“कहाँ रहते हो”

“कहाँ रहते हो”

ღღ_हम ढूँढ आए ये शहर-ए-तमाम, कहाँ रहते हो;
अरे अब आ जाओ कि हुई शाम, कहाँ रहते हो!
.
इज्जत ख़ुद नहीं कमाई, विरासत ही सम्हाल लो;
कहीं हो जाए ना ये भी नीलाम, कहाँ रहते हो!
.
रस्मो-रिवाज़ इस दुनिया के, तुझे जीने नहीं देंगे;
जब तक मिल जाए ना इक मुकाम, कहाँ रहते हो!
.
तेरे दिल से जो कोई खेलेगा, तो समझ जाओगे;
किसे कहते हैं सुकून-ओ-आराम, कहाँ रहते हो!
.
अब तुम्ही बताओ “अक्स”, और कैसे तुझे पाऊँ;
कि रब से माँगा है सुबह-ओ-शाम, कहाँ रहते हो!!….‪#‎अक्स‬
.

 


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

A CA student by studies, A poet by passion, A teacher by hobby and a guide by nature. Simply I am, what I am !! :- "AkS"

Related Posts

मेरे भय्या

लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है

लंबी इमारतों से भी बढकर, कचरे की चोटी हो जाती है

तकदीर का क्या, वो कब किसकी सगी हुई है।

7 Comments

  1. Krishna yadav - June 23, 2016, 5:55 pm

    nice ji

  2. Devki jadon - June 23, 2016, 11:59 pm

    umda

  3. Sridhar - June 24, 2016, 11:27 am

    lajabaab

  4. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 9, 2019, 7:42 pm

    लाजबाव

Leave a Reply