इक नज़्म कभी कभी जाग उठती है

पुरानी जिंदगी कभी कभी जाग उठती है
यादें आ जाती है याद बेवजह
खारी लकीरें छोडकर रुखसारों पर
न जाने कहां खो जाते है जज्बात मेरे
लफ़्ज जो कभी जुबां पर आ ना पाये
जो छुपते रहे ज़हन के किसी कोने में
उमड उठते है कभी कभी
कागज के किसी कोने में
इक नज़्म कभी कभी जाग उठती है|

Comments

5 responses to “इक नज़्म कभी कभी जाग उठती है”

  1. Kapil Singh Avatar
    Kapil Singh

    chand alfaazo me bahut kuch bayan kar diya apne to

  2. Anjali Gupta Avatar
    Anjali Gupta

    nice

  3. Satish Pandey

    बहुत खूब

Leave a Reply

New Report

Close