चलो पतंग उड़ाएं
लूट लें, काट लें पतंग उनकी
सभी रंगीनियां अपनी बनायें
चलो पतंग उड़ाएं
चलो पतंग उड़ाएं।
उनके चेहरे की
खुशियों को चुराकर
चलो आनंद मनायें
चलो पतंग उड़ाएं।
कटी पतंग दूसरे की
जिस दिशा में हो
उस तरफ दौड़ लगाएं
चलो पतंग उड़ाएं।
वो उड़ाने में कुशल हों न हों
मगर हम
काटने में कुशल बन जायें,
न कोई प्यार, न झिझक रखनी
बस काटने में लग जाएं
चलो पतंग उड़ाएं।
आंख से आंख लड़ाकर उनसे
खुद की आंखों में जरा उलझा कर
काट लें डोर, लूट लें उनको
चलो पतंग उड़ाएं।
गर किसी की पतंग अपने पथ
उड़ रही हो न कर बाधा हमको
तब हम टाँग अड़ायें
चलो पतंग अड़ायें,
जरा इंसान कहायें।
चलो पतंग उड़ाएं
Comments
2 responses to “चलो पतंग उड़ाएं”
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संक्रांति पर्व पर कवि सतीश जी की ख़ूब मस्ती भरी और खुशियों से सराबोर अति सुंदर कविता। बहुत खूब
मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएं -
अतिसुंदर भाव
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