनुभूति क्या तुम कर सकोगे
    कृत्य नीज संज्ञान कर अभिशप्तता मे तर सकोगे !
    एक एक प्रकृति की विमुखता पर पांव धर कर
    जी लिये अपने लिये तो दुसरों पर मर सकोगे !!
    पतवार बिन मजधार में टूटी फुटी नैया फंसी जो
    क्या करूं प्रत्यय कि उससे पार तुम उतर सकोगे |
    बस तनिक स्पर्श बोधित कामना जाग्रत भई जो
    सुमन निशि कंटक सघन में क्या कभी निखर सकोगे!!
    … उपाध्याय…

  • गजल

    गजल

    ……………..गजल…………….
    चल नही सकते तो टहल कर देखो
    तुम अपनी सोच बदल कर देखो !
    दर्द के फूल किस तरह निखर जाते है
    आ मेरे बज्म किसी दिन गजल पर देखो ||

    ओ बुरा मान न जाये कही मोहब्बत में
    तुम जरा महफिलों में उनको संभल कर देखो |
    गम किसे है नही कि तुम ही मरे जाते हो
    बात बनती है जरा दिल से पहल कर देखो ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    मुक्तक

    नही नव्य कुछ पास में मेरे सपने सभी पुराने है
    आधे और अधूरे है पर अपने सभी पुराने है |
    कुछ विस्मृत हो गये बचे कुछ यादों के गलियारों में
    आज भी मतिहीन की आँखों में गुजरे वही जमाने है
    मन में उठती टीसों को मैं गीत बना कर गा लेता
    मेरी गीतों की माला में बिखरे हुए तराने है |
    सच ये है कि हर मोती को टूट टूट गिर जाना है
    लिये दिये जो यहीं पे उसके सारे कर्ज चुकाने है ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    नही नव्य कुछ पास में मेरे सपने सभी पुराने है
    आधे और अधूरे है पर अपने सभी पुराने है |
    कुछ विस्मृत हो गये बचे कुछ यादों के गलियारों में
    आज भी मतिहीन की आँखों में गुजरे वही जमाने है
    मन में उठती टीसों को मैं गीत बना कर गा लेता
    मेरी गीतों की माला में बिखरे हुए तराने है |
    सच ये है कि हर मोती को टूट टूट गिर जाना है
    लिये दिये जो यहीं पे उसके सारे कर्ज चुकाने है ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    चुप रहते है तो अंजान समझ लेते है
    बोल देते है तो नादान समझ लेते है |
    बात न माने तो कहते है मानता ही नही
    मान लेते है तो फरमान समझ लेते है ||
    अगर हम तोड दें छोटे से काँच के टुकडे
    नासाज हो उसे आसमान समझ लेते है |
    पकड लेते है जब कंधा कभी समझाने को
    ओ इत्तेफाक से गिरेबान समझ लेते है ||
    उपाध्याय…

  • गीतिका-मुक्तक

    …………गीतिका………..

    श्रृंगार उत्पति वही होती जब खिली फूल की डाली हो
    कुछ हास्य विनोद तभी भाता हंसता बगिया का माली हो |
    कलरव करते विहगों की जब ध्वनि प्रात:कान में आती है
    बरसाती मधुरसकंण कोयल जब बागों में हरियाली हो
    कृषकों के कंधो पर हल और होठों पर जब मुस्कान खिले
    क्लांतमयी ग्लांनिण चित्त को होता सुख जब खुशिहाली हो |
    कान्हा की बंशी की धून लगती मन को जब मतवाली हो
    मलयांचल भी शोभित होता जब आरुणिमा की लाली हो ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    सूख गई धरती दाने दाने को पंछी भटक रहा
    झंझावात में बिन पानी सांसे लेने में अटक रहा |
    तिस पर भी प्रतिदिन मानव संवेदन शुन्य हुआ जाता संस्कार प्रकृति नियम अब भी उसके मन खटक रहा
    यह विभत्स दृश्यांक मनुज ने गरल वमन कर लाया है
    अब भी मानव नीज हाथों विष का प्याला गटक रहा
    सदियों से पर्यावरण में व्याप्त उपद्रव के चलते
    खड्ग गले पर जन जन के असुरक्षा की लटक रहा||
    उपाध्याय….

  • मुक्तक

    ” मुक्तक ”

    आँखों से आंशुओं को यूँ जाया नहीं करते।
    हर बात पर बच्चो को रुलाया नहीं करते।।
    खुशिंया नहीं दे सकते ना सही मगर कभी
    जो दिल से चाहे उसको सताया नहीं करते।।
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    ये आँखे मेरी निर्झर जैसे झर जाती तो अच्छा होता
    जिग्यासा दर्शन की मन में मर जाती तो अच्छा होता |
    तुम पथिक मेरे पथ के ही नही तुम दूजे पथगामी हो
    मेरे पागल मन से यह प्रीत उतर जाती तो अच्छा होता ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    “मुक्तक”

    मुझे क्या हो गया है घर में घर अच्छा नही लगता
    कोई बेचारगी में दर बदर अच्छा नही लगता !
    मुझे सब सोहरते हासिल मगर किस काम की है ये
    कि सूरज के बिना मुझको शहर अच्छा नही लगता !!

    सभी अमृत्त के है प्यासे जहर किसको सुहाता है
    हो हर दम खुशनुमा मौसम कहर अच्छा नही लगता !
    जो मर्यादा न समझे दोस्त भी दुश्मन से क्या कम है
    मुझे दुश्मन के धड पर उसका सर अच्छा नही लगता !!
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    सरिता पावन हो गई स्निग्ध खुश्बू सी वन में छाई है
    तु कौन रमणिका जल क्रिडा को चली कहां से आई है!
    सारा उपवन नतमस्तक हो सादर अभिनंदन करता है
    तन मन की तपन बढ गई तुने पानी में आग लगाई है!!
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    “मुक्तक”

    हमने पूछा उनसे क्या दूकानदारी चल रही
    अब नकद है या पहले सी उधारी चल रही !
    क्या नमक देश का कुछ रंग भी है ला रहा
    या कि पहले से भी ज्यादा गद्दारी चल रही !!

    कुछ किराये की रकम को आदमी है ठूसते
    आदमी की आदमी पर बस सवारी चल रही !
    अस्पतालों में चिकित्सक से किया तफ्तीश मैं
    मर्ज भी ठीक हो रहा या कि बीमारी चल रही !!

    पूछ बैठा शिक्षकों से चल रही शिक्षा भी क्या
    बोल बैठे वर्ष भर परीक्षा की तैयारी चल रही !
    भात और सब्जी पकाने में ही दिन गुजर रहा
    कागजी घोडों को दौडाने बेगारी चल रही !!
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    “मुक्तक”
    खुद कभी माना नही जिसको सीखाते है
    थे कभी बहरे जो दुनियां को सुनाते है !
    जिन्दगी जिसकी हुई जाया ही गफलतों में
    ओ भी हमारी चाल पर उंगली उठाते है !!

    पीते हुए बैठे थे कल देखा उन्हे बहुत
    लो है पीना खराब वही सबको बताते है !
    सबसे नकारा देश के घोषित जो हो गये
    क्या बदनसीबी देश को ओ ही चलाते है !!

    लाखों करोडों फूंक कर पहुँचते है पैर तक
    पापी को संत बोल कर क्या क्या चढाते है !
    अभाव में पैसों की एक मासूम खट रहा
    उसकी मदद में भूल कर भी जो न आते है !!
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    ” मुक्तक ”

    आँखों से आंशुओं को यूँ जाया नहीं करते।
    हर बात पर बच्चो को रुलाया नहीं करते।।
    खुशिंया नहीं दे सकते ना सही मगर कभी
    जो दिल से चाहे उसको सताया नहीं करते।।
    उपाध्याय…

  • मुक्तक-मनहरण घनाक्षरी

    आज का विषय-मनहरण घनाक्षरी/कवित्त
    दिनांक-२०/६/१६
    विधा- गीत (गौना/भला) वार्णिक छंद
    मात्राएँ-८ ८ ८ ७ – १६-१५

    धरती पर वृक्ष नित्य अल्प होते जा रहे
    पर्यावरण का कौन रखता खयाल है !
    वन काटने का जुगत करने तैयार देख
    बीच ही बाजार आज घूमता दलाल है !!
    भय से दूर लोग है भुजंग दंग हो रहे
    मानव बना जो श्रेष्ठ धरती का व्याल है !
    विषिधर विकल्प मनुज दनुज समान पर
    मानव के दंश का न कोई मिशाल है !!
    दूई मास में खतम शर्द व बरसात ऋतु
    गर्मी के मौसम बने रहत सालो साल है !
    कहे मतिहीन कौन कौन दे उदाहरण
    रोती सिसकती धरा हालत बेहाल है ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक-मनहरण घनाक्षरी

    मुक्तक छंद – वार्णिक (मनहरण घनाक्षरी)
    सामांत-आई
    पदांत- है
    ८८८७-१६-१५
    पहले जो पढने में गदहे कहलाते थे
    उनकी भी दिखती आज नही परछाई है !
    नवयुग के बच्चे देते एक भी जवाब नही
    पता नही चलता कैसी करते पढाई है !!
    लाज और लिहाज सब दूर हो गये सभी
    बाप के ही सामने में करते ढीठाई है !
    कहत मतिहीन कवि डांट जो पिलाई तो
    बेटी ने भाग घर से नाक कटवाई है ||
    पढते भी कैसे जब शासन प्रशासन ने
    बिना पढै पास करै बीणा उठाई है |
    काम के अभाव में बेरोजगारी बढ गई
    डिग्रीधारी को महंगी हुई पाई पाई है ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक-मनहरण घनाक्षरी

    “मुक्तक छंद पर चार पंक्तियाँ “(घनाक्षरी)
    ११. ११२. २. २ २. २१. २. २२ १२. ११ २
    पुण्य करना है तो माँ बाप की सेवा जरा कर लो
    इनके कदमों में जन्नत है के सर अपना जरा कर दो |
    कि इनकी रहमतों की छांव को खुदा भी तरशता है
    के इनके साथ भी जीवन बशर अपना जरा कर लो ||
    जो बोओगे वही काटोगे तुम इतना समझ लेना
    जरा ठहरों और तय भी हशर अपना जरा कर लो |
    बडी सीद्दत सें नाजों प्यार से पाला तुम्हे जिसने
    कि लमहा जिन्दगी के अपने कुछ इनके नजर कर दो ||
    उपाध्याय…

  • मुक्तक

    निगाहें मिलाकर भी नज़र तुम चुराते हो!

    अदाओं से मेरा जिग़र तुम जलाते हो!

    जिन्द़गी धधक रही है चाहत में तेरी,

    इसकदर ख्यालों में आग़ तुम लगाते हो!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    तेरे सिवा कुछ मुझे नज़र आता नहीं है!

    मेरा सफर यादों का गुजर पाता नहीं है!

    राहें खींच लेती हैं इरादों की इसतरह,

    ख्वाबे-जुत्सजू तेरा मुकर पाता नहीं है!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    तुझे सोचना ही मुझे जूनून देता है!
    तेरे सिवा कुछ भी नहीं सकून देता है!
    रूकी हुयी है तेरे लिए तकदीर मेरी,
    तेरा ख्वाब लफ्जों को मजमून देता है!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    अज़ब बेकरारी हो जाती है हर शाम को!

    हऱ घड़ी जुबाँ पर लेता हूँ तेरे नाम को!

    दर्द की जंजीर से जकड़ जाती है जिन्द़गी,

    खोजता हूँ हरलम्हा मयक़शी के जाम को!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    वक्त के साथ-साथ बदल रहे हो तुम!
    वफा की राह़ में फिसल रहे हो तुम!
    हो गयी है दूरी दिलों के दरमियाँ,
    दर्द की तस्वीरों में ढल रहे हो तुम!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    मेरे हरेक पल का इंतजार हो तुम!
    मेरी ज़िन्दगी का ऐतबार हो तुम!
    मेरी मंजिलें हैं अब तेरी आरजू,
    मेरी धड़कनों में बेशुमाऱ हो तुम!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    खामोश हूँ मगर हर बात समझ लेता हूँ!
    तेरी नजरों की जज्बात समझ लेता हूँ!
    हरवक्त देख लेता हूँ ख्यालों में तुमको,
    तेरी साँसों की मुलाकात समझ लेता हूँ!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    होते ही शाम मेरी तबीयत मचल जाती है!
    तेरी शमा चाहत की ख्याल में जल जाती है!
    मेरे लफ्ज़ कांपते हैं तेरा नाम लेकर,
    तेरी आरजू हर सकून को निगल जाती है!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    मेरी जिन्दगी में कभी ऐसा भी मुकाम हो!
    मेरा नाम तेरे लब पर सुबह और शाम हो!
    रोशनी करीब रहे बस तेरे दीदार की,
    सामने मेरी नजर के ऐसा इंतजाम हो!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    मैं अपने साथ तेरी बात ले आया हूँ!
    जिन्द़गी भर की मुलाकात ले आया हूँ!
    मुझे अब खबर नहीं है शाम और सहर की,
    दिल में हर दर्द़ की सौगात ले आया हूँ!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    आज की रात तन्हा नम सी है!

    जिस्म में जिन्द़गी कुछ कम सी है!

    ख्वाब बेशुमार हैं फिर जागे हुए,

    पलक में चाहत भी शबनम सी है!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    तुम नहीं हो पास तो कुछ भी नहीं है!
    मैं हूँ कहीं मेरी #जिन्दगी कहीं है!
    खोजता हूँ अपने वजूद को मगऱ,
    तुम हो जहाँ मेरी मंजिल़ वहीं है!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    तुम्हें याद करते-करते खामोश सा हो जाता हूँ!
    अपने ही जुदा ख्यालों से मदहोश सा हो जाता हूँ!
    जब भी करीब आता है तेरे ख्वाबों का काफिला,
    अपने आशियाने में खानाबदोश सा हो जाता हूँ!

    #महादेव

  • मुक्तक

    क्यों एक दूसरे से दूर हो गये हम?
    वक्त के सितम से मजबूर हो गये हम!
    टूटी है इसतरह से जिन्दगी मेरी,
    दर्द की महफिल में मशहूर हो गये हम!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    हर शक्स अपने आप में बिमार जैसा है!
    दिल में है दर्द आँखों में खुमार जैसा है!
    जल रहा है दामन हरतरफ उम्मीदों का,
    जिन्द़गी से हर कोई लाचार जैसा है!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    तेरे लिए खुद़ को हम खोते चले गये!
    जिन्दगी को अश्क से भिगोते चले गये!
    धड़कनों में घुल गयी हैं यादें इसतरह,
    मयकशी में दर्द़ को डूबोते चले गये!

    Composed By मिथिलेश राय ( महादेव )

  • मुक्तक

    हुयी है अभी शाम मगर रात हो जाने दो!
    तपते हुए इरादों को दर्द में खो जाने दो!
    जब जागते हैं ख्वाब भी तड़पाते हुए मुझे,
    दो घड़ी के लिए मुझे चैन से सो जाने दो!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    चाहतों की ख्वाहिश फिर से बहक रही है!
    तेरी बेरुखी से मगर उम्र थक रही है!
    मेरा सब्र बिखर रहा है बेकरारी से,
    तेरे लिए जिन्दगी फिर से चहक रही है!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    जब तेरे ख्याल से मुलाकात हो जाती है!

    तूझे याद करते करते रात हो जाती है!

    रूकता नहीं है सिलसिला इरादों का मेरे,

    जब ख्वाबों से रूबरू बात़ हो जाती है!

     

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    जख्म जिन्दा है तेरा याद भी आ जाती है!

    खामोश लम्हों में चाहत तेरी रुलाती है!

    मैं जी रहा हूँ तन्हा गम-ए-हालात से मगर,

    चुभन से ख्वाबों की आँख मेरी भर आती है!

     

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    किसी के वास्ते हम भी कमाल कर लेते हैं!

    अपने हर सकून का बुरा हाल कर लेते हैं!

    खोखले रिवाजों में हम जीते हैं जिन्दगी,

    मगर हम तकदीरों से मलाल कर लेते हैं!

     

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    गम-ए-तकदीर के भी कैसे नजारे हैं!

    खौफ़ की राह पर ख्वाब सब हमारे हैं!

    मंजिलों को खोजती है ज़िन्दगी कोई,

    किसी की ख्वाहिशें ही टूटते सितारे हैं!

    Composed By #महादेव

  • मुक्तक

    मैं जी रहा हूँ तेरी कहानी बनकर!

    दीवानगी की तेरी रवानी बनकर!

    नाखुदा सी बन गयी हैं चाहतें मेरी,

    जख्में-जिगर में तेरी निशानी बनकर!

     

    Composed By #महादेव

New Report

Close