कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की

कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की
कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की
मर्यादा राम की इस भू पे सीता की इस पवित्र जमीं पे
कुछ तो सम्मान करो निज भू की ।
कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की ।।
तेरे मात-पिता-भाई-बहन को पाला है, इस भू ने।
अपनी छाती चीर-चीर के दिया है, तुझे अन्न-जल, मान व सम्मान रे!
भूखे रह जाते तु, प्यासे मर जाते अगर भू-माता की कृपा ना होती ।
कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की ।।
तेरी हर एक खुशी के खातिर किया है माता ने खुद को निराशा रे!
तु खुश रहें जहां में यही तो हैं मा का आशा रे!
आशा-निराशा के बंधन में भी तुझे माता ने संभाला है ।
कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की ।।
आज भी रोती अपनी प्रारब्ध पे ये माता, दुर्जनों ने किया है आँचल इसका मैला
अगर तुझे निज मातु सम्मान है तो करो अपनी संस्कृति-धर्म व भू की बचाव रे!
अगर तु नहीं किया तो तु मातु सुत बेकार है ।
कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की ।।
 विकास कुमार

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