घर: एक मंदिर

हे लक्ष्मी तुम कितनी चंचला हो?
खुद भी नहीं ठहरती एक जगह पर
और औरों को भी भटकाती।

घर से दफ्तर जाकर भी
भटके भर दिन गाँव नगरऔर इधरोधर
फिर भी बाक बाण छेदे छाती।

झल्ला के घर को आया
बैठी थी दुर्गा दरवाजे आसन लगाकर
शीश चूम मुख माथे सहलाती।

आँगन में बैठी काली रूप
आव भगत से दुखरे को लेती हर
मधुर शब्द कह स्वरा बहलाती।

मिल जाए नव तन मन
“विनयचंद ” रे सब सुख बसे जहाँ पर
वो दुनिया बस घर कहलाती।


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13 Comments

  1. Ashmita Sinha - December 5, 2019, 9:47 pm

    Nice one

  2. Abhishek kumar - December 5, 2019, 10:54 pm

    Good

  3. Poonam singh - December 6, 2019, 5:42 pm

    Nice

  4. Pragya Shukla - December 9, 2019, 8:46 pm

    Good

  5. Abhishek kumar - December 14, 2019, 5:37 pm

    सुन्दर रचना

  6. Abhishek kumar - December 21, 2019, 10:15 pm

    Best

  7. Kanchan Dwivedi - March 6, 2020, 5:28 pm

    Shi kaha

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