Tag: पर्यावरण पर कविता

  • चिपको आंदोलन 1970

    चिपको आन्दोलन की शुरुआत 1970
    में सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी,
    कल्याण सिंह रावत पर्यावरणविद ने की।
    वन विभाग के अधिकारियों को 2400 से अधिक
    पेड़ काटने के आदेश पर खदेड़ा।
    इसकी शुरुआत तत्कालीन ‘चमोली जिले’ से हुई ।
    फिर धीरे-धीरे पूरे उत्तराखंड में फैल गई
    इस की सबसे बड़ी बात यह थी
    कि इसमें स्त्रियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था
    और अपनी जान जोखिम में डालकर राज्य के वन अधिकारियों को पेड़ कटाई पर विरोध किया।
    और पेड़ों पर अपना परंपरागत अधिकार जताया।
    आज पर्यावरण दिवस पर हम ‘चिपको आंदोलन ‘की
    इस घटना को कैसे भूल सकते हैं?
    पेड़ हमारे लिए वास्तव में हमारे जीवन का आधार है
    जो हमारे जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं को
    पूरा करते हैं।
    और हमें बहुत सी जड़ी बूटियां, लकड़ियां और जरूरत के सामान उपलब्ध कराते हैं।
    हमें इन्हें नहीं काटना चाहिए।
    बल्कि हमें उनके हो रहे अंधाधुंध कटाई को रोकना चाहिए।
    और संकल्प लेना चाहिए कि वृक्षारोपण करेंगे और उनकी
    रक्षा भी करेंगे।

    आप सभी को पर्यावरण दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🙏🙏
    कवयित्री:- प्रज्ञा शुक्ला

  • बृक्ष :पर्यावरण के मूल ३ =

    शुद्ध रहे ये आबोहवा
    सदा जीवन के अनुकूल।
    बृक्ष लगाओ चारों ओर
    सड़क सरित के कूल।।
    हरे पौध बृक्षों से है
    धरती की हरियाली।
    वातावरण भी सुरभित होंगे
    होगी जीवन में खुशहाली।।

  • वायु: पर्यावरण के मूल २

    कर बर्षा आकाश सदा
    पानी सबको देता है।
    बृहत उदर का होकर भी
    आखिर हमसे क्या लेता है?
    एक वायु का प्यासा है ये
    शुद्ध हवा तुम देना जी।
    उन्नत वायु में अपने तुम
    घोल जहर न देना जी।।

  • पानी : पर्यावरण का मूल

    पत्थर भी पानी देता है
    पर पानी में क्या घुलता है?
    धरती पानी लेती है तो
    फिर फिर पानी मिलता है।।
    पानी के प्रति पानी रखो
    ना पत्थर दिल इंसान बनो।
    पर्यावरण का प्रथम तत्व का
    कर संरक्षण उपयोग करो।।

  • भोजपुरी गीत- ई संसार ना मिली |

    विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक बधाई |
    भोजपुरी गीत- ई संसार ना मिली |
    बचावा तनी धरती माई मौका फिर तोहार ना मिली |
    मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |
    केतना सुखवा चाही मिली छहवा कहा राही |
    लगावा पेडवा हम कही ठिकाना ना कही |
    जनवा बचावेके कही जोगाड़ ना मिली |
    मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |
    कबो आवे बाढ़ तूफनवा बरसे बिन मौसम सवनवा |
    कही तरसे पानी परनवा धधके कही अगिया बनवा |
    भिंगावे मनवा अइसन कबों फुहार ना मिली |
    मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |
    कही गरमिया जान सुखावे कही जड़वा हाड़ कंपावे |
    सुख गईले ताल तलैया मर गइली चील चिरईया |
    चूक गईला फिर मौका दुबार ना मिली |
    मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |
    काटी काटी पेड़ के तनवा बन गइले महल भवनवा |
    उखाड़ फुखाड़ पर्वत बनवा लउके सगरो शमशनवा|
    बीजरी बरखा के कबों टंकार ना मिली |
    मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |

    कुपित भईली प्रकृति महारानी ,
    आइल सुनामी लेके प्रलय तूफानी |
    देखा दुनिया के बिगड़ल कहानी |
    धरती बचावा ना करा मनमानी |
    फिर भारती कर जोरी पुकार ना मिली |
    मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • पेड़ पौधे

    पेड़ पौधे लगाओ चारों तरफ फैलाओ हरियाली
    इस तरह करो पर्यावरण की रखवाली

  • प्रकृति और पर्यावरण

    प्रकृति और पर्यावरण

    मानव आज हो रहा है, आज स्वार्थ प्रधान
    प्रकृति और पर्यावरण का, नहीं है किसी को ध्यान
    प्रकृति ही देती है सबको, सुरक्षा और जीवन दान
    उसकी कृपा से ही, चहकता है सारा जहां
    जल, वायु, सूर्य, अग्नि व भूमि है बड़े महान
    जो देते हैं प्रतिदिन, सृष्टि को नया जीवन दान

    बरसात आती है समय पर, भर जाती है भंडार
    अन्न फल-फूल कंद, यह सब दे जाती है उपहार
    नदी, सरोवर व बाग, नव जीवन के है आधार
    जो मानव जाति पर , सदा करते हैं उपकार
    वर्षा के बादल देख , होती है खुशी अपार
    सबको देती तृप्ति , नित वर्षा अपरम्पार

    भारत में ऋतु चक्र से ही, रहती हैं हर आस
    कृषि पर ही निर्भर है, सबका आर्थिक विकास
    जीवन को रोज सजाते हैं, धरती और आकाश
    इससे ही रहा है , सबका उनसे रिश्ता खास
    धरती देती है, सबको सुख-सुविधा और आवास
    इससे जन-जन को है, उस पर अटूट विश्वास

    नदी सरोवर मानव मन, खेत और खलिहान
    प्रकृति से ही मिलता है, सदा मनमाना वरदान
    प्रकृति और पर्यावरण का है, सदियों से एहसान
    प्रकृति की रक्षा करें, इस कर्त्तव्य को लो तुम ठान
    पेड़-पौधे लगाकर फिर से, महकाएं सारा हिंदुस्तान
    “प्रकृति और पर्यावरण” , ही है सच में भगवान।

    रचयिता- प्रकाश कुमार खोवाल (अध्यापक) जिला-सीकर (राजस्थान)

  • कोरोना से डरा ना

    कविता
    कोरोना से डरो ना
    स्वच्छता को अपनाओ, कोरोना को ठेंगा दिखाओ।
    जहाँ से आया हमारे देश में, उसे वहाँ भगाओ।।
    चारो तरफ मचा दिया कोहराम, परेशान हो गए हैं हम।
    महाकाल न रहे हमारे बीच, ऐसा एक माहौल बनाए।।
    समस्त नियम के पालन कर के, हम उस पर हावी हो जाए।
    मिटा सके न हम सब को, ऐसा एक पर्यावरण बनाओ।।
    बहुत सह लिए दर्द, अब दर्द हम से सहा नहीं जाता।
    स्वच्छता के हथियार बना कर, कोरोना पर तोप चलाओ।।
    कहे “प्रधुमन “कोरोना से क्यों डरना, ए देश के नौजवानो ।
    डरना हमने सिखा ही कब था, यही दास्तान उसे सुनाओ।।
    -_— प्रधुमन “अमित “

  • नववर्ष

    उम्मीदों की नई सुबह नववर्ष की।
    सुख – समृद्धि और उत्कर्ष की ।।

    आगे बढ़ते हैं, कड़वे पल भुला कर।
    छोड़ वो यादें, जो चली गई रुला कर।
    मधुर यादों के साथ, आओ नववर्ष का,
    स्वागत करें, उम्मीद का दीप जलाकर।
    बात करें मात्र खुशियां और हर्ष की।
    उम्मीदों की नई सुबह नववर्ष की ।
    सुख – समृद्धि और उत्कर्ष की ।।

    आओ नववर्ष में होते हैं संकल्पित।
    जल की हर बूंद करते हैं संरक्षित।
    स्वच्छ वातावरण बनाने का प्रयास,
    क‌रते‌‌ हैं, पर्यावरण प्रदूषण रहित।
    लालसा किए बगैर निष्कर्ष की।
    उम्मीदों की नई सुबह नववर्ष की।
    सुख – समृद्धि और उत्कर्ष की ।।

    संसार हो दहशत और आतंक मुक्त।
    अमन-चैन, समरस और सौहार्द्र युक्त ।
    कल्पना साकार हो इस नववर्ष ‘देव’,
    परस्पर प्रेम सूत्र में विश्व हो संयुक्त।
    त्याग कर मानसिकता संघर्ष की।
    उम्मीदों की नई सुबह नववर्ष की।
    सुख – समृद्धि और उत्कर्ष की।।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • मुक्तक

    मुक्तक

    धड़ाधड़ अंधाधुन हो रहा पेड़ों की कटाई,
    मूक बाधिर बने रहे तनिक लाज नहीं आई,
    सूलग रहा आरे आज राजनीति के करतुतो से,
    पर्यावरण प्रेमी को दबोच रहें हैं आरे कालोनी से,

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • वृक्ष

    )

    पर्यावरण का हो रहा हरण
    वृक्षो की शामत हैं आयी
    लगे हैं धुन में वृक्ष काटने
    प्रकृति भी देखो हैं कुम्हलाई

    कटते रहे वृक्ष तो
    आक्सीजन कहा से लाओगे
    नन्हें मुन्हें मेहमान आयेंगे तो
    क्या उनको तुम बतलाओंगे

    चिडिया की चहक भी ना जाने
    कौन से जादुगर ने चुराई
    रुखा सुखा अब लगे धरा
    अब तो कुछ शर्म करो मानव भाई

    वृक्ष धरा की हैं आभुषण
    लगा वृच कर दो हरा भरा जहा
    क्या दिखाओगे अपने छोटे मुन्ने को
    जब कर रहे हो प्रकृति का हरण

    कुछ सुन्दर काम करो मानव
    प्रकृति भी मुस्कान भरे
    डलिया पर खिले लताये
    धरा का मान सम्मान बढे

    शुध्द स्वछंद बयार बहे
    कोयल की गीतो में मिठास भरे
    चलो एक कदम बढाये हम
    लगा वृक्ष को जागरुक बनाये

    महेश गुप्ता जौनपुरी
    मोबाईल – 9918845864

  • उम्मीदों का नववर्ष

    उम्मीदों की नई सुबह नववर्ष की।
    सुख – समृद्धि और उत्कर्ष की ।।

    आगे बढ़ते हैं, कड़वे पल भुला कर।
    छोड़ वो यादें, जो चली गई रुला कर।
    मधुर यादों के साथ, आओ नववर्ष का,
    स्वागत करें, उम्मीद का दीप जलाकर।
    बात करें मात्र खुशियां और हर्ष की।
    उम्मीदों की नई सुबह नववर्ष की ।
    सुख – समृद्धि और उत्कर्ष की ।।

    आओ नववर्ष में होते हैं संकल्पित।
    जल की हर बूंद करते हैं संरक्षित।
    स्वच्छ वातावरण बनाने का प्रयास,
    क‌रते‌‌ हैं, पर्यावरण प्रदूषण रहित।
    लालसा किए बगैर निष्कर्ष की।
    उम्मीदों की नई सुबह नववर्ष की।
    सुख – समृद्धि और उत्कर्ष की ।।

    संसार हो दहशत और आतंक मुक्त।
    अमन – चैन, समरस और सौहार्द्र युक्त ।
    कल्पना साकार हो इस नववर्ष ‘देव’,
    परस्पर प्रेम सूत्र में विश्व हो संयुक्त।
    त्याग कर मानसिकता संघर्ष की।
    उम्मीदों की नई सुबह नववर्ष की।
    सुख – समृद्धि और उत्कर्ष की।।

    सभी को नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाएं।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • भारत को स्वच्छ बनाना है

    चलो उठो ये प्रण कर लें हम
    भारत को स्वच्छ बनाना है,
    धरती माँ के आँचल को
    हरियाले,फल-फूलों से सजाना है,
    प्रदूषण की जहरीली हवा से
    पर्यावरण को मुक्त बनाना है,
    तन स्वच्छ तो करते सब हैं
    मन को स्वच्छ बनाना है।

    चलो उठो ये प्रण कर लें हम
    भारत को स्वच्छ बनाना है,
    इस धरा के कण -कण में
    नव जीवन का संचार है,
    व्यर्थ नहीं कुछ इस जगत में,
    कचरे को भी नयी पहचान दें,
    पुनः नया कर उसके भी
    अस्तित्व को सम्मानदें।

    चलो उठो ये प्रण कर लें हम
    भारत को स्वच्छ बनाना है,
    वासुदेव कुटुम्बकम के मन्त्र को
    सच करके दिखाना है,
    मन को दर्पण बना लें
    जन -जन को खुद में निहारें,
    द्वेष कलह को जड़ से उखाड़े।

    चलो उठो ये प्रण कर लें हम
    भारत को स्वच्छ बनाना है,
    पर्वत नदियाँ झीलों को
    निर्मल नैसर्गिक रहने दें,
    वन जीवों को धरती माँ के
    ममता तले पलने दें,
    हम जीवों में श्रेष्ट बनें हैं
    श्रेष्टता का परिचय कुछ तो रहनें दें।।

  • विजय पर्व

    आजादी का विजय पर्व , हम मिलकर आज मनायें |
    आज की मधुरिम बेला पर ,हम गीत खुशी के गायें |
    एक झोपडी भी भारत में , कहीं सूनी न रह जाये |
    एक भी बन्दा भारत का , कहीं भूखा न सो जाये |
    रोटी ,कपडा और मकान , सबको अब मिल जाये |
    बुलेट- ट्रेन दौड़ा कर के , हम भारत को चमकाये |
    रक्षा कर जंगल की अपने , हम पर्यावरण बचायें |
    गंगा माँ को साफ़ रखेगें , आज कसम यह खायें |
    भारत को जो आँख दिखाये, उससे हम लड़ जायें |
    शांति दूत बनकर के हम , जगद गुरु कहलायें |
    लाल किले यह प्राचीर , हमको आज बुलाये |
    देश के खातिर हर बच्चा , सैनिक अब बन जाये |
    भारत का यह भव्य तिरंगा , झुकने कभी न पाये |
    पंकज जान चली जाये , पर इसकी लाज बचायें |
    आदेश कुमार पंकज

  • पर्यावरण (Environment)

    पर्यावरण (Environment)

    पर्यावरण को बचाना हमारा ध्येय हो
    सबके पास इसके लिए समय हो
    पर्यावरण अगर नहीं रहेगा सुरक्षित
    हो जायेगा सबकुछ दूषित
    भले ही आप पेड़ लगाये एक
    पूरी तरह करे उसकी देखरेख
    सौर उर्जा का करे सब उपयोग
    कम करे ताप विद्युत् का उपभोग
    रासायनिक खाद का कम करे छिडकाव
    भूमि को प्रदूषित होने से बचाव
    कचड़ो का समुचित रीती से करो निपटारा
    फिर न होगी कोई नदी प्रदुषण का मारा
    फैक्ट्रियो में जब सौर यन्त्र लगाई जाएँगी
    वायु प्रदुषण में अपने आप कमी आएँगी
    तब जाकर पर्यावरण प्रदुषण में कमी आएँगी
    आधी बीमारिया अपने आप चली जाएगी

    – Rajat

  • मुक्तक

    सूख गई धरती दाने दाने को पंछी भटक रहा
    झंझावात में बिन पानी सांसे लेने में अटक रहा |
    तिस पर भी प्रतिदिन मानव संवेदन शुन्य हुआ जाता संस्कार प्रकृति नियम अब भी उसके मन खटक रहा
    यह विभत्स दृश्यांक मनुज ने गरल वमन कर लाया है
    अब भी मानव नीज हाथों विष का प्याला गटक रहा
    सदियों से पर्यावरण में व्याप्त उपद्रव के चलते
    खड्ग गले पर जन जन के असुरक्षा की लटक रहा||
    उपाध्याय….

  • मुक्तक-मनहरण घनाक्षरी

    आज का विषय-मनहरण घनाक्षरी/कवित्त
    दिनांक-२०/६/१६
    विधा- गीत (गौना/भला) वार्णिक छंद
    मात्राएँ-८ ८ ८ ७ – १६-१५

    धरती पर वृक्ष नित्य अल्प होते जा रहे
    पर्यावरण का कौन रखता खयाल है !
    वन काटने का जुगत करने तैयार देख
    बीच ही बाजार आज घूमता दलाल है !!
    भय से दूर लोग है भुजंग दंग हो रहे
    मानव बना जो श्रेष्ठ धरती का व्याल है !
    विषिधर विकल्प मनुज दनुज समान पर
    मानव के दंश का न कोई मिशाल है !!
    दूई मास में खतम शर्द व बरसात ऋतु
    गर्मी के मौसम बने रहत सालो साल है !
    कहे मतिहीन कौन कौन दे उदाहरण
    रोती सिसकती धरा हालत बेहाल है ||
    उपाध्याय…

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