क्यो मैं बुद्ध सी बनूँ….

क्यों ! मैं बुद्ध जैसी बनूँ…..
मैं बुद्ध नही हूँ..
जो चल दिये अपना सारा संसार छोड़कर;
मैं एक अदना सी नारी
कैसे कह दूं बेटा मेरा नहीं
बेटी मेरी नहीं
पति मेरा नहीं
मां-बाप मेरे नहीं.. !
क्षण में नकार दूँ सब कैसे,
यही जीवन भगवान ने दिया है
शरीर की हड्डी मांस सब कुछ
भगवान ने ही तो दिया
मोह ये माया सुख भी दिए दुख भी दिए
उम्मीद भी दी अपेक्षाएं भी दी.. !
वही तो कहता है कि
गृहस्थ जीवन ही त्याग का जीवन है
माँ बाप की सेवा ही तप है..!
तो फिर क्यों मैं बनूँ बुद्ध
क्यों सब को छोड़कर बुद्ध की तरह रहूँ . .
फिर मैं भी तो देखूं
गृहस्थ जीवन में रहकर
बुद्ध हो जाना कैसा होता है..!
क्या बुद्ध का मतलब यही है
कि सब कुछ छोड़कर चले जाओ;
एक पेड़ के नीचे बैठकर
खुद को आत्मसात करो..!
सबके साथ रहकर खुद को ढूंढो
तो हम बुद्ध बने
सबके साथ रह खुश रहो
दुख भी सहो
प्यार भी करो नफरत भी करो
उम्मीद भी रखो अपेक्षाएं भी रखो
खुशियां भी समेटो…!
पशु भी नही हूँ मैं कि
पैदा होते ही बच्चों को छोड़ दूँ…!
मैं इंसान हूँ —
तो फिर भगवान की दी हुई इस काया को
इस मन को एक छोटे से दिल को
क्यों ना मैं अपनों के बीच में रहकर
ही खुशियों में लिप्त रहूँ.. !
कैसे कह दूं कि मैं बुद्ध हो जाऊं
कैसे बन जाऊं मैं बुद्ध
कितने ही संत ओशो
संतों की जीवनी है
सब यही कहती हैं कि
ना मोह रखो ना माया रखो
भगवान ने जीवन दिया
कर्म करो फल की चिंता ना करो.. !
मैं कृष्ण नहीं हूं कृष्ण तो भगवान थे
मुझे तो उस भगवान ने
इंसान बना कर भेजा है
उसी ने तो कहा है सुख भी ले
और दुख का मज़ा चख
और फिर आजा मेरे पास..!
त्याग तो यशोधरा का था
उर्मिला का था……!
यह एक प्रश्न है जो हर एक के दिल में होता है इसका उत्तर किसी के पास नहीं है
सिर्फ सोच है और सोच ही चलती रहती है!!

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