चलो थोड़ा जादू करते हैं

चलो थोड़ा जादू करते हैं
जनता के दिल को छूती हुई एक कविता लिखते हैं

झोपड़ियों में पल रही भूख से टकराते हैं
छोटे छोटे मासूमों की चीख
और डूबती हुई ज़िंदगियों को
कविता का विषय बनाते हैं

लड़ते हैं
अफगानिस्तान की पहाड़ियों के बीच पल रहे आतंक से
अफ्रीका के अँधेरे से
अमेरकियों के पूजी वाद से
सीरिया में इस्लामिक स्टेट से टकराते हैं
ईराक़ और ईरान की कुछ बाते करते हैं
नक्सलियों के नक्सलवाद से मिलते है
आओ राजधानी से निकलकर
गांव और देहात में चलते हैं
थोड़ा कविता को धूप दिखाते हैं
चूल्हे का धुआं खिलाते हैं

जब कविता खेत में हल चलाएगी
तभी परिश्रम का अर्थ समझ पाएगी
केंवल मानसिक जुगाली न रहकर
समाज के कुछ काम आएगी

आओ कविता लिखते हैं
चरवाहों और किसानों की
सीमा पर मर रहे जवानों की
बिल्डिंग के नीव में लग रहे है
मज़दूर के खून की
आदमी और आदमियत के ज़मीन की

आओ कविता लिखते हैं
मानववाद की
इंसानी स्वाभाव की
विषमता के प्रभाव की
औरत के दर्द की
सूखा और सर्द की

आओ
कविता को तलवार बना दें
सारे भेदों को मिटा कर
अभेद उपजा दें
आओ कविता को सबकी आवाज़ बना दें

कविता को मोटी सी दीवार बना दें
सारी खाई मिटा दें
आओ सपनों का संसार बना लें
हर किसी को उसमे जगह दें
जीने की सबको वज़ह दें ।

तेज

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